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ईरान-इज़राइल युद्ध: भारत के लिए खतरे की घंटी या कूटनीति का मौका?

मध्य पूर्व एक बार फिर एक भयंकर सैन्य टकराव की चपेट में आ चुका है। इस बार टकराव दो ऐसे देशों के बीच है जिनका ऐतिहासिक वैमनस्य किसी से छुपा नहीं—ईरान और इज़राइल।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Mon, 16 June 2025 5:55:00

ईरान-इज़राइल युद्ध: भारत के लिए खतरे की घंटी या कूटनीति का मौका?

मध्य पूर्व एक बार फिर एक भयंकर सैन्य टकराव की चपेट में आ चुका है। इस बार टकराव दो ऐसे देशों के बीच है जिनका ऐतिहासिक वैमनस्य किसी से छुपा नहीं—ईरान और इज़राइल। यह टकराव केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके गहरे और दूरगामी प्रभाव वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा बाज़ार, और कई महाशक्तियों की विदेश नीति पर पड़ने लगे हैं। इस लेख में हम इस संघर्ष की उत्पत्ति, उसके प्रभाव और अमेरिका, रूस, चीन तथा भारत जैसे देशों की रणनीतिक भूमिका का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।

युद्ध की पृष्ठभूमि


ईरान और इज़राइल के बीच संबंध वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं। ईरान इस्राइल को 'ज़ायोनी शासन' कहकर खारिज करता आया है और उसका समर्थन करने वाले देशों को 'दमनकारी' कहता है, वहीं इज़राइल ईरान को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है, विशेषकर उसके परमाणु कार्यक्रम को। 2025 में यह टकराव खुला युद्ध बन गया, जब इज़राइल ने ईरान के इस्फहान, कुर्म और नतांज स्थित सैन्य और परमाणु ठिकानों पर गुप्त ऑपरेशन के जरिए हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने भी भारी मिसाइल और ड्रोन हमले किए।

इस घटना ने मध्य पूर्व को एक बार फिर से युद्धभूमि में बदल दिया है। हज़ारों जानें जा चुकी हैं, लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह एक नई चुनौती बन कर उभरा है।

टकराव की प्रमुख घटनाएं

इज़राइली हवाई हमले

जून 2025 की शुरुआत में इज़राइल ने ऑपरेशन "राइजिंग लायन" के तहत ईरान के कई सैन्य प्रतिष्ठानों पर सर्जिकल स्ट्राइक्स की। इनमें से कई ठिकाने वे थे जहाँ ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा था।

ईरानी जवाबी कार्रवाई


इन हमलों के कुछ ही घंटों के भीतर ईरान ने 200 से अधिक मिसाइल और ड्रोन इज़राइल की ओर छोड़े। इनमें से कुछ को इज़राइल के 'आयरन डोम' प्रणाली ने नष्ट कर दिया, लेकिन कुछ मिसाइलें तेल और गैस के महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर से टकराईं।

सीमित जमीनी संघर्ष

दोनों देशों ने एक-दूसरे की सीमाओं पर सीमित पैमाने पर ज़मीनी टुकड़ियों की तैनाती भी की है। हालांकि यह अब तक सीमित संघर्ष है, लेकिन इसकी संभावना है कि यदि युद्ध लम्बा चला तो यह क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।

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वैश्विक ऊर्जा संकट

इस टकराव का सबसे पहला और सीधा असर विश्व ऊर्जा बाजार पर पड़ा है।

तेल की कीमतों में उछाल


संघर्ष शुरू होते ही ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $75 से बढ़कर $105 प्रति बैरल तक पहुंच गईं। यह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकट का संकेत है, खासकर उन देशों के लिए जो अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।

होर्मुज़ की जलडमरूमध्य पर खतरा

ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को बंद करने की धमकी ने वैश्विक स्तर पर खलबली मचा दी है। यह मार्ग वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 30% संभालता है। इसकी अस्थिरता से तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है।

वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज


यूरोप और एशिया में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर रुझान बढ़ा है। एलएनजी (LNG) आपूर्ति और नवीकरणीय ऊर्जा की खोज में तेज़ी आई है।

अमेरिका की भूमिका और रणनीति


अमेरिका दोनों देशों के इस संघर्ष में निर्णायक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है।

इज़राइल का समर्थन

अमेरिका ने इज़राइल को सामरिक समर्थन दिया है लेकिन अब तक युद्ध में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया है। अमेरिका की चिंता यह है कि संघर्ष बढ़कर पूरी खाड़ी में फैल सकता है जिससे उसका खुद का आर्थिक और सामरिक हित खतरे में पड़ सकता है।

राजनीतिक बयानबाज़ी

अमेरिकी राष्ट्रपति ने संघर्ष पर चिंता जताई है और संयम बरतने की अपील की है, लेकिन इज़राइल की सैन्य कार्रवाई को 'आत्मरक्षा' बताया है। इससे मुस्लिम देशों में अमेरिका की साख और कमजोर हो सकती है।

कूटनीतिक दबाव

अमेरिका ने सऊदी अरब, क़तर, और यूएई जैसे देशों के साथ मिलकर ईरान पर दबाव बनाने की कूटनीतिक पहल की है ताकि यह युद्ध सीमित रखा जा सके।

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रूस और चीन की स्थिति

रूस

रूस इस संघर्ष को यूक्रेन युद्ध से ध्यान भटकाने का अवसर मान रहा है। रूस ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है, लेकिन वह गुप्त रूप से ईरान को सैन्य उपकरण और टेक्नोलॉजी उपलब्ध करा सकता है, जैसा कि उसने सीरिया में किया था।

इसके अलावा, तेल की कीमतों में वृद्धि रूस के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद है, जिससे उसकी तेल और गैस से होने वाली आमदनी में इज़ाफ़ा हुआ है।

चीन

चीन, जो ईरान का रणनीतिक साझेदार है, इस संघर्ष को लेकर सतर्क है। उसने अपने नागरिकों को ईरान और इज़राइल दोनों से निकालने के निर्देश दिए हैं।

चीन ने संयम की अपील की है लेकिन पर्दे के पीछे वह ईरान को आर्थिक सहायता देना जारी रख सकता है। चीन की 'बेल्ट एंड रोड' परियोजना के लिए खाड़ी क्षेत्र में शांति बेहद ज़रूरी है।

भारत की स्थिति और संभावित प्रभाव

भारत के लिए यह संघर्ष दोहरे संकट की तरह है। एक ओर उसके ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर इज़राइल उसके प्रमुख रक्षा साझेदारों में से एक है।

ऊर्जा संकट

भारत अपनी तेल ज़रूरतों का लगभग 80% आयात करता है। यदि यह संकट लंबा चला और तेल की कीमतें $110–$120 प्रति बैरल तक पहुंचीं, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव पड़ सकता है।

विदेश नीति का संतुलन

भारत को दोनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन होगा। एक ओर इज़राइल के साथ रक्षा तकनीक और साइबर सुरक्षा में सहयोग है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ चाबहार पोर्ट जैसी परियोजनाएं और रणनीतिक सहयोग भी हैं।

प्रवासी भारतीयों पर खतरा


ईरान और खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। संघर्ष बढ़ने से इनकी सुरक्षा पर भी सवाल उठ सकता है।

कूटनीतिक पहल की संभावना


भारत ने अब तक तटस्थ रुख अपनाया है, लेकिन यदि युद्ध लंबा खिंचा, तो संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से भारत मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर सकता है।

मानवाधिकार और मानवीय संकट

इस युद्ध ने मध्य पूर्व में एक गंभीर मानवीय संकट को जन्म दिया है।

विस्थापन:
अब तक 5 लाख से अधिक लोग संघर्षग्रस्त इलाकों से पलायन कर चुके हैं।

बुनियादी सेवाएं ठप:
बिजली, पानी और अस्पतालों की सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।

मानवाधिकार उल्लंघन: दोनों देशों पर नागरिक ठिकानों को निशाना बनाने और युद्ध अपराधों के आरोप लग रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इसकी जांच की मांग की है।

आगे का रास्ता


इस संघर्ष का समाधान सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं हो सकता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक ठोस और प्रभावी कूटनीतिक योजना बनानी होगी। संयुक्त राष्ट्र की भूमिका इस समय बहुत महत्वपूर्ण है। साथ ही क्षेत्रीय शक्तियों जैसे सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र को मध्यस्थता में शामिल करना भी ज़रूरी होगा।

ईरान–इज़राइल युद्ध सिर्फ दो राष्ट्रों के बीच का संघर्ष नहीं रह गया है। यह एक ऐसा टकराव बन चुका है जिसमें वैश्विक राजनीति, आर्थिक संतुलन और ऊर्जा सुरक्षा तीनों ही प्रभावित हो रहे हैं। भारत, अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश इस युद्ध के परोक्ष भागीदार बन गए हैं—चाहे वह आर्थिक, कूटनीतिक या सामरिक दृष्टिकोण से हो।

इस युद्ध का भविष्य क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय किस हद तक मध्यस्थता में सक्रिय होता है और क्या ईरान तथा इज़राइल इस संघर्ष को सीमित रखने पर सहमत हो पाते हैं या नहीं।

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