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बसंत पंचमी से शुरू होगी महाकुंभ की सबसे कठिन तपस्या, 350 साधु करेंगे 16 घंटे का कठोर तप – जानें इस तपस्या का महत्व

प्रयागराज में महाकुंभ का उत्साह चरम पर है, जहां देश-विदेश से आए श्रद्धालु गंगा स्नान कर रहे हैं। इसी बीच वैष्णव परंपरा के तपस्वी वसंत पंचमी से कुंभ नगरी में सबसे कठिन साधना शुरू करने जा रहे हैं।

Posts by : Sandeep Gupta | Updated on: Fri, 31 Jan 2025 1:43:46

बसंत पंचमी से शुरू होगी महाकुंभ की सबसे कठिन तपस्या, 350 साधु करेंगे 16 घंटे का कठोर तप – जानें इस तपस्या का महत्व

प्रयागराज में महाकुंभ का उत्साह चरम पर है, जहां देश-विदेश से आए श्रद्धालु गंगा स्नान कर रहे हैं। इसी बीच वैष्णव परंपरा के तपस्वी वसंत पंचमी से कुंभ नगरी में सबसे कठिन साधना शुरू करने जा रहे हैं। खाक चौक में इसकी तैयारियां जोरों पर हैं। इस वर्ष 350 साधक खप्पर तपस्या करेंगे, जो धूनी साधना की अंतिम और सबसे कठिन श्रेणी मानी जाती है।

वैष्णव परंपरा में श्रीसंप्रदाय (रामानंदी संप्रदाय) के साधुओं के लिए धूना तापना सबसे कठिन तपस्या मानी जाती है। पंचांग के अनुसार, यह तपस्या सूर्य के उत्तरायण होने के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होती है। तेरह भाई त्यागी आश्रम के परमात्मा दास ने बताया कि साधक तपस्या से पहले निराजली व्रत रखते हैं और फिर धूनी में बैठते हैं।

यह तपस्या छह चरणों में पूरी होती है—पंच, सप्त, द्वादश, चौरासी, कोटि और खप्पर। हर चरण को पूरा करने में तीन साल लगते हैं, और पूरी तपस्या 18 वर्षों में संपन्न होती है। अखाड़े में साधुओं की वरिष्ठता इसी तपस्या के आधार पर तय होती है।

धूनी साधना की छह श्रेणियां, बढ़ती अग्नि परीक्षा के साथ कठिन तपस्या

दिगंबर अखाड़े के संत सीताराम दास के अनुसार, धूनी साधना की छह श्रेणियों में प्रत्येक की विधि अलग होती है। साधुओं की तपस्या पंच श्रेणी से शुरू होती है, जो उनकी दीक्षा के बाद की पहली साधना होती है। इस चरण में साधक पांच स्थानों पर जलती हुई अग्नि के बीच बैठकर तपस्या करते हैं।

दूसरी श्रेणी, सप्त श्रेणी में, सात स्थानों पर जलती अग्नि के मध्य साधना करनी होती है। इसी क्रम में द्वादश श्रेणी में 12 स्थानों पर, 84 श्रेणी में 84 स्थानों पर, और कोटि श्रेणी में सैकड़ों स्थानों पर जलती अग्नि की आंच के बीच साधक तपस्या करते हैं। हर श्रेणी में तपस्या की कठिनाई बढ़ती जाती है, और यही साधुओं की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को निर्धारित करती है।

खप्पर तपस्या: वैराग्य और आत्मसंयम की कठिनतम साधना

खप्पर तपस्या वैष्णव परंपरा की सबसे कठिन साधना मानी जाती है। परमात्मा दास के अनुसार, इस साधना में साधक को सिर पर एक मटका रखना होता है, जिसमें अग्नि प्रज्वलित रहती है। तपस्वी को इस जलती अग्नि की आंच के बीच प्रतिदिन 6 से 16 घंटे तक तप करना पड़ता है। यह कठोर साधना वसंत पंचमी से शुरू होकर गंगा दशहरा तक चलती है और तीन वर्षों तक निरंतर जारी रहती है।

जब साधक इस चरण को पूरा कर लेते हैं, तो उनकी 18 वर्षों की तपस्या पूर्ण मानी जाती है। अखाड़ों, आश्रमों और खालसा में इस कठिन साधना की तैयारियां जोरों पर हैं। इस बार दिगंबर, निर्मोही और निर्वाणी अखाड़ों के साथ खाक चौक में लगभग साढ़े तीन सौ तपस्वी खप्पर तपस्या करेंगे, जबकि अन्य साधक अपनी-अपनी साधना के अन्य चरणों का पालन करेंगे।

खप्पर तपस्या के बाद भी कई संत दोबारा करते हैं कठिन साधना

खाक चौक के तपस्वियों के बीच उनकी साधना ही उनकी वरिष्ठता तय करती है। संत समाज में वही साधक सर्वोच्च स्थान पाते हैं, जिन्होंने खप्पर तपस्या पूर्ण की होती है। महाकुंभ के दौरान कई संत अपनी साधना की शुरुआत पंच धूना से करते हैं, जो वैष्णव परंपरा में पहला चरण माना जाता है। इसके बाद विभिन्न चरणों को पूरा करते हुए वे खप्पर श्रेणी तक पहुंचते हैं, जिसे अंतिम और सबसे कठिन तपस्या माना जाता है।

खप्पर तपस्या पूरी करने वाले साधकों को संत समाज में सबसे वरिष्ठ माना जाता है। हालांकि, कई तपस्वी इस कठिन साधना को एक बार पूरा करने के बाद भी पुनः आरंभ करते हैं और जीवनभर आत्मसंयम व वैराग्य के मार्ग पर चलते रहते हैं।

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