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त्रियुगीनारायण मंदिर में हुआ था शिव पार्वती का विवाह, जानें इसके बारे में

इसलिए इस जगह का नाम त्रियुगी पड़ गया जिसका मतलब है, अग्नि जो यहाँ तीन युगों से जल रही है। जैसा कि यह अग्नि नारायण मंदिर में स्थित है, इसलिए इसे पूरा त्रियुगीनारायण मंदिर कहा जाता है।

Posts by : Anuj | Updated on: Sat, 21 Oct 2023 6:03:51

त्रियुगीनारायण मंदिर में हुआ था शिव पार्वती का विवाह, जानें इसके बारे में

उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां शादी करने वाले जोड़े की जिंदगी संवर जाती है। इसी मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। आज भी इनकी शादी की निशानियां यहां मौजूद हैं। पौराणिक मंदिरों में से एक यह मंदिर उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण गाँव में स्थित है। यह गाँव रुद्रप्रयाग जिले का ही एक भाग है। इस मंदिर की एक खास विशेषता है, मंदिर के अंदर जलने वाली अग्नि जो सदियों से यहाँ जल रही है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव जी और देवी पार्वती जी ने इसी अग्नि को साक्षी मानकर विवाह किया था। इसलिए इस जगह का नाम त्रियुगी पड़ गया जिसका मतलब है, अग्नि जो यहाँ तीन युगों से जल रही है। जैसा कि यह अग्नि नारायण मंदिर में स्थित है, इसलिए इसे पूरा त्रियुगीनारायण मंदिर कहा जाता है।

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शिव पार्वती के विवाह में विष्णुजी बने थे पार्वती के भाई

धार्मिक मान्यता है कि माता-पार्वती और भगवान शिव के विवाह में भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी और भाई द्वारा बहन की शादी में की जाने वाली सभी रस्में भगवान विष्णु ने ही पूरी की थीं। इस मंदिर में स्थित कुंड के बारे में कहा जाता है कि विवाह संस्कार कराने से पूर्व भगवान विष्णु ने इसी कुंड में स्नान किया था।

शिवजी का प्रेम प्रस्ताव

ऐसा माना जाता है कि आज का गुप्तकाशी जो केदारनाथ जाने का रास्ता है, यह वही जगह है जहाँ भगवान शिव जी ने देवी पार्वती जी के समक्ष अपना प्रेम प्रस्ताव रखा। गुप्तकाशी मंदाकिणी नदी के तट पर बसा है।अंत में भगवान शिव जी और देवी पार्वती जी का विवाह, राजधानी त्रियुगीनारायण में राजा हिमवत के मार्गदर्शन के साथ सम्पूर्ण हुआ।

त्रियुगीनारायण मंदिर का इतिहास

माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को विवाह हेतु प्रसन्न किया और भगवान शिव ने माता पार्वती के प्रस्ताव को स्वीकार किया। माना जाता है शिव-पार्वती का विवाह इसी मंदिर में सम्पन्न हुआ था। भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भ्राता होने का कर्तव्य निभाते हुए उनका विवाह संपन्न करवाया। ब्रह्मा जी इस विवाह में पुरोहित थे। इस मंदिर के सामने अग्निकुंड के ही फेरे लेकर शिव-पार्वती का विवाह हुआ था। उस अग्निकुंड में आज भी लौ जलती रहती है। यह लौ शिव-पार्वती विवाह की प्रतीक मानी जाती है, इसलिए इस मंदिर को अखंड धूनी मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के पास ही तीन कुण्ड भी है। ब्रह्माकुण्ड:- इस कुण्ड में ब्रह्मा जी ने विवाह से पूर्व स्नान किया था व स्नान करने के पश्चात विवाह में प्रस्तुत हुए। विष्णुकुण्ड:- विवाह से पूर्व विष्णु जी ने इस कुण्ड में स्नान किया था। रुद्रकुण्ड:- विवाह में उपस्थित होने वाले सभी देवी-देवताओं ने इस कुण्ड में स्नान किया था।

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फेरों के समय यहां बैठे थे शिव-पार्वती

शिव-पार्वती विवाह में भगवान ब्रह्माजी ने पुरोहित का कार्य किया था और शिव-पार्वती के विवाह संस्कार को संपन्न कराया था।इस मंदिर में वह स्थान आप देख सकते हैं जहां, फेरों के समय शिव -पार्वती ने आसन ग्रहण किया था।

अखंड धुनि मंदिर

भक्तगण जो भी यहाँ जाते हैं, सूखी लकड़ियों को इस अखंड धुनि में डाल अग्नि से कुछ राख को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसलिए इस मंदिर को उत्तराखंड का अखंड धुनि मंदिर भी कहा जाता है। भक्तगण मंदिर के दर्शन कर गौरी कुंड के भी दर्शन करने के लिए आगे बढ़ते हैं जो यहाँ से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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