निर्देशक: गीतू मोहनदास
कलाकार: यश, कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत, अक्षय ओबेरॉय, सुदेव नायर
अवधि: 3 घंटे 14 मिनट 20 सैकंड
यश की फिल्मों से दर्शकों की उम्मीदें अब केवल कहानी और अभिनय तक सीमित नहीं रहतीं। उनके नाम के साथ एक बड़े पैमाने की फिल्म, दमदार नायक और भव्य एक्शन की अपेक्षा भी जुड़ी होती है। गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ इन्हीं अपेक्षाओं को पूरा करने की कोशिश करती है, लेकिन साथ ही यह सामान्य नायक-केंद्रित मारधाड़ वाली फिल्म से आगे जाने का प्रयास भी करती है। फिल्म में अपराध की दुनिया है, सत्ता की भूख है, परिवार है, प्रेम है, पिता-पुत्र का तनाव है और ऐसे रिश्ते हैं जो समय के साथ टूटते और फिर किसी नए रूप में सामने आते हैं।
यही इसकी खूबी भी है और कमजोरी भी। फिल्म का संसार बहुत बड़ा है, दृश्य बेहद भव्य हैं और यश पर्दे पर जबरदस्त प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन कहानी को संभालने की कोशिश में कई बार पटकथा जरूरत से ज्यादा उलझ जाती है। तीन घंटे से अधिक की अवधि में फिल्म कई प्रभावशाली क्षण देती है, लेकिन हर हिस्सा समान मजबूती से काम नहीं करता।
पांच दशकों में फैली अपराध की दुनिया
‘टॉक्सिक’ की कहानी कई दशकों में फैली हुई है और स्वतंत्रता के बाद के गोवा की पृष्ठभूमि में अपराध, व्यापार और सत्ता की ऐसी दुनिया रचती है, जहां ताकत हासिल करना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है। इसी माहौल में राया अपने पिता द्वारा खड़े किए गए साम्राज्य को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है। उसकी बड़ी बहन गंगा इस संघर्ष में उसके साथ खड़ी है और दोनों की महत्वाकांक्षा परिवार की विरासत को अपने नियंत्रण में रखने की है।
राया का सफर सीधा नहीं है। सत्ता और अपराध की दुनिया में आगे बढ़ते हुए उसका निजी जीवन लगातार बिखरता जाता है। उसके संबंध कई लोगों से बनते हैं और इन्हीं में नादिया भी शामिल है, जो उसके जीवन में भावनात्मक भूमिका निभाती है और उसके बच्चे की मां बनती है।
राया की सबसे बड़ी भूलों में से एक उसके अपने बेटे से जुड़ी है। वह बच्चे से दूर हो जाता है और वर्षों बाद वही बेटा टिकट के रूप में वापस लौटता है। इसके बाद कहानी का मूल संघर्ष केवल अपराध जगत में वर्चस्व की लड़ाई नहीं रहता, बल्कि पिता और बेटे के बीच पुराने घाव और हिसाब-किताब भी इसका हिस्सा बन जाते हैं।
राया और टिकट के रूप में यश का सबसे बड़ा आकर्षण
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यश का दोहरा किरदार है। राया और टिकट एक ही परिवार से आते हैं, लेकिन दोनों की सोच, व्यवहार और भावनात्मक स्थिति में काफी अंतर है।
राया को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है, जिसने अपनी ताकत और भय के सहारे अपराध की दुनिया में अपना स्थान बनाया है। वह महत्वाकांक्षी है और अपने लक्ष्य के लिए जोखिम उठाने से पीछे नहीं हटता। टिकट दूसरी ओर उस अतीत का परिणाम है, जिसे राया ने खुद पीछे छोड़ दिया था।
यश दोनों किरदारों के बीच फर्क कायम रखने में सफल रहते हैं। राया के रूप में उनका व्यक्तित्व अधिक आक्रामक और प्रभावशाली है, जबकि टिकट में एक अलग तरह की बेचैनी और भावनात्मक तनाव दिखाई देता है। खास बात यह है कि यश केवल मारधाड़ वाले दृश्यों में ही प्रभावी नहीं हैं। शांत दृश्यों और भावनात्मक क्षणों में भी वह अपने किरदार को पकड़कर रखते हैं।
फिल्म की लंबी अवधि में यदि कोई एक चीज लगातार दर्शक का ध्यान बांधे रखती है तो वह यश की पर्दे पर मौजूदगी है। यही वजह है कि जिन हिस्सों में कहानी कमजोर पड़ती है, वहां भी फिल्म पूरी तरह बिखरती नहीं है।
नयनतारा की गंगा कहानी को देती हैं मजबूती
नयनतारा गंगा की भूमिका में हैं और उनका किरदार राया की कहानी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। वह केवल मुख्य नायक की बहन बनकर नहीं रहतीं, बल्कि अपराध और सत्ता के इस संसार में उनकी अपनी भूमिका दिखाई देती है।
राया और गंगा के रिश्ते में भाई-बहन का अपनापन भी है और सत्ता की साझेदारी भी। दोनों एक-दूसरे की ताकत हैं, लेकिन परिस्थितियां उनके सामने ऐसे सवाल भी खड़े करती हैं, जहां रिश्ते और महत्वाकांक्षा आमने-सामने आ जाते हैं।
नयनतारा ने गंगा के कठोर व्यक्तित्व और उसके भीतर छिपी भावनाओं को संतुलित करने की कोशिश की है। फिल्म के कई हिस्सों में उनका किरदार कथा को एक अलग दिशा देता है।
कियारा, हुमा, तारा और रुक्मिणी ने बढ़ाईं कहानी की परतें
कियारा आडवाणी नादिया के रूप में दिखाई देती हैं। उनका किरदार राया की उथल-पुथल भरी दुनिया में भावनात्मक पक्ष लेकर आता है। कियारा ने नादिया की संवेदनशीलता और उसकी परिस्थितियों से पैदा हुई असुरक्षा को सहजता से निभाया है।
हुमा कुरैशी की एलिजाबेथ भी कहानी में अपनी अलग जगह बनाती हैं। तारा सुतारिया रेबेका की भूमिका में हैं, जबकि रुक्मिणी वसंत मेलिसा के किरदार में खास प्रभाव छोड़ती हैं। मेलिसा का चरित्र जिस तरह कहानी में खुलता है, उससे रुक्मिणी को अभिनय का पर्याप्त अवसर मिलता है।
इन महिला पात्रों की खासियत यह है कि वे केवल नायक के आसपास घूमने वाले पात्र नहीं हैं। उनके अपने निर्णय और अपनी परिस्थितियां हैं। यही पहलू फिल्म की प्रस्तुति को सामान्य पुरुष-केंद्रित अपराध कथाओं से कुछ अलग करता है।
फिल्म का दृश्य संसार सबसे मजबूत पक्ष
‘टॉक्सिक’ का दृश्य पक्ष निश्चित रूप से इसकी बड़ी उपलब्धि है। फिल्म में पुराने दौर की अपराधी दुनिया को बड़े पैमाने पर रचा गया है। परिधान, स्थान, इमारतें और अपराध जगत से जुड़े ठिकानों को एक खास शैली में प्रस्तुत किया गया है।
कई दृश्यों में भारतीय परिवेश के भीतर विदेशी अपराध कथाओं जैसी दृश्यात्मक भव्यता दिखाई देती है। पात्रों के परिचय और कुछ बड़े दृश्य विशेष रूप से प्रभाव पैदा करते हैं। फिल्म को छोटे पर्दे की बजाय सिनेमाघर के लिए तैयार किया गया महसूस होता है। निर्देशक ने दृश्यात्मकता को केवल सजावट के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया है। कई जगह वातावरण ही कहानी का हिस्सा बन जाता है। हालांकि, कभी-कभी यही भव्यता कहानी से ज्यादा ध्यान खींचने लगती है।
एक्शन में है भरपूर दम, लेकिन अति भी महसूस होती है
फिल्म का दूसरा भाग विशेष रूप से बड़े पैमाने की मारधाड़ से भरा हुआ है। यश के प्रशंसकों को इसमें कई ऐसे दृश्य मिलेंगे, जिनमें उनके सितारे वाली छवि पूरी तरह सामने आती है। मारधाड़ के दृश्यों में गति, आकार और प्रस्तुति का स्तर बड़ा रखा गया है। लेकिन समस्या तब आती है जब कुछ दृश्य कहानी की जरूरत से अधिक लंबे या अतिनाटकीय लगने लगते हैं।
फिल्म बार-बार अपने नायक की ताकत और दबदबे को स्थापित करती है। यह तरीका शुरुआत में प्रभाव पैदा करता है, लेकिन लगातार दोहराए जाने पर इसकी चमक कुछ कम हो जाती है। कुछ दृश्यों में ऐसा महसूस होता है कि कहानी आगे बढ़ाने की बजाय नायक की छवि को बड़ा बनाने पर अधिक जोर दिया गया है।
पटकथा है फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी
‘टॉक्सिक’ की सबसे बड़ी समस्या इसकी पटकथा है। फिल्म के पास पर्याप्त सामग्री है, लेकिन उसे एक सहज और लगातार प्रभावी कथा में पिरोना हर जगह संभव नहीं हो पाया।
पहले भाग में किरदारों और उनकी दुनिया को स्थापित करने में काफी समय लगता है। यह जरूरी भी है, क्योंकि कहानी कई पात्रों और कई रिश्तों से जुड़ी है। लेकिन कुछ जगह गति इतनी धीमी हो जाती है कि दर्शक की उत्सुकता कमजोर पड़ सकती है।
इसके बाद मध्यांतर के आसपास कहानी जोर पकड़ती है और दूसरे भाग में घटनाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं। लेकिन यहां समस्या दूसरी है। कहानी इतनी सारी घटनाओं, भावनाओं और संघर्षों को एक साथ समेटने की कोशिश करती है कि कुछ हिस्सों में स्वाभाविक प्रवाह टूटता हुआ महसूस होता है।
निर्देशक दर्शक को हर बात सीधे समझाने के बजाय संकेतों और घटनाओं के माध्यम से कहानी समझने का अवसर देती हैं। यह प्रयोग सराहनीय है, लेकिन कुछ जगह इसका परिणाम उलझन के रूप में सामने आता है।
भावनाएं हैं, लेकिन हर जगह सहज नहीं
फिल्म में भावनात्मक सामग्री की कोई कमी नहीं है। पिता-पुत्र का रिश्ता, भाई-बहन का संबंध, प्रेम, परिवार और वफादारी लगातार कहानी के साथ चलते हैं।
समस्या यह है कि कई बार फिल्म इन भावनाओं को बहुत ऊंचे स्वर में पेश करती है। दृश्य, संवाद, संगीत और अभिनय सभी एक साथ भावनात्मक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं। जहां यह तरीका कुछ दृश्यों को यादगार बनाता है, वहीं कुछ हिस्से जरूरत से ज्यादा नाटकीय लग सकते हैं।
यही कारण है कि फिल्म की भावनात्मक कहानी से जुड़ाव हर दर्शक के लिए समान नहीं रहेगा। कुछ दर्शक राया और टिकट के संघर्ष को गहराई से महसूस करेंगे, जबकि कुछ को यह प्रस्तुति जरूरत से ज्यादा भारी लग सकती है।
क्या फिल्म अपनी अलग पहचान बना पाती है?
‘टॉक्सिक’ देखते समय अपराध जगत और शक्तिशाली नायक पर बनी कुछ चर्चित फिल्मों की याद आना स्वाभाविक है। फिल्म में नायक का प्रभुत्व, अपराध का साम्राज्य और बड़े पैमाने की मारधाड़ जैसे परिचित तत्व मौजूद हैं।
फिर भी, इसे किसी दूसरी फिल्म की सीधी छाया कहना उचित नहीं होगा। गीतू मोहनदास ने कहानी में महिला पात्रों को पर्याप्त महत्व दिया है और पिता-पुत्र के संबंध को केंद्रीय संघर्ष बनाकर इसे अपनी अलग दिशा देने की कोशिश की है।
फिल्म की दृश्य शैली भी इसे अपनी पहचान देने का प्रयास करती है। हालांकि, कुछ जगह यह प्रयास इतना स्पष्ट दिखाई देता है कि कहानी पीछे छूटती हुई लगती है।
क्लाइमैक्स छोड़ता है असर
फिल्म के अंतिम हिस्से में कहानी राया और टिकट के संघर्ष को निर्णायक दिशा में ले जाती है। यहां तक पहुंचते-पहुंचते दोनों किरदारों का अतीत, उनके फैसले और उनके बीच की दूरी एक साथ सामने आने लगती है।
क्लाइमैक्स में कहानी सीधे रास्ते पर नहीं चलती और कुछ अप्रत्याशित मोड़ सामने आते हैं। फिल्म खत्म होने के बाद भी कुछ घटनाएं और किरदार दर्शक के दिमाग में बने रहते हैं।
हालांकि, अंतिम हिस्से तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म की लंबी अवधि का असर भी महसूस होने लगता है। यदि संपादन और पटकथा कुछ हिस्सों में अधिक कसाव रखती, तो अंतिम प्रभाव और मजबूत हो सकता था।
‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ ऐसी फिल्म है जिसमें कमियां भी
बड़ी हैं और खूबियां भी। यह छोटे पैमाने की साधारण कहानी नहीं है। गीतू
मोहनदास ने अपराध, परिवार, प्रेम, सत्ता और बदले को एक विशाल संसार में
रखने की कोशिश की है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यश हैं। राया और टिकट
के रूप में उनका दोहरा अभिनय, उनका व्यक्तित्व और पर्दे पर उनकी ऊर्जा
फिल्म को लगातार संभालती है। नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा
सुतारिया और रुक्मिणी वसंत भी कहानी को अलग-अलग भावनात्मक परतें देते हैं।
फिल्म
का दृश्य संसार प्रभावशाली है और बड़े पर्दे पर इसका असर निश्चित रूप से
ज्यादा महसूस होता है। मारधाड़ के दृश्यों में भी बड़े पैमाने का काम दिखाई
देता है। लेकिन तीन घंटे से अधिक की अवधि, असमान गति, कुछ जगह जरूरत से
ज्यादा भावुक प्रस्तुति और पटकथा का बिखराव इसकी चमक को कम करते हैं।
‘टॉक्सिक’
उन दर्शकों के लिए ज्यादा बेहतर अनुभव हो सकती है, जो यश के प्रशंसक हैं
और बड़े पर्दे पर भव्य अपराध कथाएं तथा जोरदार मारधाड़ देखना पसंद करते
हैं। जो दर्शक बहुत कसी हुई पटकथा और सहज भावनात्मक कहानी की उम्मीद लेकर
जाएंगे, उन्हें कुछ हिस्से निराश कर सकते हैं।
कुल मिलाकर,
‘टॉक्सिक’ एक महत्वाकांक्षी फिल्म है, जो अपनी भव्यता और यश के दमदार अभिनय
से प्रभावित करती है, लेकिन अपनी लंबी अवधि और असमान पटकथा के कारण उस
ऊंचाई तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती, जिसकी इससे उम्मीद की गई थी।













