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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का कथन, भारतीय मान्यताओं और संस्कृति के लिए कलंक है लिव-इन रिलेशनशिप

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा भारतीय संस्कृति के लिए कलंक बनी हुई है, क्योंकि यह पारंपरिक भारतीय मान्यताओं के खिलाफ है।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Thu, 09 May 2024 1:25:15

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का कथन, भारतीय मान्यताओं और संस्कृति के लिए कलंक है लिव-इन रिलेशनशिप

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा भारतीय संस्कृति के लिए कलंक बनी हुई है, क्योंकि यह पारंपरिक भारतीय मान्यताओं के खिलाफ है। जस्टिस गौतम भादुड़ी और जस्टिस संजय एस. अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि यह पश्चिम सभ्यता है, जो भारतीय सिद्धांतों की सामान्य अपेक्षाओं के विपरीत है। पर्सनल लॉ के नियमों को किसी भी अदालत में तब तक लागू नहीं किया जा सकता, जब तक उन्हें प्रथागत प्रथाओं के रूप में प्रस्तुत और मान्य नहीं किया जाता।

ज्ञातव्य है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पीठ दंतेवाड़ा निवासी अब्दुल हमीद सिद्दीकी (43) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। वह अलग धर्म की महिला कविता गुप्ता (36) के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में था। दोनों का एक बच्चा है। बाद में महिला अलग हो गई थी। बच्चे की कस्टडी को लेकर दंतेवाड़ा की फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2023 में अब्दुल हमीद सिद्दीकी की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने भी सुनवाई के बाद याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने व्यक्तिगत कानूनों और अंतरधार्मिक विवाहों की जटिलताओं पर जिक्र किया।

अपीलकर्ता, अब्दुल हमीद सिद्दीकी ने दंतेवाड़ा के पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा 13/12/2023 को पारित निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया था, जिसमें उनके और प्रतिवादी, कविता गुप्ता के संबंध से उत्पन्न बच्चे की हिरासत के लिए उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था।

अपीलकर्ता के अनुसार, उन्होंने 2021 में धर्मांतरण के बिना शादी की थी। सिद्दीकी ने दावा किया कि गुप्ता उनकी दूसरी पत्नी थीं, क्योंकि वह पहले से ही शादीशुदा थे और उनकी पहली पत्नी से तीन बच्चे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि विवादित बच्चा 31/08/2021 को पैदा हुआ था। हालांकि, 10/08/2023 को सिद्दीकी को पता चला कि गुप्ता और बच्चा गायब थे। इसके बाद, उन्होंने हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की।

कार्यवाही के दौरान, यह पता चला कि सिद्दीकी और गुप्ता शादी से पहले एक लिव-इन संबंध में थे। सिद्दीकी ने दावा किया कि उन्होंने 1954 के विशेष विवाह अधिनियम के तहत एक अंतरधार्मिक विवाह किया था। हालांकि, गुप्ता, जो हिंदू धर्म का पालन करती रहीं, ने शादी से पहले इस्लाम धर्म में धर्मांतरण नहीं किया था।

अपीलकर्ता का तर्क था कि चूंकि वह मुस्लिम कानून द्वारा शासित हैं, उन्हें दूसरी शादी करने की अनुमति है। हालांकि, प्रतिवादी के वकील, वीरेंद्र वर्मा का तर्क था कि याचिका में विवाह की वैधता के बारे में कोई दलील नहीं दी गई थी। वर्मा ने तर्क दिया कि बिना इस्लाम में धर्मांतरण के, गुप्ता की सिद्दीकी के साथ मुस्लिम कानून के तहत शादी वैध नहीं थी।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा, “एक मुस्लिम पुरुष जो पहले से ही विवाहित है, वह बिना अपनी परंपरा साबित किए या तलाक लिए बिना फिर से शादी नहीं कर सकता।”

न्यायालय ने सिद्दीकी की याचिका में विरोधाभास की ओर भी इशारा किया। जीवित पत्नी होने के बावजूद, उन्होंने दावा किया कि उन्होंने गुप्ता से 1954 के अधिनियम के तहत शादी की थी। अधिनियम की धारा 4 (ए) के अनुसार, दो व्यक्तियों के बीच विवाह तभी संपन्न किया जा सकता है जब विवाह के समय किसी भी पक्ष का कोई जीवित पति या पत्नी न हो। इसलिए, सिद्दीकी की दूसरी शादी, पहली पत्नी से तलाक न लेने के कारण, शुरू से ही अमान्य मानी गई थी।

न्यायालय ने इंदिरा शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा (2013) 15 SCC 755 के मामले का हवाला दिया, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि विवाह के समान संबंधों को तब तक मान्यता नहीं दी जाती जब तक कि उन्हें ऐसा साबित न किया जाए।

न्यायाधीशों ने आगे देखा, “लिव-इन संबंध एक आयातित दर्शन है जो भारतीय आदर्शों की आम अपेक्षाओं के विरुद्ध है। ऐसे संबंध लंबे समय तक चल सकते हैं और निर्भरता और कमजोरी का एक पैटर्न उत्पन्न कर सकते हैं। जहां बच्चे पैदा होते हैं, वहां लिव-इन संबंधों में विपत्तियों के मामलों में, न्यायालय पीड़ितों की कमजोर स्थिति को नजरअंदाज नहीं कर सकता।”

अंत में, हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि अपीलकर्ता की हिरासत की मांग उचित नहीं थी। अपील खारिज कर दी गई।

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