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बंगाल में सड़कों के नाम बदलने की तैयारी, सीएम शुभेंदु बोले- मुगल-पठान नामों वाली सड़कें नहीं रहेंगी

पश्चिम बंगाल में सड़कों और सार्वजनिक स्थलों के नामों की समीक्षा की तैयारी शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मुगल, पठान और ब्रिटिश काल से जुड़े नामों पर पुनर्विचार के लिए विशेष समिति गठित करने का ऐलान किया है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Wed, 24 Jun 2026 8:54:01

बंगाल में सड़कों के नाम बदलने की तैयारी, सीएम शुभेंदु बोले- मुगल-पठान नामों वाली सड़कें नहीं रहेंगी

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर नामकरण को लेकर बहस तेज हो गई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में स्पष्ट संकेत दिया है कि राज्य की सड़कों, इलाकों और सार्वजनिक स्थलों के नामों की व्यापक समीक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में कोलकाता समेत राज्य के किसी भी हिस्से में मुगल, पठान या औपनिवेशिक ब्रिटिश शासकों से जुड़े नामों को बनाए रखने पर पुनर्विचार किया जाएगा। इसी उद्देश्य से सरकार एक विशेष समिति का गठन करने जा रही है, जो पुराने नामों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन कर अपनी सिफारिशें देगी।

सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलने पर गरमाई बहस

यह मुद्दा उस समय चर्चा में आया जब कोलकाता नगर निगम (केएमसी) ने पार्क सर्कस क्षेत्र स्थित सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड कर दिया। इस फैसले को लेकर मंगलवार को विधानसभा में लंबी बहस हुई। राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान विपक्षी नेताओं ने सरकार के इस कदम पर सवाल उठाए और इसे इतिहास से छेड़छाड़ करार दिया।

विपक्ष के नेता रीताब्रत बनर्जी ने सदन में कहा कि जिस सड़क का नाम बदला गया है, उसका संबंध पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी से नहीं था। उनका दावा था कि यह नाम सुहरावर्दी परिवार की एक अलग ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा हुआ था, इसलिए इसे हटाना उचित नहीं माना जा सकता।

ऐतिहासिक संदर्भ को लेकर विपक्ष ने रखा पक्ष

बहस के दौरान रीताब्रत बनर्जी ने कहा कि सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम मौलाना ओबैदुल्ला सुहरावर्दी और उनके परिवार के सम्मान में रखा गया था। उन्होंने यह भी बताया कि वर्ष 1932 में इस सड़क का नाम सर हसन सुहरावर्दी के नाम पर रखा गया था, जो एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम कुलपति बनने का गौरव भी उन्हें प्राप्त था।

विपक्ष का कहना था कि किसी नाम को हटाने से पहले उससे जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों और योगदानों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि केवल राजनीतिक या वैचारिक आधार पर ऐसे निर्णय लेने से इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज किया जा सकता है।

मुख्यमंत्री ने फैसले का किया बचाव

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विपक्ष की आपत्तियों का जवाब देते हुए कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि उन नामों की समीक्षा करना है जो बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और गौरव से मेल नहीं खाते। उन्होंने कहा कि कोलकाता और पश्चिम बंगाल की सड़कों तथा सार्वजनिक स्थलों पर ऐसे नामों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो स्थानीय विरासत, राष्ट्रनिर्माण और समाज के सकारात्मक योगदान का प्रतिनिधित्व करते हों।

मुख्यमंत्री ने सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलने के निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि यह एक ऐतिहासिक सुधार की दिशा में उठाया गया कदम है। उनके अनुसार, समय-समय पर ऐसे निर्णयों की समीक्षा आवश्यक होती है ताकि सार्वजनिक स्थानों के नाम समाज की वर्तमान सोच और मूल्यों को भी प्रतिबिंबित कर सकें।

नामों की समीक्षा के लिए बनेगी विशेष समिति

सदन में बोलते हुए मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि राज्य सरकार एक उच्चस्तरीय समिति गठित करेगी, जो सड़कों, चौराहों और अन्य सार्वजनिक स्थलों के नामों की समीक्षा करेगी। यह समिति विभिन्न ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।

उन्होंने बताया कि इस समिति की अध्यक्षता स्वामी प्रदीपानंद महाराज करेंगे, जिन्हें आमतौर पर कार्तिक महाराज के नाम से जाना जाता है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आम नागरिकों को भी अपने सुझाव देने का अवसर मिलेगा, ताकि प्रक्रिया अधिक सहभागी और पारदर्शी बन सके।

बंगाली पहचान और सांस्कृतिक विरासत पर जोर

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने संबोधन में कहा कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक मजबूती देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि राज्य की ऐतिहासिक विरासत, साहित्य, समाज सुधारकों और राष्ट्रभक्तों को सम्मान देने की दिशा में सरकार लगातार काम करेगी।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ विशेष व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनका योगदान राष्ट्रीय स्तर पर निर्विवाद रहा है और उनके नामों का सम्मान जारी रहेगा। मुख्यमंत्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी महान देशभक्त या राष्ट्रनिर्माता के नाम को सार्वजनिक स्थलों से जोड़ने का प्रस्ताव आता है, तो सरकार उस पर सकारात्मक रूप से विचार करेगी।

जनता से भी मांगे जाएंगे सुझाव

सरकार द्वारा गठित की जाने वाली समिति केवल प्रशासनिक स्तर पर ही काम नहीं करेगी, बल्कि आम लोगों के सुझावों को भी महत्व देगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के नागरिक अपनी राय और प्रस्ताव समिति के समक्ष रख सकेंगे। इसके बाद ऐतिहासिक तथ्यों, सामाजिक महत्व और जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

इस घोषणा के बाद राज्य की राजनीति में नया विमर्श शुरू हो गया है। एक ओर सरकार इसे सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का प्रयास बता रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इतिहास और विरासत से जुड़े पहलुओं को लेकर सवाल उठा रहा है। आने वाले समय में समिति की सिफारिशें और सरकार के अगले कदम इस बहस को और अधिक महत्वपूर्ण बना सकते हैं।

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