चैत्र नवरात्रि में इस बार एक विशेष संयोग बन रहा है, जहां आज 2 अप्रैल, बुधवार को चतुर्थी और पंचमी तिथि एक साथ पड़ रही हैं। इस दुर्लभ योग के कारण भक्तों को एक ही दिन में मां कुष्मांडा और मां स्कंदमाता की पूजा का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। इस विशेष संयोग में भक्त षोडशोपचार पूजन विधि द्वारा इन दोनों देवियों की आराधना करके आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
मां कुष्मांडा - सृष्टि की स्रष्टा देवी:
पंडित राजेंद्र किराडू के अनुसार, शास्त्रों में मां कुष्मांडा को ब्रह्मांड की उत्पत्ति की देवी माना गया है। इन्हें सृष्टि की जननी कहा जाता है। मां कुष्मांडा के स्वरूप में शांति और सौम्यता होती है, और वे भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। इनकी पूजा करते समय देवी भागवत, नवाहन परायण, देवी अथर्वशीर्ष और दुर्गा सप्तशती का पाठ करना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
षोडशोपचार विधि से करें पूजा:
मां कुष्मांडा की पूजा में षोडशोपचार विधि का पालन करके भक्त मनोवांछित फल प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें कुंद पुष्प अर्पित करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। साथ ही, लक्षार्चन और मालपुए का भोग अर्पित करना विशेष महत्व रखता है।
मां स्कंदमाता - मातृत्व और नवचेतना की देवी:
पंडित राजेंद्र किराडू के अनुसार, इस विशेष संयोग में भक्तों को मां स्कंदमाता की पूजा का भी अवसर मिल रहा है। मां स्कंदमाता का निवास पहाड़ों पर माना जाता है और वे नवचेतना का संचार करने वाली देवी मानी जाती हैं। उनकी पूजा से महिलाएं संतान सुख प्राप्त करती हैं और उनके जीवन में खुशियां आती हैं।
भगवान कार्तिकेय की माता:
मां स्कंदमाता को भगवान कार्तिकेय की मां भी माना जाता है, और उन्हें अपने पुत्र के नाम से पुकारा जाना प्रिय है। पूजा में खीर और मालपुए का भोग अर्पित करना विशेष रूप से लाभकारी है, और कुमुद पुष्प का प्रयोग करना उत्तम माना जाता है।
इस विशेष संयोग में भक्त दोनों देवियों की पूजा करके दोगुनी कृपा प्राप्त कर सकते हैं।