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बना रहे हैं दिवाली पर बनारस घूमने का प्लान, ये 6 जगहें देगी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का जुड़ाव

आज इस कड़ी में हम आपको बनारस के कुछ ऐसे पर्यटन स्थलों के बारे में बताने जा रहे हैं जो आस्था के साथ पौराणिक महत्व भी रखते हैं।

Posts by : Ankur Mundra | Updated on: Thu, 21 Oct 2021 9:20:32

बना रहे हैं दिवाली पर बनारस घूमने का प्लान, ये 6 जगहें देगी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का जुड़ाव

भारत में घूमने के लिए कई जगहें हैं और जब घूमने का प्लान करते हैं तो इनमें से चुनाव करना मुश्किल हो जाता हैं। दिवाली के दिनों में भी लोग घूमने की प्लानिंग करते हैं। इस दौरान ऐसी जगहों का चुनाव किया जाता हैं जिनसे प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का जुड़ाव हो। ऐसे में आप बनारस घूमने का प्लान बना सकते हैं जहां के पर्यटन स्थल मन को सुकून देने वाले होते हैं। आज इस कड़ी में हम आपको बनारस के कुछ ऐसे पर्यटन स्थलों के बारे में बताने जा रहे हैं जो आस्था के साथ पौराणिक महत्व भी रखते हैं।

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गंगा नदी

बनारस की सबसे पवित्र और सबसे बड़ी नदी गंगा नदी है। बनारस इसी नदी के किनारे बसा हुआ है। यह नदी अपने आप में ही हमारे देश की एक सांस्कृतिक धरोहर को समेटे हुए है। बनारस के ज्यादातर मंदिर इसी नदी के आस-पास स्थित हैं। बनारस में कुल 88 घाट हैं जो की गंगा नदी के तट पर बसे हैं। देश-विदेश से हमारे श्रद्धालु भक्त और पर्यटक यहाँ गंगा नदी में स्नान करने आते हैं। हम सब जानते हैं की इंसान गलतियों का पुतला है और अपनी गलतियों के कारण ही जाने-अनजाने में कभी-कभी कुछ पाप भी कर बैठता है। हिन्दू धर्म के अनुसार, गंगा नदी में स्नान मात्र से ही माँ गंगा सारे पाप धो देती है। 1991 में गंगा आरती की शुरुआत दशाश्‍वमेध घाट पर हुई थी और तभी से ये आरती बहुत प्रसिद्ध है क्योंकि उस समय यहाँ का नज़ारा देखने योग्य होता है। गंगा आरती हर रोज शाम को होती है। यहाँ की गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है और इसको देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी, बड़े-बड़े सेलिब्रिटी और वीवीआयीपी आते हैं।

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दशाश्‍वमेध घाट

बनारस के गंगा नदी के किनारे बसे हुए घाटों में से एक घाट है दशाश्‍वमेध घाट, जो की सबसे पुराण घाट मन जाता है और सबसे सुन्दर भी। दशाश्‍वमेध का अर्थ होता है दस घोड़ों की बलि । एक मान्यता के अनुसार यहाँ पर बहुत बड़ा यज्ञं करवाया गया था और उसमे दस घोड़ों की बलि दी गयी थी। वाराणसी के 88 घाटों में से पांच घाट सबसे ज्यादा पवित्र माने गए हैं। ये पांच घाट हैं: अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट। इन घाटों को सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है।

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अस्सी घाट

यह वही घाट है जहाँ अस्सी नदी और गंगा नदी का संगम है। एक पौराणिक कथा के अनुसार माँ दुर्गा ने शुम्‍भ-निशुम्‍भ नाम के राक्षस का अपनी तलवार से वध करने के बाद उस तलवार को यहाँ फेंक दिया था जिसकी वजह से अस्सी नदी की उत्पत्ति हुई है। इसी घाट पे एक पीपल का बहुत बड़ा बृक्ष है जिसके नीचे भगवान शिव का शिवलिंग और भगवान अस्‍सींगमेश्‍वारा का मंदिर भी है जिसके दर्शन करने के लिए बहुत से श्रद्धालु आते हैं।

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मणिकर्णिका घाट

हिन्दू धर्म में मणिकर्णिका घाट हिन्दुओ के लिए मोक्ष का स्थान है। मान्यता यह है की मृत्यु के बाद जिसका शव मणिकर्णिका घाट पे जलाया जाता है उसकी आत्मा को मुक्ति मिल जाती है और उसको जन्म-मृत्यु के चक्र से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है। इस घाट पे चिता की आग कभी शांत नहीं होती है, हर वक़्त किसी न किसी शव का दाह-संस्कार हो रहा होता है। मणिकर्णिका घाट के बारे में बहुत से तथ्य सुनने को मिलते हैं। एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने भगवान शिव जी की तपस्या करके यह वरदान माँगा था की सृष्टि के विनाश के समय काशी को नष्ट न किया जाए। एक दूसरी मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने यहाँ पर भगवान शिव और माता पार्वती के स्नान के लिए यहाँ एक कुंड का निर्माण किया था जिसे लोग मणिकर्णिका कुंड के नाम से जानते हैं। स्नान के दौरान माता पार्वती का कर्ण फूल कुंड में गिर गया था जिसको भगवान शिव ने ढूंढ निकला था। तभी से इसका नाम मणिकर्णिका घाट पड़ गया।

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धमेख स्तूप

धमेख स्तूप वाराणसी के सारनाथ में स्थित है। यह स्तूप सम्राट अशोक के समय में बना था। ऐसा माना जाता है की डिअर पार्क में स्थित धमेख स्तूप ही वह स्थान हैं जहाँ महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था। धमेख स्तूप एक ठोस गोलाकार बुर्ज की तरह दिखता है। इसका व्यास 28.35 मीटर (93 फुट) और ऊँचाई 39.01 मीटर (143 फुट) है। आपको जानकारी के लिए बता दें कि यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए कुछ खास नियम बनाये गए हैं जैसे कि स्तूप परिसर में हैं शांत रहना साथ ही चप्पल या जूते पहन के अंदर नहीं आना, इसके अलावा मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल भी यहां मना किया जाता है। यह भी एक वाराणसी में घूमने की जगह है, जहाँ आकर आपको हमारे इतिहास के कई पन्ने पलटने का मौका मिलता है।

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श्री काशी विश्वनाथ मंदिर

अगर आप बनारस घूमने आये हैं और काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं गए तो आपका आना व्यर्थ है क्यूंकि काशी में भगवान शिव का भव्य मंदिर है जिसको “काशी विश्वनाथ मंदिर” के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गंगा नदी के साथ में स्थित है। यह मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। काशी विश्वनाथ मंदिर का हिन्दू धर्म में एक विशिष्ट स्थान है और यह कई हजारों वर्षो पुराना मंदिर है। एक मान्यता के अनुसार गंगा नदी में स्नान करने और इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अहिल्याबाई होलकर ने काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।

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