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सितारे जमीन पर रिव्यू: भावनाओं की ईमानदार कोशिश, लेकिन ‘तारे’ जैसी चमक नहीं

साल 2007 में आमिर खान की फिल्म तारे ज़मीन पर ने बच्चों की भावनाओं, विशेष ज़रूरतों और माता-पिता के संबंधों को जिस संवेदनशीलता से छुआ, वह आज भी दर्शकों के दिलों में बसी हुई है। अब 2025 में उसी शीर्षक की भावना को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से सितारे ज़मीन पर रिलीज़ हुई है।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Fri, 20 Jun 2025 1:27:08

सितारे जमीन पर रिव्यू: भावनाओं की ईमानदार कोशिश, लेकिन ‘तारे’ जैसी चमक नहीं

तारे ज़मीन पर की विरासत और सितारे ज़मीन पर की चुनौती

साल 2007 में आमिर खान की फिल्म 'तारे ज़मीन पर' ने बच्चों की भावनाओं, विशेष ज़रूरतों और माता-पिता के संबंधों को जिस संवेदनशीलता से छुआ, वह आज भी दर्शकों के दिलों में बसी हुई है। अब 2025 में उसी शीर्षक की भावना को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से 'सितारे ज़मीन पर' रिलीज़ हुई है। इस बार आमिर खान एक स्पोर्ट्स ड्रामा के ज़रिए सामाजिक समावेशिता और संवेदनशीलता की बात करते हैं। यह फिल्म स्पेनिश फिल्म 'चैंपियन्स' का आधिकारिक रूपांतरण है।

कहानी: परिवर्तन की यात्रा


कहानी के केंद्र में हैं गुलशन अरोड़ा (आमिर खान), जो एक जुनूनी और तुनकमिज़ाज बास्केटबॉल कोच हैं। अपने बर्ताव के कारण उन्हें निलंबित कर दिया जाता है और विकल्प के रूप में उन्हें विशेष रूप से न्यूरोडायवर्जेंट युवाओं की एक बास्केटबॉल टीम को कोचिंग देने की जिम्मेदारी मिलती है।

गुलशन इस काम को पहले एक सजा मानते हैं, लेकिन धीरे-धीरे जब वह टीम के सदस्यों—सुनील, सतबीर, लोटस, गुड्डु, शर्मा जी, करीम, राजू, बंटू, गोलू और हरगोविंद—से जुड़ते हैं, तो उनका नजरिया बदलने लगता है। फिल्म का मुख्य संदेश, "हर किसी का अपना सामान्य होता है," दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है।
भावनात्मक प्रभाव: थोड़ा सतही, फिर भी प्रभावशाली

'सितारे ज़मीन पर' को देखकर साफ पता चलता है कि यह दिल से बनाई गई फिल्म है। लेकिन भावनात्मक गहराई में यह उस स्तर तक नहीं पहुंचती जैसी 'तारे ज़मीन पर' में थी। फिल्म दर्शकों को प्रभावित जरूर करती है, पर पूरी तरह उन्हें बांध नहीं पाती। जहां पहले की फिल्म ने दर्शकों की आत्मा को झकझोरा था, यहां वो भाव थोड़े सीमित रह जाते हैं।

शायद इसका कारण यह भी है कि अब दर्शक ज्यादा परिपक्व हो चुके हैं और उन्हें कहानी में नयापन और गहराई दोनों चाहिए। अब विषय चाहे कितना भी ज़रूरी हो, प्रस्तुति में नवीनता नहीं होगी तो असर सीमित रह जाता है।

पटकथा और निर्देशन: अपनी सीमाओं में सधा हुआ

निर्देशक आर एस प्रसन्ना ने पूरी कोशिश की है कि कहानी को भारतीय संदर्भों से जोड़ें। चाहे भाषा हो, खानपान हो या पारिवारिक संबंध—फिल्म भारत की मिट्टी से जुड़ाव दर्शाती है। गुलशन और उनकी मां प्रीतो (डॉली आहलूवालिया) का रिश्ता विशेष रूप से भावुक कर जाता है।

लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है उसकी पूर्वानुमेयता। कई दृश्य और मोड़ पहले से अनुमानित लगते हैं। क्लाइमैक्स तक आते-आते कहानी थोड़ी थक जाती है। दर्शक जानते हैं कि क्या होगा, और यही बात फिल्म की पकड़ को कमजोर कर देती है।

अभिनय: ईमानदारी से निभाए गए किरदार

आमिर खान गुलशन की भूमिका में एकदम सधे हुए नजर आते हैं। उन्होंने अपने अभिनय में संयम रखा है और किरदार में गहराई लाने का प्रयास किया है। उनकी परिवर्तन यात्रा विश्वसनीय लगती है।

विशेष बच्चों की टीम ने फिल्म को आत्मा दी है। आशीष पेंडसे, अरुश दत्ता, आयुष भंसाली, ऋषि शाहनी, वेदांत शर्मा, संवित देसाई सहित अन्य कलाकार इतने स्वाभाविक लगते हैं कि वे कहीं से भी अभिनेता नहीं, असली पात्र लगते हैं।

डॉली आहलूवालिया 'प्रीतो' के रूप में गरिमा और भावनाओं का केंद्र बनकर उभरती हैं। उनका किरदार दर्शकों को यह अहसास कराता है कि देखभाल करने वालों को भी देखभाल की ज़रूरत होती है।

तकनीकी पक्ष: औसत परंतु सटीक

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग औसत है, लेकिन कुछ दृश्य बहुत खूबसूरत बन पड़े हैं। विशेष रूप से ट्रेनिंग और बारिश के दृश्य मन को छूते हैं। संगीत बहुत यादगार नहीं, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर कहानी के मूड को बनाए रखता है।

एक सराहनीय प्रयास, लेकिन अमर नहीं

'सितारे ज़मीन पर' एक साफ-सुथरी, ईमानदार और सजीव फिल्म है जो समावेशिता और मानवता का संदेश देती है। यह फिल्म दिल को छूने की कोशिश जरूर करती है, लेकिन आत्मा तक नहीं पहुंचती। यह एक जरूरी विषय पर बनी फिल्म है, जिसे एक बार जरूर देखा जाना चाहिए। हालांकि यह 'तारे ज़मीन पर' जैसा गहरा प्रभाव नहीं छोड़ती, फिर भी यह समाज को सोचने और संवेदनशीलता बढ़ाने का अवसर अवश्य देती है।

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