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अभिषेक बनर्जी की सिफारिश वाला पत्र खारिज, बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष को लेकर विवाद गहराया; RTI तक पहुंचा मामला

पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर विवाद गहरा गया है। टीएमसी द्वारा भेजे गए अभिषेक बनर्जी के हस्ताक्षर वाले पत्र को सचिवालय ने खारिज कर दिया है, जिसके बाद मामला RTI तक पहुंच गया है और राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Tue, 19 May 2026 12:30:36

अभिषेक बनर्जी की सिफारिश वाला पत्र खारिज, बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष को लेकर विवाद गहराया; RTI तक पहुंचा मामला

पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर स्थिति अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। इस पूरे मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। ताजा घटनाक्रम में विधानसभा सचिवालय ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ओर से नामित विधायक सोहनदेव चट्टोपाध्याय द्वारा प्रस्तुत पत्र को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। वहीं, पार्टी के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के हस्ताक्षर वाले पत्र को भी अस्वीकार कर दिया गया है। इसके बाद मामले ने नया मोड़ लेते हुए विधायक ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी है।

जानकारी के अनुसार, टीएमसी की ओर से सोहनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर नामित किया गया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने विधानसभा सचिवालय को पत्र भेजकर उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने की मांग की थी। इस पत्र पर अभिषेक बनर्जी के हस्ताक्षर भी मौजूद थे, जिसे पार्टी की ओर से समर्थन माना गया। हालांकि, सचिवालय ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मान्यता देने से पहले कम से कम 80 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है।

इसी विवाद के बीच बालीगंज से विधायक सोहनदेव चट्टोपाध्याय ने RTI दाखिल कर दिया है। उन्होंने अपने आवेदन में यह जानना चाहा है कि वर्ष 2011, 2016 और 2021 में विपक्ष के नेता के चयन के दौरान किन नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। उनका कहना है कि वर्तमान में जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है, वह पहले की परंपरा से अलग है, इसलिए स्पष्टता जरूरी है।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक और अहम बात सामने आई है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का कार्यालय अभी तक औपचारिक रूप से कार्यरत नहीं हो सका है और वहां ताला लगा हुआ है। इसे लेकर भी राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं और विपक्ष की भूमिका को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, विधानसभा के भीतर सत्ता पक्ष के एक सदस्य ने अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि विधानसभा की प्रक्रिया में ऐसे किसी बाहरी हस्ताक्षर का कोई संवैधानिक आधार नहीं है। एक सदस्य ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “अभिषेक बनर्जी इस तरह का पत्र जारी करने वाले कौन होते हैं? वे सांसद हैं और तृणमूल कांग्रेस के महासचिव हैं, लेकिन विधानसभा दल में उनकी कोई औपचारिक संवैधानिक भूमिका नहीं है। ऐसे में उनके हस्ताक्षर को आधार क्यों माना जाए?”

इसी सदस्य ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की प्रक्रियागत उलझनें अब समाप्त होनी चाहिए और नियमों के अनुसार ही निर्णय लिए जाने चाहिए।

दूसरी ओर, 13 मई को तृणमूल कांग्रेस की ओर से विधानसभा सचिव समरेंद्र नाथ दास को एक औपचारिक पत्र सौंपा गया था, जिस पर अभिषेक बनर्जी के हस्ताक्षर थे। इस पत्र में पार्टी की ओर से यह भी प्रस्ताव दिया गया था कि फिरहाद हकीम को विपक्षी दल का मुख्य सचेतक (Chief Whip) बनाया जाए, जबकि नयन बंदोपाध्याय और आशिमा पात्रा को उपनेता के रूप में नामित किया जाए।

विधायक सोहनदेव चट्टोपाध्याय ने कहा है कि उन्हें RTI दाखिल करने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि प्रक्रिया को लेकर लगातार अस्पष्टता बनी हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अपने आवेदन में यह पूछा है कि पिछले तीन विधानसभा कार्यकालों में नेता प्रतिपक्ष के चयन की प्रक्रिया किस नियम के तहत पूरी की गई थी। साथ ही उन्होंने यह भी जोर दिया कि नियमों के अनुसार, विपक्ष में सबसे बड़े दल को केवल 30 विधायकों का समर्थन होने पर भी यह पद मिल सकता है।

सूत्रों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आई है कि विधानसभा सचिवालय ने चट्टोपाध्याय की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। सचिवालय का कहना है कि विपक्ष के नेता का चयन आमतौर पर संबंधित दल की आंतरिक बैठक में विधायकों द्वारा किया जाता है और उसका औपचारिक रिकॉर्ड विधानसभा को सौंपा जाता है। इसी के साथ सचिवालय ने कथित रूप से उस बैठक के विस्तृत परिणाम और कार्यवाही का ब्यौरा भी मांगा है, जिससे स्थिति स्पष्ट की जा सके।

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