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क्यूबा में गहराया ऊर्जा संकट: डीजल और फ्यूल ऑयल खत्म, 20-22 घंटे तक अंधेरे में डूबे शहर; अमेरिका पर लगे गंभीर आरोप

क्यूबा गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, जहां डीजल और फ्यूल ऑयल खत्म होने से 20-22 घंटे तक बिजली कटौती हो रही है। हवाना सहित कई शहर अंधेरे में हैं और अमेरिका पर प्रतिबंधों को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Thu, 14 May 2026 11:14:37

क्यूबा में गहराया ऊर्जा संकट: डीजल और फ्यूल ऑयल खत्म, 20-22 घंटे तक अंधेरे में डूबे शहर; अमेरिका पर लगे गंभीर आरोप

कैरेबियाई देश क्यूबा इस समय इतिहास के सबसे भीषण ऊर्जा संकटों में से एक से गुजर रहा है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि सरकार के ऊर्जा मंत्री ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि देश में अब डीजल और फ्यूल ऑयल का पूरा भंडार समाप्त हो चुका है। राजधानी हवाना सहित कई शहरों में हालात ऐसे हैं कि लोगों को प्रतिदिन 20 से 22 घंटे तक बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है। इससे जीवन की बुनियादी सुविधाएं—जैसे भोजन, दवा, परिवहन और जल आपूर्ति—गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं। क्यूबा सरकार इस संकट के लिए मुख्य रूप से अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और ईंधन आपूर्ति में बाधा को जिम्मेदार ठहरा रही है।

ऊर्जा मंत्री का बयान और मौजूदा स्थिति

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, क्यूबा के ऊर्जा और खनन मंत्री विसेंट डे ला ओ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के पास अब न तो फ्यूल ऑयल बचा है और न ही डीजल का कोई भंडार मौजूद है। उन्होंने सरकारी मीडिया से बातचीत में कहा, “हम पूरी तरह खाली हो चुके हैं, हमारे पास कोई डीजल या फ्यूल ऑयल नहीं बचा है।” मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि देश की बिजली व्यवस्था बेहद नाजुक स्थिति में पहुंच चुकी है और किसी भी तरह का आपातकालीन भंडार उपलब्ध नहीं है।

उनके अनुसार, पिछले कुछ दिनों और हफ्तों में हवाना और अन्य क्षेत्रों में बिजली कटौती की स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है। कई इलाकों में लोग दिन के अधिकतर हिस्से में अंधेरे में रहने को मजबूर हैं। पहले से ही भोजन, ईंधन और दवाओं की कमी झेल रहे नागरिकों की परेशानियां अब और बढ़ गई हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में देश की बिजली व्यवस्था घरेलू कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और सीमित नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर है, जो मांग के मुकाबले बेहद कम हैं।

सौर ऊर्जा प्रयासों के बावजूद नहीं मिली राहत

क्यूबा ने पिछले दो वर्षों में लगभग 1300 मेगावाट सौर ऊर्जा क्षमता विकसित करने की दिशा में काम किया है, लेकिन ईंधन संकट और कमजोर ग्रिड सिस्टम के कारण इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। तकनीकी सीमाओं और संसाधनों की कमी के चलते सौर ऊर्जा उत्पादन का बड़ा हिस्सा उपयोग में नहीं आ पा रहा, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं।

ऊर्जा संकट की वजह क्या बताई जा रही है?

क्यूबा सरकार का दावा है कि यह संकट मुख्य रूप से लंबे समय से जारी अमेरिकी नाकेबंदी और प्रतिबंधों का परिणाम है। मंत्री ने कहा कि प्रतिबंधों के बावजूद देश लगातार ईंधन आयात के विकल्प तलाश रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में हालात और भी कठिन हो गए हैं। उन्होंने अमेरिका-इजरायल और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनावों का हवाला देते हुए कहा कि वैश्विक तेल आपूर्ति और परिवहन लागत में भारी वृद्धि हुई है, जिससे ईंधन की उपलब्धता और महंगी हो गई है।

उन्होंने यह भी कहा, “हम किसी भी ऐसे देश से तेल खरीदने के लिए तैयार हैं जो हमें ईंधन बेचने को इच्छुक हो,” लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां इसे और जटिल बना रही हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पहले क्यूबा को ईंधन आपूर्ति करने वाले प्रमुख देश—मैक्सिको और वेनेजुएला—ने जनवरी 2026 के बाद से आपूर्ति बंद कर दी है। इसके पीछे डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की उस नीति को जिम्मेदार बताया जा रहा है, जिसमें क्यूबा को ईंधन देने वाले देशों पर आर्थिक प्रतिबंध और टैरिफ लगाने की चेतावनी दी गई थी। इसके अलावा, दिसंबर के बाद से केवल एक रूसी तेल टैंकर “अनातोली कोलोडकिन” ही क्यूबा तक कच्चा तेल पहुंचा सका, जिससे अप्रैल में कुछ समय के लिए आंशिक राहत मिली थी।

जनजीवन पर भारी असर, संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया

लगातार बढ़ती बिजली कटौती ने लगभग एक करोड़ की आबादी वाले क्यूबा में जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। राजधानी हवाना और अन्य शहरों में सार्वजनिक सेवाएं चरमरा गई हैं और लोगों का दैनिक जीवन मुश्किल हो गया है। अस्पताल, स्कूल, परिवहन और जल आपूर्ति जैसी आवश्यक सेवाएं भी इस संकट से प्रभावित हैं।

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई है। पिछले सप्ताह संगठन ने अमेरिकी ईंधन प्रतिबंधों को अनुचित बताते हुए कहा कि इससे क्यूबा के नागरिकों के मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस संकट का असर लोगों के भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पानी और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं पर पड़ रहा है, जिससे मानवीय स्थिति और गंभीर होती जा रही है।

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