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400 कर्मचारियों का बॉस, 40 लाख की सैलरी छोड़ बना नागा साधु, जानें M.Tech वाले बाबा की कहानी

M.Tech वाले बाबा ने अपने जीवन के एक रोचक पहलू को साझा करते हुए बताया कि संन्यास लेने के बाद उन्होंने हरिद्वार में 10 दिन तक भिक्षा मांगी। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण दौर था, जब उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का निर्णय लिया।

Posts by : Sandeep Gupta | Updated on: Tue, 21 Jan 2025 1:33:02

400 कर्मचारियों का बॉस, 40 लाख की सैलरी छोड़ बना नागा साधु, जानें M.Tech वाले बाबा की कहानी

महाकुंभ के शुरू होते ही कई साधु, संत, और साध्वी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गए। पहले चिमटा वाले बाबा, फिर हर्षा रिछारिया, और आईआईटी वाले बाबा अभय सिंह ने सुर्खियां बटोरीं। अब 'M.Tech वाले बाबा' की कहानी तेजी से वायरल हो रही है। इनकी सैलरी और पद के बारे में जानकर लोग हैरान रह जाते हैं। एक समय ऐसा था जब बाबा की टीम में 400 लोग काम करते थे, लेकिन आज वे नागा साधु की तरह साधारण जीवन जी रहे हैं।

2010 में लिया संन्यास

एक इंटरव्यू में बाबा ने बताया कि उन्होंने कई वर्षों तक एक इंजीनियरिंग कंपनी में काम किया। उनका असली नाम दिगंबर कृष्ण गिरि है। बाबा ने खुलासा किया कि वे एक बड़ी टीम के जीएम (जनरल मैनेजर) थे, जिसमें 400 लोग उनके अधीन काम करते थे। बाबा की सैलरी करोड़ों में थी, लेकिन उन्होंने 2010 में सबकुछ त्यागकर संन्यास ले लिया।

हरिद्वार में भिक्षा मांगी

M.Tech वाले बाबा ने अपने जीवन के एक रोचक पहलू को साझा करते हुए बताया कि संन्यास लेने के बाद उन्होंने हरिद्वार में 10 दिन तक भिक्षा मांगी। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण दौर था, जब उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का निर्णय लिया।

कहां हुआ था जन्म


M.Tech वाले बाबा, जिनका असली नाम दिगंबर कृष्ण गिरि है, ने बताया कि उनका जन्म बेंगलुरु के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन (M.Tech) की डिग्री कर्नाटक यूनिवर्सिटी से पूरी की। इसके बाद उन्होंने कई बड़ी कंपनियों में काम किया। बाबा ने बताया कि उनकी आखिरी नौकरी नई दिल्ली की एक निजी कंपनी में थी, जहां वे जनरल मैनेजर (GM) के पद पर कार्यरत थे। उनके अधीन 400 कर्मचारी काम करते थे।

ऐसे छोड़ा सबकुछ

दिगंबर कृष्ण गिरि ने अपने वैराग्य की यात्रा के बारे में बताया कि यह सब देहरादून की एक ट्रिप के दौरान शुरू हुआ। उन्होंने वहां साधुओं की एक टोली देखी, जिसने उनके मन में गहरा प्रभाव डाला। यह सोचते हुए कि ये साधु कौन हैं और उनका जीवन कैसा है, उनका मन धीरे-धीरे वैराग्य की ओर बढ़ने लगा।

इसके बाद उन्होंने सभी प्रमुख अखाड़ों को ईमेल कर यह इच्छा जाहिर की कि वे उनसे जुड़ना चाहते हैं। हालांकि, किसी भी अखाड़े से जवाब नहीं मिला। फिर उन्होंने हरिद्वार का रुख किया और वहां गंगा नदी में अपने पास मौजूद सभी चीजें प्रवाहित कर दीं। जब उनके पास कुछ भी नहीं बचा, तो उन्होंने साधु वेष धारण किया और 10 दिन तक हरिद्वार में भिक्षा मांगी।

बाबा का मानना है कि ज्यादा धन होने से व्यक्ति की आदतें खराब हो जाती हैं और मानसिक शांति मिलना कठिन हो जाता है।

महंत से दीक्षा ली

बाबा ने आगे बताया कि उन्होंने गूगल पर निरंजन अखाड़ा की जानकारी खोजी। इसके बाद उन्होंने महंत श्री राम रतन गिरी महाराज से दीक्षा ली और साधु जीवन अपना लिया। अब वे उत्तरकाशी के एक छोटे से गांव में रहकर साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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