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प्राकृतिक सौंदर्य और कलात्मक में जम्मू के श्रीनगर से कम नहीं है उत्तराखण्ड का श्रीनगर, घूमने जाएं तो इन जगहों की जरूर करें सैर

जम्मू-कश्मीर में मौजूद श्रीनगर के अलावा उत्तराखंड राज्य में भी एक ऐसी हसीन जगह है जिसे भी श्रीनगर के नाम से जाना जाता है। मनमोहक पहाड़ों और हसीन वादियों में के बीच में मौजूद उत्तराखंड का श्रीनगर मई-जून और जुलाई में घूमने के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है।

Posts by : Geeta | Updated on: Wed, 17 May 2023 3:02:32

प्राकृतिक सौंदर्य और कलात्मक में जम्मू के श्रीनगर से कम नहीं है उत्तराखण्ड का श्रीनगर, घूमने जाएं तो इन जगहों की जरूर करें सैर

श्रीनगर या श्री गड़वाळ भारत के उत्तराखण्ड राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित एक नगर है। यह अलकनन्दा नदी के किनारे बसा हुआ है। जम्मू-कश्मीर में मौजूद श्रीनगर के अलावा उत्तराखंड राज्य में भी एक ऐसी हसीन जगह है जिसे भी श्रीनगर के नाम से जाना जाता है। मनमोहक पहाड़ों और हसीन वादियों में के बीच में मौजूद उत्तराखंड का श्रीनगर मई-जून और जुलाई में घूमने के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है।

बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित, श्रीनगर पौराणिक काल से ही महत्वपूर्ण रहा है। श्रीपुर या श्रीक्षेत्र उसके बाद नगर के बदलाव सहित श्रीनगर, टिहरी के अस्तित्व में आने से पहले एकमात्र शहर था। वर्ष 1680 में यहां की जनसंख्या 7,000 से अधिक थी तथा यह एक वाणिज्यिक केंद्र जो बाजार के नाम से जाना जाता था, पंवार वंश का दरबार बना। कई बार विनाशकारी बाढ़ का सामना करने के बाद अंग्रेजों के शासनकाल में एक सुनियोजित शहर के रूप में उदित हुआ और अब गढ़वाल का सर्वश्रेष्ठ शिक्षण केंद्र है। विस्थापन एवं स्थापना के कई दौर से गुजरने की कठिनाई के बावजूद इस शहर ने कभी भी अपना उत्साह नहीं खोया और बद्री एवं केदार धामों के रास्ते में तीर्थयात्रियों की विश्राम स्थली एवं शैक्षणिक केंद्र बना रहा है और अब भी वह स्वरूप विद्यमान है।

श्रीनगर, अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है जो नदी यह गढ़वाल हिमालय की ओर बहती है। यह बद्रीनाथ मंदिर के रास्ते के केंद्रीय स्थल तथा उन सडक़ों के मिलनस्थल पर है जो कोटद्वार, ऋषिकेश, टिहरी गढ़वाल, केदारनाथ तथा बद्रीनाथ को जाती हैं।

श्रीनगर की जलवायु अपेक्षाकृत गर्म होने के कारण यहां शीशम, आम, पीपल, कचनार, तेजपत्ता एवं सिमल के पेड़ काफी होते हैं। श्रीनगर के आस-पास के क्षेत्रों में पर्णागों की कई प्रजातियां खासकर मानसूनी महीनों में पायी जाती है। श्रीनगर के इर्द-गिर्द बिल्ली प्रजाति के कई जीव यहां पाये जाते है जिनमें तेंदुआ, सिवेट बिल्ली, चीता एवं जंगली बिल्ली शामिल हैं। इसके अलावा गीदड़, सांभर (हिरण), गुराल, साही भी मिलते हैं। आमतौर पर बंदर देखे जाते हैं। गढ़वाल के इस भाग में पक्षियों के 400 से अधिक प्रजातियां हैं। इनमें कस्तूरिका, काला सिर का पक्षी, काले माथे का पीला बुलबुल, गुलाबी मिनिवेट, हंसोड़ सारिका, स्वर्णिम पीठ का कठफोरबा तथा नीली मक्खी पकडऩे वाला पक्षी शामिल हैं। जल पक्षियों में हंस, बत्तख, कढ़े पर का पक्षी तथा बगुला शामिल हैं, जो नदी के किनारे पाये जाते हैं।

इस आर्टिकल में हम आपको श्रीनगर में मौजूद ऐसी मनमोहक जगहों के बारे में बताने जा रहे हैं जहां आप भी पार्टनर, परिवार और दोस्तों के साथ हसीन और रोमाचंक पल बिताने जा सकते हैं।

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कमलेश्वर/सिद्धेश्वर मंदिर

यह श्रीनगर का सर्वाधिक पूजित मंदिर है। कहा जाता है कि जब देवता असुरों से युद्ध में परास्त होने लगे तो भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र प्राप्त करने के लिये भगवान शिव की आराधना की। उन्होंने उन्हें 1,000 कमल फूल अर्पित किये (जिससे मंदिर का नाम जुड़ा है) तथा प्रत्येक अर्पित फूल के साथ भगवान शिव के 1,000 नामों का ध्यान किया। उनकी जांच के लिये भगवान शिव ने एक फूल को छिपा दिया। भगवान विष्णु ने जब जाना कि एक फूल कम हो गया तो उसके बदले उन्होंने अपनी एक आंख (आंख को भी कमल कहा जाता है) चढ़ाने का निश्चय किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान कर दिया, जिससे उन्होंने असुरों का विनाश किया।

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शंकर मठ

यह पुराने श्रीनगर का एक प्राचीन मंदिर है जो वर्ष 1894 की बाढ़ को झेलने के बाद भी विद्यमान है जबकि इसका निचला भाग टनों मलवे से भर गया। इस मंदिर के निर्माणकत्र्ता पर मतभेद है, पर केदार खंड में देवल ऋषि तथा राजा नहुष का वर्णन है जिन्होंने यहां तप किया था। इस स्थान को ठाकुर द्वारा भी कहते हैं। वर्ष 1670 में फतेहपति शाह द्वारा जारी एक ताम्र-पात्र के अनुसार तत्कालीन धर्माधिकारी शंकर धोमाल ने यहां यह जमीन खरीदा तथा राजमाता की अनुमति से यहां एक मंदिर की स्थापना की। मंदिर में एक बड़ा मंडप है और चूंकि इसमें कोई खंभा नहीं है, अत: यह तत्कालीन पत्थर वास्तुकला की खोज का उदाहरण है।

मंदिर का निर्माण पत्थरों के टुकड़ों को काटकर उत्तराखंड की विशिष्ट वास्तुकला शैली में हुआ है। मंदिर की मूत्र्तियां एवं प्रतिमाएं भी सुंदर एवं मनोरम मूत्र्तिकला के नमूने हैं, जो गर्भगृह में लक्ष्मी नारायण, शालिग्राम निर्मित भगवान विष्णु है। दरवाजे पर बंगला, तामिल तथा तेलगु भाषा में शिलालेख हैं, यद्यपि अब ये स्पष्ट नहीं रहे हैं।

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केशोराय मठ

अलकनंदा के किनारे अवस्थित श्रीनगर में यह सबसे बड़ा मंदिर हैं। शंकरमठ की तरह ही यह पत्थरों के टुकड़ों से बना है जिसका विशाल आकार आश्चर्य चकित कर देता है। वर्ष 1682 में केशोराय द्वारा निर्मित यह मंदिर वर्ष 1864 की बाढ़ में डूबकर भी खड़ा रहा। कहा जाता है कि बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा का निश्चय करते समय केशोराय बूढ़ा हो गया था। जब वह इस खास स्थल पर विश्राम कर रहा था तो नारायण ने सपने में उसे वह जगह खोदने को कहा जहां वह लेटा था। उसने जब इसे खोदा तो उसे नारायण की एक मूत्र्ति मिली और उसने इसके इर्द-गिर्द मंदिर की स्थापना कर दी।

इसके ध्वंशावशेष से प्रतीत होता हैं कि मंदिर कितना सुंदर रहा होगा जिसे ढहकर नष्ट होने दिया गया। इसकी छत पर पीपल के पेड़ उग आये हैं। प्रवेश द्वार नष्ट हो चुका है तथा जिस जगह प्रतिमा थी, वह जगह खाली है।

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जैन मंदिर

वर्ष 1894 की बाढ़ के बाद काफी खर्च कर भालगांव के जैनियों ने मूल पारसनाथ जैन मंदिर का पुनर्निर्माण किया। मंदिर का निर्माण वर्ष 1925 में प्रताप सिंह एवं मनोहर लाल की पहल पर हुआ तथा श्रीनगर के दांतू मिस्त्री ने प्रभावकारी नक्काशी की। छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते हुए विशाल प्रवेश द्वार, केंद्रीय कक्ष एवं डंदीयाल या बरामदे का पुनर्निर्माण किया गया। गर्भ गृह में एक राजस्थानी शैली में निर्मित सिंहासन है तथा चौपाये सिंहासन पर मूर्ति विराजमान है। वर्ष 1970 में प्रसिद्ध जैन मुनि श्री विद्यानंदजी यहां आकर कुछ दिनों तक ठहरे थे।

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श्री गुरूद्वारा/हेमकुंड साहिब

कहा जाता है कि जहां आज गुरूद्वारा बना है वहां कभी एक बागान था जिसमें तीर्थ यात्रियों के ठहरने की एक छोटी जगह थी। एक तीर्थ यात्री गुरू गोविंद सिंह लिखित कुछ ग्रंथ ले आये और इसे सहेज कर रखने के लिये गुरूद्वारा का निर्माण हुआ। वे अब भी गुरूद्वारा में संरक्षित हैं। वर्ष 1937 में हेमकुंड साहिब की तीर्थ यात्रा होने पर ही इस धार्मिक स्थान पर पैदल यात्रा कर रहे भक्तों को भोजन एवं आवास मुहैया कराने के लिये एक गुरूद्वारा समिति की स्थापना हुई। हेमकुंड साहिब के रास्ते कई गुरूद्वारों का निर्माण हुआ तथा यह गुरूद्वारा हरिद्वार एवं ऋषिकेश के बाद तीसरा है।

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कीर्तिनगर

श्रीनगर में किसी अद्भुत और मनमोहक जगह पर घूमने की बात होती है तो सबसे पहले यहां मौजूद कीर्तिनगर की बात होती है। मुख्य शहर से लगभग 6 किमी की दूरी पर मौजूद कीर्तिनगर एक बेहद ही खूबसूरत गांव है। कीर्तिनगर सैलानियों के बीच काफी फेमस है, क्योंकि यह अलकनंदा नदी के किनारे बसा हुआ है। नदी की लहरों के किनारे सुकून का पल बिताने के लिए कई सैलानी पहुंचते हैं। यहां से हिमालय की अद्भुत खूबसूरती का लुत्फ़ भी उठा सकते हैं। अगर आप श्रीनगर घूमने जा रहे हैं तो कीर्तिनगर में रूम लेकर ठहर भी सकते हैं।

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वैली व्यू पॉइंट

श्रीनगर शहर से कुछ ही दूरी पर मौजूद वैली व्यू पॉइंट किसी जन्नत से कम नहीं है। इस जगह के बारे में बोला जाता है कि जम्मू-कश्मीर का श्रीनगर भी व्यू पॉइंट के आगे फीका लगता है। वैली व्यू पॉइंट से आप हिमालय के शानदार दृश्यों को अपनी यादों में कैद कर सकते हैं। इस पॉइंट से श्रीनगर शहर की खूबसूरती को भी निहार सकते हैं। आपको बता दें कि बर्फबारी के समय इस जगह की खूबसूरती चरम पर होती है।

नौर

अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं और आप उत्तराखंड की सबसे हसीन जगह घूमना पसंद करते हैं तो फिर बिना अधिक समय लिए आपको नौर पहुंच जाना चाहिए। हसीन पहाड़, खूबसूरत नदी, देवदार के पेड़ और जगह-जगह मौजूद घास के मैदान इस जगह की खूबसूरती में चार चांद लगाने का काम करते हैं। नौर उत्तराखंड की उन शहरों में शामिल रहता है जो हर समय घने बादलों से घिरा रहता है। जब भारत के अन्य राज्यों में भीषण गर्मी पड़ती है तब यहां का मौसम सुहावना होता है। यहां आप स्थानीय परंपरा को भी बेहद करीब से देख सकते हैं। नौर श्रीनगर से कुछ ही दूरी पर मौजूद एक गांव है।

श्रीनगर में घूमने की अन्य मनमोहक जगहें

कीर्तिनगर, वैली व्यू पॉइंट और नौर के अलावा ऐसी अन्य कई अभूत जगहें मौजद हैं, जहां आप घूमने के लिए जा सकते हैं। धारी देवी मंदिर, देवलगढ़ रोड और मलेथा जैसी बेहतरीन जगहों को भी एक्सप्लोर कर सकते हैं। इसके अलावा गोला बाजार में अपने लिए शॉपिंग भी कर सकते हैं।

श्रीनगर कैसे पहुंचें?

श्रीनगर पहुंचना बेहद आसान है। यहां आप आसानी से ऋषिकेश या हरिद्वार से बस लेकर पहुंच सकते हैं। ऋषिकेश से श्रीनगर की दूरी लगभग 109 किमी है। उत्तराखंड के देवप्रयाग से भी आप आसानी से श्रीनगर पहुंच सकते हैं। देवप्रयाग से श्रीनगर की दूरी लगभग 36 किमी है। देवप्रयाग से टैक्सी या कैब लेकर आसानी से पहुंच सकते हैं।

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