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जम्मू की हिंदू विरासत का पुनरुद्धार: महाराजा हरि सिंह की 130वीं जयंती का भव्य उत्सव

महाराजा हरि सिंह की 130वीं जयंती ने जम्मू और कश्मीर में उत्साह की एक नई लहर पैदा कर दी। यह कार्यक्रम डोगरा और राजपूत समुदायों के लिए सिर्फ एक उत्सव नहीं था, बल्कि अपनी पहचान और गौरव को पुनः स्थापित करने का एक अवसर भी था।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Mon, 30 Sep 2024 1:00:09

जम्मू की हिंदू विरासत का पुनरुद्धार: महाराजा हरि सिंह की 130वीं जयंती का भव्य उत्सव

महाराजा हरि सिंह की 130वीं जयंती ने जम्मू और कश्मीर में उत्साह की एक नई लहर पैदा कर दी। यह कार्यक्रम डोगरा और राजपूत समुदायों के लिए सिर्फ एक उत्सव नहीं था, बल्कि अपनी पहचान और गौरव को पुनः स्थापित करने का एक अवसर भी था।

लंबे समय तक आर्टिकल 370 के कारण महाराजा हरि सिंह की विरासत का उत्सव सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जा सका। छोटी-छोटी सभाओं तक सीमित रहकर, उनके योगदान को बड़े स्तर पर मान्यता नहीं मिल पाई थी। लेकिन इस बार, पूरे क्षेत्र में हर वर्ग के लोग एकजुट होकर अपने पूर्वजों के योगदान को सम्मानित कर रहे थे।

1947 में महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत के साथ जम्मू और कश्मीर का विलय राज्य को भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा बनाने में एक ऐतिहासिक कदम था। इस निर्णय ने न केवल हिंदू प्रतिनिधित्व को सशक्त किया, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में राज्य के प्रशासन में हिंदू समुदाय का भी योगदान सुनिश्चित किया गया।

डोगरा समाज के वरिष्ठ नेता रमेश सिंह इस अवसर पर कहते हैं, "महाराजा हरि सिंह का हमारे इतिहास में योगदान अमूल्य है। उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने सामाजिक सुधारों की नींव रखी। उनका जन्मदिन मनाना केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान का सम्मान करने का मौका है।"

इस विशेष अवसर को युवा राजपूत सभा द्वारा भव्य रैली के साथ मनाया गया। जम्मू की सड़कों पर पारंपरिक वस्त्रों में सजे लोग जश्न मनाते नजर आए, जो इस बात का प्रतीक है कि अब महाराजा हरि सिंह की विरासत को सार्वजनिक रूप से मान्यता मिल रही है, जबकि कुछ साल पहले ऐसा संभव नहीं था।

युवा राजपूत सभा के मेंबर विवेक सिंह कहते हैं, "2022 से पहले हम इतने बड़े पैमाने पर महाराजा हरि सिंह की जयंती नहीं मना पाते थे। इसे मान्यता दिलाना हमारे लिए एक लंबा संघर्ष था। आज, हम अपने इतिहास और अपनी जड़ों को गर्व से पुनः प्राप्त कर रहे हैं।"

इस उत्सव में मोटर रैली भी शामिल थी, जहां कार्यकर्ताओं ने महाराजा की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया, नारे लगाए और मिठाइयां बांटीं। यह नए युग की शुरुआत का प्रतीक था-एक ऐसा युग जहां डोगरा और राजपूत समुदाय अपने गौरव और पहचान को पुनः स्थापित कर रहे हैं।

स्थानीय निवासी रवि सिंह कहते हैं, "2019 के बाद से बहुत कुछ बदल गया है। अब हम अपनी विरासत को बिना किसी भय के मना सकते हैं। यह जम्मू के हिंदू समुदाय के लिए एक नई सुबह का संकेत है।"

बुजुर्ग समुदाय के सदस्य बिहारी लाल बहादुर ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, "मुझे वो दिन याद हैं जब हमें चुपचाप उत्सव मनाना पड़ता था। आज इतनी बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ खुशियाँ मनाते देखना गर्व का क्षण है। महाराजा हरि सिंह ने हमें हमारी खोई हुई पहचान वापस दी।"

इस उत्सव में भाग लेने वाले युवा कार्यकर्ता सुमित चौहान ने कहा, "यह उत्सव हमारी एकता और ताकत को दर्शाता है। हमने इस मान्यता के लिए बहुत मेहनत की है, और यह सिर्फ शुरुआत है। हम अपने अधिकारों के लिए आगे भी लड़ते रहेंगे।"

हालांकि, डोगरा और राजपूत समुदाय के लिए संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा आर्टिकल 370 की बहाली पर हो रही चर्चाओं ने कई लोगों में चिंता पैदा कर दी है।

अखिल भारतीय डोगरा महासभा के सदस्य महेश कौल ने इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, "यदि आर्टिकल 370 को फिर से लागू किया जाता है, तो यह हमारी अब तक की प्रगति को पीछे ले जाएगा। यह हमारे अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान के लिए एक सीधा खतरा है।"

यह जयंती केवल अतीत के संघर्षों की याद नहीं दिलाती, बल्कि भविष्य की चुनौतियों की भी ओर इशारा करती है। बीते वर्षों की सीमित सभाओं से आज के भव्य उत्सवों तक, डोगरा और राजपूत समुदाय ने अपनी आवाज़ को बुलंद करने के लिए एक लंबी यात्रा तय की है।

इस उत्सव में शामिल हुईं नंदिता शर्मा, एक युवा राजपूत महिला, ने गर्व से कहा, "आज का दिन मेरे लिए बहुत खास है। मैं चाहती हूं कि अगली पीढ़ी भी महाराजा हरि सिंह की कहानी जाने और समझे कि उन्होंने हमारे लिए क्या किया। यह हमारी पहचान है, और हमें इसे गर्व से मनाना चाहिए।"

जैसे-जैसे उत्सव आगे बढ़ा, यह स्पष्ट हो गया कि महाराजा हरि सिंह की विरासत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और जीवंत है। जम्मू के लोग अपनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और दृढ़ आत्मा का जश्न मनाते हुए एकजुट हो रहे हैं।

आये कुछ दिनों में, जम्मू में केंद्र सरकार द्वारा मंदिरों के पुनर्निर्माण पर विशेष ध्यान दिया गया है। यह कार्य हिंदू विरासत को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ये मंदिर न केवल लोगों को उनके आध्यात्मिक मूल से जोड़ते हैं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सवों के लिए भी एकत्र होने का केंद्र बनते जा रहे हैं।

स्थानीय पुजारी पंडित हरिकृष्ण कहते हैं, "सालों तक हमारे मंदिरों को उपेक्षा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। अब इन पवित्र स्थलों का पुनर्निर्माण हमारे लिए नई उम्मीद का प्रतीक है।"

हिन्दू समुदाय के देवेंद्र ठाकुर इस बदलाव पर कहते हैं, "हममें से कई लोगों को वो समय याद है जब हमारे विश्वासों को दबाया जाता था। आज, मंदिरों का पुनर्निर्माण हमें हमारी पहचान पुनः प्राप्त करने में मदद कर रहा है।"

25-वर्ष की अर्चना राणा का मानना है, "जम्मू में हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर और अधिकारों की सुरक्षा की आवश्यकता है। मंदिरों का पुनर्निर्माण सिर्फ एक शुरुआत है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि हमारी परंपराएँ आने वाले वर्षों तक जीवित रहें।"

बुजुर्ग निवासी सुरेश डोगरा कहते हैं, "हमारे मंदिरों का पुनर्निर्माण हमारे समुदाय के घावों को भरने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह उस उत्पीड़न को पहचानने का प्रतीक है, जिसका हमने सामना किया है। यह हमारे लिए एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य का वादा भी है।"

जैसे-जैसे उत्सव जारी है, एक बात स्पष्ट है: महाराजा हरि सिंह की विरासत पहले से कहीं ज़्यादा मजबूत है, जो जम्मू के लोगों को उनकी समृद्ध विरासत और दृढ़ आत्मा के सामूहिक उत्सव में एकजुट कर रही है। दशकों बाद हिंदू गौरव को पुनः स्थापित किया जा रहा है, जो जम्मू की सच्ची पहचान और यहाँ की सांस्कृतिक जड़ों का प्रतीक है।

जम्मू एक बार फिर विश्वभर के हिंदुओं के लिए 'मंदिरों के शहर' के रूप में अपनी पहचान प्राप्त कर रहा है।

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