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वीकेंड पर घूमने के लिए यादगार पर्यटन स्थल है बलुआ पत्थरों से निर्मित धौलपुर

धौलपुर एक पुराने ऐतिहासिक शहर के रूप में जाना जाता है। धौलपुर शिवि वंशी बमरोलिया जाटों की प्रसिद्ध रियासत है। धौलपुर के राजाओं का विरुद महाराणा है।

Posts by : Geeta | Updated on: Sun, 04 June 2023 09:42:09

वीकेंड पर घूमने के लिए यादगार पर्यटन स्थल है बलुआ पत्थरों से निर्मित धौलपुर

धौलपुर एक पुराने ऐतिहासिक शहर के रूप में जाना जाता है। धौलपुर शिवि वंशी बमरोलिया जाटों की प्रसिद्ध रियासत है। धौलपुर के राजाओं का विरुद महाराणा है। मूल रूप से धौलपुर भरतपुर के जाट राज्यवंश की एक शाखा का राज्य था। भरतपुर के सर्वश्रेष्ठ शासक सूरजमल जाट की मृत्यु के समय (1764 ई।) धौलपुर भरतपुर राज्य ही में सम्मिलित था। सूरजमल जाट की मृत्यु के बाद यहाँ एक अलग रियासत स्थापित हो गई। सिंधिया, अंग्रेज और जाटों के मध्य हुए एक समझौते के बाद धौलपुर क्षेत्र गोहद के जाट राजाओं के अधीन आ गया था। वर्तमान नगर मूल नगर के उत्तर में बसा है। चंबल नदी की बाढ़ से बचने के लिये ऐसा किया गया। पहले धौलपुर सामंती राज्य का हिस्सा था, जो 1949 में राजस्थान प्रदेश का हिस्सा बन गया।

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एक दिवसीय पर्यटन स्थल

राजस्थान का धौलपुर जिला एक दिवसीय पर्यटन के लिए सर्वश्रेष्ठ पर्यटक स्थल है। धौलपुर अपने लाल रंग के बलुआ पत्थरों की संरचना के लिए प्रसिद्ध है, जो धौलपुर शहर को गौरवान्वित करती है, शायद राजस्थान में कम देखी जाने वाली जगहों में से एक है। इस साधारण भीड़भाड़ वाले शहर में अपनी तरह का कुछ खजाना है जिसे बार-बार देखने का मन करता है। आप धौलपुर के राजसी महल से बने होटल, ईश्वरीय मंदिरों, ढहते किलों और सुंदर जानवरों से भरे आकर्षक अभयारण्यों को देखने का मोह नहीं छोड़ पाएंगे।

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पर्यटन स्थल

सिटी पैलेस


इसे धौलपुर महल के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन स्थापत्य कला से परिपूर्ण यह महल, शाही परिवार का निवास स्थान था। पूरा महल लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है तथा प्राचीन इतिहास और भव्यता को दर्शाता है। दक्षिण पूर्व में चंबल के बीहड़ वन और उत्तर पश्चिम में सुंदर आगरा शहर के होने के कारण, सिटी पैलेस में आने वाले पर्यटक, शाही युग की सैर के साथ साथ, प्राकृतिक छटा का भी आनन्द लेते हैं।

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शाही बावड़ी

शहर में स्थित, निहालेश्वर मंदिर के पीछे, शाही बावड़ी स्थित है, जो कि सन् 1873 - 1880 के बीच निर्मित की गई थी। यह चार मंज़िला इमारत है तथा पत्थर की नक़्काशी और सुन्दर कलात्मक स्तम्भों के लिए प्रसिद्ध है।

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चौंसठ योगिनी मंदिर

सबसे पुराने शिव मंदिरों में से एक, चोपरा शिव मंदिर, 19वीं सदी में बनाया गया था। प्रत्येक सोमवार को यहाँ भक्तों की भीड़ नजर आती है, क्योंकि सोमवार का दिन भगवान शिव का माना जाता है। इसकी स्थापत्य कला अनूठी है। मार्च के महीने में महा शिवरात्रि के अवसर पर, तीर्थयात्री दूर दूर से आते हैं तथा मेले में भाग लेते हैं।

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शेर शिखर गुरूद्वारा

मुचुकुंद के पास, यह गुरूद्वारा, सिख गुरू हरगोविन्द साहिब की धौलपुर यात्रा के कारण, स्थापित किया गया था। शेर शिखर गुरूद्वारा, सिखधर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है तथा ऐतिहासिक महत्व व श्रृद्धा का स्थान रखता है। देश भर से सिख समुदाय के लोग यहाँ पर शीश झुकाने आते हैं।

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मुग़ल गार्डन, झोर

मुग़ल सम्राट बाबर के ज़माने में बनाया गया, यह गार्डन, सबसे पुराना मुग़ल गार्डन माना जाता है तथा ’बाग़-ए-नीलोफर’ के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में बग़ीचे का मूल स्वरूप नहीं रहा, परन्तु किया गया निर्माण मौजूद है।

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मुचुकुंद-सरोवर

अगर आप धौलपुर आएं तो मुचुकुंद सरोवर अवश्य घूमें। इस तालाब का नाम राजा मुचुकुन्द के नाम पर रखा गया। यह तालाब अत्यन्त प्राचीन है। राजा मुचुकुन्द सूर्यवंश के 24वें राजा थे। पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि राजा मुचुकुन्द यहाँ पर सो रहे थे, उसी समय असुर कालयवन भगवान श्रीकृष्ण का पीछा करते हुए यहाँ पहुँच गया और उसने कृष्ण के भ्रम में, वरदान पाकर सोए हुए राजा मुचुकुन्द को जगा दिया। राजा मुचुकुन्द की नजर पड़ते ही कालयवन वहीं भस्म हो गया। तब से यह स्थान धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता है। इस स्थान के आस-पास ऐसी कई जगह हैं जिनका निर्माण या रूप परिवर्तन मुगल सम्राट अकबर ने करवाया था। मुचुकुन्द सरोवर को सभी तीर्थों का भान्जा कहा जाता है। मुचुकुन्द-तीर्थ नामक बहुत ही सुन्दर रमणीक धार्मिक स्थल प्रकृति की गोद में धौलपुर के निकट ग्वालियर-आगरा मार्ग के बांई ओर लगभग दो किमी। की दूरी पर स्थित है। इस विशाल एवं गहरे जलाशय के चारों ओर वास्तु कला में बेजोड़ अनेक छोटे-बड़े मंदिर तथा पूजागृह पालराजाओं के काल 775 ई। से 915 ई। तक के बने हुए हैं। यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल ऋषि-पंचमी और बलदेव-छट को विशाल मेला लगता है। जिसमें लाखों की संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं, इस सरोवर में स्नान कर तर्पण-क्रिया करते हैं। हर अमावस्या को हजारों तीर्थयात्री प्रात:काल से ही मुचुकुन्द-तीर्थ की परिक्रमा लगाते हैं। इसी प्रकार हर पूर्णिमा को सायंकाल मुचुकुन्द-सरोवर की महा-आरती का आयोजन होता है, जिसमें सैकडों की तादाद में भक्त सम्मिलित होते हैं।

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मुचुकुंद की गुफा

धौलपुर के निकट राजा मुचुकुंद के नाम से प्रसिद्ध गुफा है जो गंधमादन पहाड़ी के अंदर बताई जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा पर कालयवन के आक्रमण के समय श्रीकृष्ण मथुरा से मुचुकुंद की गुहा में चले आए थे। भगवान श्रीकृष्ण का पीछा करते हुए कालयवन यहाँ पहुँच गया और उसने कृष्ण के भ्रम में, वरदान पाकर सोए हुए राजा मुचुकुन्द को जगा दिया। राजा मुचुकुन्द की नजर पड़ते ही कालयवन वहीं भस्म हो गया। यह कथा श्रीमद् भागवत 10,15 में वर्णित है। कथा प्रसंग में मुचुकुंद की गुहा का उल्लेख इस प्रकार है। धौलपुर से 842 ई। का एक अभिलेख मिला है, जिसमें चंडस्वामिन् अथवा सूर्य के मंदिर की प्रतिष्ठापना का उल्लेख है। इस अभिलेख की विशेषता इस तथ्य में है कि इसमें हमें सर्वप्रथम विक्रमसंवत् की तिथि का उल्लेख मिलता है जो 898 है।

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अचलेश्वर महादेव

राजस्थान के धौलपुर में जहां मंदिर में स्थित शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। इस मंदिर का नाम 'अचलेश्वर महादेव' मंदिर है। शिवलिंग के रंग बदलने के अलावा भी इस मंदिर के रोचक रहस्य है। धौलपुर में बने इस प्राचीन शिव मंदिर की खासियत ये है कि यहां पर स्थापित किया गया शिवलिंग सुबह लाल, दोपहर में केसर और शाम को गेहुंआ रंग का हो जाता है। कुछ शोधकर्ताओं की मानें तो शिवलिंग पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों की वजह से ये शिवलिंग रंग बदलता है। लेकिन इसकी सही वैज्ञानिक जानकारी कोई नहीं दे पाया है। बताया जाता है कि ये मंदिर 2500 साल पुराना है। वहीं शिवलिंग के अलावा इस मंदिर की नंदी की मूर्ति का भी काफी रोचक इतिहास है। मंदिर में लगी नंदी की मूर्ति पांच अलग-अलग धातुओं को मिलाकर बनाई गई है। मंदिर को लेकर एक ये कहावत भी प्रचलित है कि यहां जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हमला किया था तो मंदिर में लगी इस नंदी की मूर्ति ने उन पर हजारों मधुमक्खियों को छोड़ दिया था।

बता दें कि इस मंदिर में लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। यही वजह है कि मंदिर में हर दिन भारी संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं। कहा ये भी जाता है कि अगर कुंवारे लड़के-लड़किंयां यहां दर्शन के लिए आते हैं तो उनकी शादी में आने वाली अड़चने दूर हो जाती है।

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मंदिर श्री राम-जानकी और श्री हनुमानजी, पुरानी छावनी

धौलपुर रेल्वे स्टेशन से 6 किमी की दूरी पर धौलपुर-बाड़ी मार्ग से सरानी खेड़ा जाने वाले मार्ग पर स्थित है पुरानी- छावनी। मार्ग पर ऑटो-रिक्शा चलते रहते हैं। महाराज श्री कीर्त सिंह ने गोहद से आकर इस स्थान पर छावनी स्थापित की और यहाँ विक्रम संवत् 1642 (सन् 1699) में मन्दिर का निर्माण करवाया। मन्दिर में चौबीस अवतार युक्त मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अष्ट धातु का मनोहारी विग्रह है, जो उत्तराभिमुख है। इस दुर्लभ मूर्ति की चोरी भी हो गई थी। अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ति तस्करों के चंगुल से निकलवाने में तत्कालीन डीआईजी केन्द्रीय पुलिस बल, जगदानन्द सिंह की प्रमुख भूमिका रही। मन्दिर परिसर के सिंह द्वार के बाईं ओर, अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को निहारते हुए (दक्षिणाभिमुख) राम भक्त हनुमान की विशाल प्रतिमा है। प्रतिमा में रक्त-वाहिकाएं (नसें) नजर आती हैं।

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चंबल सफारी

राजस्थान में धौलपुर और चंबल नदी में पर्यटकों के लिए प्रकृति देखने के कई अवसर उपलब्ध हैं। घडिय़ाल को देखने और फोटोग्राफी करने का सबसे अच्छा अवसर अनुभवी ड्राइवर और गाइड के साथ एक नाव किराए पर लेकर लिया जा सकता है, जो नदी के किनारे कई बिंदुओं पर उपलब्ध है। एक नाव भ्रमण भी पानी, किनारे के पक्षियों और अद्वितीय परिदृश्य की फोटोग्राफी के लिए कई अच्छे दृष्टिकोण पेश करेगा।

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निहाल टॉवर

अपने दर्शनीय स्थलों की यात्रा के दौरान, जब आप टाउन-हॉल रोड से गुजरते हैं, तो सबसे पहली चीज जो आप धौलपुर में देख सकते हैं, वह है निहाल टॉवर। यह घंटाघर है जिसे स्थानीय रूप से घंटा घर के नाम से जाना जाता है। राजस्थान का सबसे बड़ा घण्टा घर है जो 7 मंजिला है। जिसका निर्माण धौलपुर के राजा निहाल सिंह ने करवाया था।

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शेरगढ़ किला

चंबल नदी के पास बना धौलपुर का शेरगढ़ किला गर्मियों में कश्मीर की किसी वादी से कम नहीं है। लेकिन सरकारों की अनदेखी और संरक्षण के अभाव में यह किला धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहा है। धौलपुर का यह किला राजस्थान के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक आकर्षित करता हुआ किला है। शेरगढ़ किला के साथ साथ यह किला जल किला के रूप में जाना जाता है। यह किला पर्यटक प्रेमियों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। बारिश के मौसम में हरियाली से घिरा होने के कारण यह सुरम्य किला कश्मीर से कम नहीं लगता है।

इस किले का निर्माण जोधपुर के राठौर वंश के महाराजा मालदेव ने 1532 ईस्वी में करवाया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किले के निर्माण के समय हनुमान जी का मंदिर भी महाराजा मालदेव ने बनवाया था। जो आज भी स्थित है और पूजा आरती की जाती है। लेकिन बाद में इस किले को शेरशाह सूरी के आक्रमण का सामना करना पड़ा। शेरशाह सूरी के अधीन आते ही धौलपुर किले का नाम शेरगढ़ किला रख दिया गया। शेरशाह सूरी ने 1540 ईस्वी में इस किले का जीर्णोद्धार करवाया। शेरगढ़ किले में चार गेट, कई महल, आंगन, एक मकबरा और कई खंडहर संरचनाएं है। प्रसिद्ध पंचमुखी हनुमान जी के मंन्दिर के साथ साथ कई दर्शनीय मंदिर है। शेरशाह सूरी की ओर से करवाए गए जीर्णोद्धार से पूर्व यह किला एक धार्मिक स्थल था। जो भगवान शिव को समर्पित था। इस किले का राजस्थान के ऐतिहासिक किलों में अपना रोचक एवं महत्वपूर्ण स्थान है। शेरगढ़ किला का उपयोग 20वीं शताब्दी की शुरुआत तक किया जाता रहा है। इसके चारों ओर ऊंचे गढ़ बने हुए हैं। इस पर सैनिक तैनात रहते थे। वहाँ से सैनिक चौकसी, देखभाल और रखवाली किया करते थे।

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खानपुर महल

इस किले का निर्माण मुगल शासन के दौरान शाहजहाँ ने करवाया था। इस महल की खूबसूरत बनावट पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। दूसरी तरफ खानपुर महल का निर्माण जाट राजाओं द्वारा किया गया बताया जाता है।

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