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51 शक्तिपीठों में से एक है अम्बाजी का मंदिर, जिस जगह मंदिर बना वहाँ गिरा था माँ सती का हृदय

जब गुजरात में घूमने की बात होती है, तो यहां पर दर्शनीय स्थलों की कमी नहीं है। लेकिन माता के भक्तगण विशेष रूप से अम्बाजी मंदिर के दर्शन के लिए गुजरात जाते हैं। यह मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है।

| Updated on: Mon, 10 July 2023 4:35:11

51 शक्तिपीठों में से एक है अम्बाजी का मंदिर, जिस जगह मंदिर बना वहाँ गिरा था माँ सती का हृदय

जब गुजरात में घूमने की बात होती है, तो यहां पर दर्शनीय स्थलों की कमी नहीं है। लेकिन माता के भक्तगण विशेष रूप से अम्बाजी मंदिर के दर्शन के लिए गुजरात जाते हैं। यह मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। अरासुरी अंबाजी मंदिर का पौराणिक महत्व है। सबसे खास बात है कि इस मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है। इस जगह के बारे में कहा जाता है कि यहाँ भगवान श्री कृष्ण का मुंडन संस्कार सम्पन्न हुआ था। यह भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थान में से है। अंबाजी माता मंदिर भारत का एक प्रमुख शक्ति पीठ है। यह पालनपुर से लगभग 65 किलोमीटर, माउंट आबू से 45 किलोमीटर और आबू रोड से 20 किलोमीटर और अहमदाबाद से 185 किलोमीटर, गुजरात और राजस्थान सीमा के पास स्थित है।

यहाँ पर नवरात्रि का त्योहार बेहद ही उत्साह व उमंग के साथ मनाया जाता है। लोग पवित्र माता के चारों ओर गरबा नृत्य करते हैं। मंदिर में दर्शन करने के बाद लोग आसपास के प्राकृतिक नजारों का आनंद उठाते हैं। मंदिर को लेकर लोगों के मन में एक अलग ही श्रद्धा व मान्यता है।

यह मंदिर बेहद ही प्राचीन है। यह इतना पुराना है कि तब तक मूर्ति पूजा का भी चलन शुरू नहीं हुआ था। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर करीबन 1200 साल पुराना है। इतना ही नहीं, इस मंदिर के जीर्णोद्वार का काम 1975 से शुरू हुआ था और तब से अब तक इसका काम अभी चल रहा है।

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जिस जगह बना मंदिर वहाँ गिरा था माँ सती का हृदय

इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जिस स्थान पर यह शक्तिपीठ स्थापित है वहाँ माँ सती का हृदय गिरा था। इसी के चलते इसे पवित्र शक्तिपीठों में गिना जाता है। यह मंदिर काफी प्राचीन है और यहां देश के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं। इस मंदिर का निर्माण वल्लभी शासक सूर्यवंश सम्राट अरुण सेन ने चौथी शताब्दी में कराया था। समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा है। शक्ति के उपासकों के लिए माँ का यह मंदिर काफी महत्व रखता है। इस मंदिर के गर्भगृह में एक गुफा है, जहाँ पर माता की कोई मूर्ति नहीं है, अपितु यहाँ पर स्वर्ण निर्मित श्रीयंत्र स्थापित किया गया है, इसी श्रीयंत्र की यहाँ पूजा होती है। इस मंदिर में स्थापित श्रीयंत्र को कोई भी नग्न आंखों से नहीं देख सकता है। पूर्णिमा के दिन यहां मेले का आयोजन होता है। 103 फुट ऊंचे इस मंदिर के शिखर पर 3 टन वजन का स्वर्ण कलश स्थापित है। माँ के इस मंदिर तक पहुँचने के लिए 999 सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं।

इस मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालु सड़क, हवाई और रेल मार्ग के जरिए जा सकते हैं। यहाँ का नजदीकी हवाई अड्डा अहमदाबाद का सरदार वल्लभ भाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जहाँ से अंबाजी मंदिर करीब 186 किलोमीटर दूर है। यहाँ का नजदीकी रेलवे स्टेशन आबू रोड स्टेशन है जहाँ से मंदिर की दूरी 20 किमी है। देश के किसी भी कोने से सड़क मार्ग के जरिए इस मंदिर तक पहुँचा जा सकता है।

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बेहद पवित्र माना जाता है कुंड

अम्बाजी मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा सिर्फ मंदिर तक ही सीमित नहीं होती है। बल्कि अंबाजी मंदिर से थोड़ी दूरी पर एक कुंड स्थित है, जिसमें डुबकी लगाना बेहद पवित्र माना जाता है। इस कुंड को लोग मानसरोवर कहकर पुकारते हैं और यहां पर डुबकी लगाने का अपना एक अलग ही आध्यात्मिक महत्व है।

श्वेत संगमरमर से है निर्मित

अम्बा जी मंदिर देखने में इसलिए भी खूबसरत लगता है, क्योंकि यह श्वेत संगमरमर से निर्मित है। यह मंदिर बेहद ही भव्य है और इसका शिखर एक सौ तीन फुट ऊंचा है।

नवरात्रि में दिखता है अलग ही नजारा

अम्बा जी मंदिर में यूं तो सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के दौरान यहाँ पर एक अलग ही माहौल होता है। नवरात्रि के नौ दिनों तक भक्तगण पूरी श्रद्धा से माता की भक्ति करते हैं। इतना ही नहीं, इस खास अवसर पर मंदिर के प्रांगण में भवई और गरबा जैसे नृत्यों का आयोजन किया जाता है। साथ ही सप्तशती का पाठ भी किया जाता है।

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अंबाजी मंदिर के आसपास दर्शनीय स्थल

मानसरोवर


अम्बाजी के मुख्य मंदिर के पीछे मानसरोवर नामक पवित्र सरोवर है। इसका निर्माण श्री तपिशंकर नाम के एक भक्त ने बनवाया था। जो मूल अहमदाबाद के रहवासी हुआ करते थे। इस सरोवर के निर्माण की अवधि 1584 से 1594 के बीच बताई जाती है। सरोवर के दो किनारों पर एक तरफ महादेव का और दूसरी तरफ अजय देवी का मंदिर उपस्थित है। अजय देवी के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह माता रानी की बहन है। माई भक्त मानसरोवर में पवित्र स्नान किया करते हैं। मंदिर में राजा मालदेव के समय का एक शिलालेख मौजूद है, जो संवत वर्ष 1415 की साल का बताया जाता है। वह लेखन और पुरानी लिपियों का प्राचीन स्मारक है।

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कुंभारिया

अंबाजी मंदिर से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पे कुंभारिया नाम की जगह स्थित है। बनासकांठा जिले में कुम्भारिया धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व का गाँव है। यहाँ जैन मंदिर बने हुए हैं । उसकी पुरातत्व, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत देखने योग्य है। उसमें भगवान श्री नेमिनाथ का जैन मंदिर 13वीं शताब्दी का मौजूद है।

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गब्बर हिल्स

अंबाजी गब्बर हिल्स मंदिर की नजदीक ही मौजूद है। गब्बर हिल्स जाने के लिए आपको 999 सीढ़ियाँ चढ़के जाना पड़ता है। कहने का तात्पर्य यह है कि अम्बाजी से गब्बर हिल्स की दूरी लगभग डेढ़ किलोमीटर है। इस पहाड़ी पर हमेशा अम्बाजी गब्बर ज्योत प्रज्जवलित रहता है।

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कामाक्षी माता का मंदिर

माता अंबा के मंदिर से सिर्फ 1 किमी की दूरी पर कामाक्षी माता का मंदिर स्थित है। जो हिन्दुओं के 51 शक्तिपीठों का प्रदर्शन करता आपको नजर आता है।

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कोटेश्वर

अम्बाजी में नजदीक ही कोटेश्वर नाम का छोटा सा गाँव अपने धार्मिक महत्व से बहुत प्रसिद्ध है। उसमें नारायण सरोवर और प्राचीन शिव मंदिर देखने लायक हैं। हिन्दू संस्कृति में पौराणिक कथाओं के मतानुसार पांच पवित्र नदियों में से वह एक है। यह स्थल सूर्यास्त और क्षेत्र समुद्र के दृश्य के लिए प्रचलित है।

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कैलाश हिल सनसैट

अम्बाजी मंदिर से तक़रीबन दो किलोमीटर की दूरी पर ही कैलाश पहाड़ी यानि कैलाश टेकरी मौजूद है। जिस पर बहुत ही सुन्दर और नयनरम्य शिवालय उपस्थित है। इस पहाड़ी पर शिवजी भगवान के मंदिर का कलात्मक गेट देखने को मिलता है।

स्वर्ण गुंबद

भक्त अम्बाजी मंदिर में दान करते रहते हैं। उसमें कई लोग तो सोने और चाँदी का भी दान किया करते हैं। इसके उपयोग के हेतु ट्रस्ट ने अम्बाजी मंदिर को सोने से जड़ने का फैसला लिया और 25 जनवरी 2019 के दिन मुख्यमंत्री विजय रूपाणि ने अंबाजी के स्वर्ण गुंबद का उद्घाटन किया। उसके पहले सबसे पहले 140 किलोग्राम सोने का उपयोग किया गया है। गांधीनगर के मुकेश पटेल नाम के बिल्डर ने 2012 में 25 किलोग्राम सोना दिया था और अब तक 1580 भक्त सोने का दान दे चुके हैं। अम्बाजी मंदिर को पूरा सोने से जड़ित किया जाने वाला है अभी तो आधा ही सोने से जड़ित किया गया है, लेकिन कुछ ही समय में पूरा मंदिर स्वर्ण से सुशोभित किया जाएगा।

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