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महाकुंभ में गंगा के पानी को लेकर सामने आई रिपोर्ट उड़ा देगी आपके होश, मिला ये खतरनाक बैक्टीरिया

CPCB की रिपोर्ट के अनुसार, सीवेज के गंदे पानी के संकेतक माने जाने वाले फेकल कोलीफॉर्म की अधिकतम सीमा 2500 यूनिट प्रति 100 मिली निर्धारित है। हालांकि, महाकुंभ के दौरान अलग-अलग स्थानों पर इसका स्तर बढ़ा पाया गया है

Posts by : Nupur Rawat | Updated on: Tue, 18 Feb 2025 7:33:40

 महाकुंभ में गंगा के पानी को लेकर सामने आई रिपोर्ट उड़ा देगी आपके होश, मिला ये खतरनाक बैक्टीरिया

प्रयागराज महाकुंभ के चलते गंगा और यमुना नदियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने सोमवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें बताया गया कि महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा बढ़ी है। इसके कारण नदी के पानी में प्रदूषण का स्तर नहाने के लिए तय प्राथमिक जल गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं रहा है।

CPCB की रिपोर्ट के अनुसार, सीवेज के गंदे पानी के संकेतक माने जाने वाले फेकल कोलीफॉर्म की अधिकतम सीमा 2500 यूनिट प्रति 100 मिली निर्धारित है। हालांकि, महाकुंभ के दौरान अलग-अलग स्थानों पर इसका स्तर बढ़ा पाया गया है। गंगा और यमुना में सीवेज के बहाव को रोकने को लेकर अभी भी NGT में सुनवाई चल रही है। इससे पहले, एनजीटी ने महाकुंभ में सीवेज प्रबंधन को लेकर यूपी सरकार को निर्देश जारी किए थे ताकि नदियों के बढ़ते प्रदूषण को रोका जा सके।

फेकल कोलीफॉर्म क्या है, और सुरक्षित स्तर क्या हैं?

फेकल कोलीफॉर्म की मात्रा से सीवेज में मौजूद मल पदार्थ की ताकत का आकलन किया जाता है। यह एक जल गुणवत्ता संकेतक है, जो उन रोगजनकों की उपस्थिति को इंगित करता है जो आमतौर पर डायरिया, टाइफाइड और अन्य आंतों से संबंधित बीमारियों का कारण बनते हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की एक रिपोर्ट के अनुसार, फेकल कोलीफॉर्म का स्तर पानी में प्रदूषण की गंभीरता को मापने का एक महत्वपूर्ण मानक है।

शहरी विकास मंत्रालय द्वारा 2004 में गठित एक समिति ने यह सिफारिश की थी कि फेकल कोलीफॉर्म की आदर्श सीमा 500 MPN/100ml होनी चाहिए, जबकि अधिकतम स्वीकार्य सीमा 2,500 MPN/100ml निर्धारित की गई थी, ताकि इसे नदियों में छोड़ा जा सके।

MPN/100ml का अर्थ है – पानी के 100 मिलीलीटर के नमूने में फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की संभावित संख्या।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा महाकुंभ 2025 के लिए जल गुणवत्ता डैशबोर्ड में बताया गया है कि गंगा और यमुना के विभिन्न स्थानों पर फेकल कोलीफॉर्म का स्तर 2,500 MPN/100ml से अधिक नहीं होना चाहिए।

हालांकि, 4 फरवरी को दर्ज किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, गंगा नदी में फेकल कोलीफॉर्म का स्तर शास्त्री ब्रिज से पहले 11,000 MPN/100ml और संगम क्षेत्र में 7,900 MPN/100ml पाया गया।

शास्त्री ब्रिज, गंगा नदी पर संगम से लगभग 2 किलोमीटर पहले स्थित है।

यमुना नदी में संगम स्थल से पहले, पुराने नैनी ब्रिज के पास, फेकल कोलीफॉर्म का स्तर 4,900 MPN/100ml दर्ज किया गया।

ये सभी आंकड़े बंसत पंचमी के अगले दिन दर्ज किए गए, जो इस वर्ष 3 फरवरी को हुआ था और जिसे शाही स्नान दिवस के रूप में मनाया गया।

फेकल कोलीफॉर्म कितना खतरनाक है?

हालांकि कोलीफॉर्म बैक्टीरिया स्वयं बीमारियों का कारण नहीं बनता, लेकिन यह पानी में मलजनित रोगजनकों जैसे बैक्टीरिया, वायरस और प्रोटोजोआ की उपस्थिति का संकेत देता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट के अनुसार, यह पानी की गुणवत्ता का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो जलजनित संक्रमण के जोखिम को दर्शाता है।

नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में आंतरिक चिकित्सा विभाग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. अतुल कक्कड़ के अनुसार, "स्वच्छता के स्तर और आवश्यक तैयारियों में काफी कमी है, जिसके कारण हमारे मल में मौजूद बैक्टीरिया पानी में प्रवेश कर रहे हैं।"

उन्होंने कहा, "यह पानी न तो पीने योग्य है और न ही नहाने के लिए सुरक्षित है। रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा कर रही है।"

डॉ. कक्कड़ ने समाचार एजेंसी PTI को बताया कि संक्रमित पानी के संपर्क में आने से कई जलजनित बीमारियां हो सकती हैं, जिनमें त्वचा रोग, दस्त, उल्टी, टाइफाइड और हैजा शामिल हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीने के पानी में फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी से गंभीर संक्रामक और परजीवी रोगों जैसे हैजा, टाइफाइड, पेचिश, हेपेटाइटिस, गियार्डियासिस, गिनी वर्म और स्किस्टोसोमियासिस फैलने का खतरा बढ़ जाता है।

नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट में कहा गया है कि "जल स्रोतों की सतह पर यह बैक्टीरियल संदूषण स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करता है, खासकर जब इस पानी का उपयोग घरेलू उद्देश्यों के लिए किया जाता है, जैसे कि पीने, नहाने या खेती के लिए।"

भारत में कोई भी शहर पूरी तरह से अपने सीवेज प्रबंधन की समस्या को हल नहीं कर पाया है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि "सीवेज उपचार की कमी और बैक्टीरियोलॉजिकल मानकों के अभाव का किसानों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, खासकर वे जो दूषित पानी का उपयोग करते हैं।"

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 1990 के दशक में किए गए एक अध्ययन का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि अशोधित सीवेज का उपयोग करने वाले खेत मजदूरों में डायरिया, रक्त संक्रमण और त्वचा रोगों की दर काफी अधिक थी।

अध्ययन के अनुसार, मल परीक्षण में हुकवर्म (41.7%), राउंडवर्म (29.2%), ट्रिचुरिस ट्रिचुरा (16.7%) और गियार्डिया लैंब्लिया (33.3%) की उच्च उपस्थिति देखी गई। त्वचा रोगों की संभावना 42.5% तक पाई गई।

KnowYourH2O (जो सुरक्षित पेयजल को बढ़ावा देने के लिए काम करने वाला एक अमेरिकी संगठन है) के अनुसार, "फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया से अत्यधिक प्रदूषित पानी में स्नान करने से बुखार, मतली, पेट दर्द और त्वचा संक्रमण होने की संभावना बढ़ जाती है।"

संक्रमित पानी में नहाने से टाइफाइड, हेपेटाइटिस, गैस्ट्रोएंटेराइटिस, पेचिश और कान में संक्रमण भी हो सकता है।

इसलिए, अगर पानी में फेकल कोलीफॉर्म का स्तर 2,500 MPN/100ml से अधिक है, तो उसमें स्नान करना स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हो सकता है।

श्रद्धालुओं को गंगा के पानी की गुणवत्ता की जानकारी दें – NGT

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि श्रद्धालुओं को गंगा के पानी की गुणवत्ता की जानकारी दी जाए, खासकर उन स्थानों पर जहां वे डुबकी लगाने जा रहे हैं। हालांकि, डाउन टू अर्थ (DTE) की रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक इस निर्देश का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है। दिसंबर 2024 में ही NGT ने स्पष्ट किया था कि महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में गंगा जल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए, और यह नहाने व पीने के लिए उपयुक्त होना चाहिए।

2019 कुंभ में भी खराब थी पानी की गुणवत्ता

यह पहली बार नहीं है जब गंगा के जल की गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं। 2019 के प्रयागराज कुंभ के दौरान केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट में बताया गया था कि प्रमुख स्नान के दिनों में भी गंगा का पानी नहाने लायक नहीं था। 2019 कुंभ में करीब 130.2 मिलियन श्रद्धालु पहुंचे थे, और रिपोर्ट के अनुसार करसर घाट पर बीओडी (बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड) और फेकल कोलीफॉर्म का स्तर निर्धारित सीमा से अधिक था।

प्रमुख स्नान के दिनों में सुबह के समय बीओडी का स्तर शाम की तुलना में अधिक पाया गया था। वहीं, यमुना नदी में घुलनशील ऑक्सीजन का स्तर मानकों के अनुसार था, लेकिन पीएच, बीओडी और फेकल कोलीफॉर्म के स्तर लगातार तय सीमा से अधिक रहे। इससे साफ है कि हर कुंभ मेले में पानी की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं बनी रहती हैं, और इसे सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

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