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10 मार्च से शुरू होंगे होलाष्टक, जानें इसे अशुभ मानने के पीछे का पौराणिक कारण

होलाष्टक के आठवें दिन यानी कि पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है। मान्यता है कि होलिका के जलने पर सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश हो जाता है जिसके बाद से मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं।

Posts by : Ankur Mundra | Updated on: Sat, 05 Mar 2022 8:25:06

10 मार्च से शुरू होंगे होलाष्टक, जानें इसे अशुभ मानने के पीछे का पौराणिक कारण

मार्च का महीना शुरू हो चुका हैं जिसमे 17 मार्च को होलिका दहन किया जाना हैं और इसके अगले दिन 18 मार्च को धुलंडी हैं जिसमें होली खेली जानी हैं। लेकिन होली से पहले होलाष्टक लगता हैं जो कि आठ दिन का होता हैं। यह फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा तिथि तक यानी होलिका दहन तक चलता हैं। इस बार होलाष्टक 10 मार्च से शुरू होंगे जो 17 मार्च को पूर्णिमा तक चलेंगे। होलाष्टक का समय बेहद अशुभ माना जाता हैं जिसकी वजह से इस समय अवधि में सभी शुभ और मांगलिक काम वर्जित माने जाते हैं जिसके पीछे पैराणिक कारण जुड़ा हैं। होलाष्टक के आठवें दिन यानी कि पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है। मान्यता है कि होलिका के जलने पर सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश हो जाता है जिसके बाद से मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं।

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होलिका दहन इस बार 17 मार्च को है लेकिन धुलेंडी 18 मार्च को मनाई जाएगी, इसे धुलि वंदन भी कहते हैं। लेकिन कुछ जगह पर धुलेंडी 19 मार्च को भी मनाई जा रही है क्योंकि 18 मार्च को दोपहर के समय प्रतिपदा तिथि लग रही है और 19 मार्च को प्रतिपदा तिथि सुबह से ही है इसलिए कुछ जगहों पर धुलेंडी का पर्व 18 और कुछ जगहों पर 19 मार्च को मनाया जा रहा है लेकिन होलाष्टक 18 मार्च को समाप्त हो जाएंगे। होलाष्टक के समाप्त होने पर ही रंगोत्सव का पर्व मनाया जाता है। होलिका को जलाने के लिए इसकी तैयारी होलाष्टक के पहले दिन से शुरू हो जाती है। जहां होलिका को जलाने के लिए खूंटा लगाया जाता है, वहां लकड़ियां रख दी जाती हैं और अगले आठ दिनों वहां सूखी लकड़ियों को जमा किया जाता है। इसके बाद होलिका दहन के दिन पूजा करके होलिका दहन किया जाता है।

होलाष्टक की पौराणिक कथा


होलाष्टक को आखिर क्यों अशुभ काल माना जाता है इसका उल्लेख शिव पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार, तारकासुर का वध शिव पुत्र कर सकता है, ऐसा उसको वरदान प्राप्त था लेकिन सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव तपस्या में लीन हो गए थे। वहीं दूसरी तरह तारकासुर का अत्याचार फैलना लगा, इसे देवी-देवता परेशान हो गए। देवताओं ने योजना बनाकर भगवान शिव को तपस्या से विमुख करना चाहा इसके लिए उन्होंने कामदेव और देवी रति को आगे कर दिया। कामदेव और रति ने शिवजी की तपस्या भंग कर दी और तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया, जिस दिन यह घटना हुई उस दिन फाल्गुन की अष्टमी तिथि थी। इस घटना के बाद देवी-देवता कामदेव और रति के लिए क्षमा मांगने लगे प्रार्थना करने लगे, ऐसा करते-करते आठ दिन हो गए। आठवें दिन भगवान शिव ने कामदेव को फिर से जीवित कर दिया, उस दिन फाल्गुन की पूर्णिमा तिथि थी। इस वजह से होलाष्टक अशुभ काल माना जाता है।

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होलाष्टक की दूसरी पौराणिक कथा

एक अन्य कथा के अनुसार, होलिका ने राजा हिरण्यकश्यप के कहने पर प्रहलाद को लेकर आठ दिनों तक अग्नि में बैठी रही लेकिन जब वह नवमें दिन प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई इसलिए भी विष्णु भक्तों में हर जगह उत्सव मनाया गया। इसलिए आठ दिनों को अशुभ काल माना जाता है। मान्यता है कि इस घटना के बाद से ही होलाष्टक मनाया जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टि से भी होलाष्टक अशुभ काल


होलाष्टक केवल धार्मिक वजहों से ही नहीं बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि के हिसाब से भी इसे अशुभ काल माना गया है। मान्यता है कि अष्टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा तक ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं रहती। अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक अलग-अलग दिनों में अलग-अलग ग्रह उग्र हो जाते हैं, जैसे अष्टमी तिथि को चंद्रमा उग्र हो जाते हैं। उसी प्रकार नवमी तिथि को सूर्य, दशमी तिथि को शनि, एकादशी तिथि को शुक्र, द्वादशी तिथि को गुरु, त्रयोदशी तिथि को बुध, चतुर्दशी तिथि को मंगल और पूर्णिमा तिथि को राहु उग्र अर्थात प्रतिकूल स्थिति में आ जाते हैं। जिसका सीधा असर नकारात्मक शक्तियों पर पड़ता है। ग्रहों के उग्र होने से निर्णय लेने क्षमता क्षीण हो जाती है और इस दौरान कई गलत फैसले व्यक्ति ले सकता है, जिससे हानि की आशंका बनी रहती है।

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