आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोगों की नींद का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। देर रात तक मोबाइल फोन चलाना, लैपटॉप पर ऑफिस का काम निपटाना या सोशल मीडिया पर घंटों समय बिताना अब आम बात हो गई है। खासतौर पर युवाओं और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों के बीच आधी रात के बाद तक जागना एक सामान्य दिनचर्या बन चुका है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार कम नींद लेना केवल अगले दिन की थकान का कारण नहीं बनता, बल्कि यह दिमाग और हृदय से जुड़ी गंभीर बीमारियों का जोखिम भी बढ़ा सकता है। न्यूरोलॉजिस्ट्स के मुताबिक, लंबे समय तक रातभर जागने की आदत मिनी स्ट्रोक जैसी खतरनाक स्थिति को जन्म दे सकती है।
क्या होता है मिनी स्ट्रोक?
मिनी स्ट्रोक को चिकित्सा विज्ञान में ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (Transient Ischemic Attack - TIA) कहा जाता है। यह तब होता है जब कुछ समय के लिए मस्तिष्क के किसी हिस्से तक रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है। हालांकि इसके लक्षण अक्सर कुछ मिनटों या थोड़े समय बाद अपने आप समाप्त हो जाते हैं, लेकिन इसे सामान्य घटना समझना भारी पड़ सकता है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के अनुसार, जिन लोगों को एक बार ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक हो चुका होता है, उनमें लगभग हर तीन में से एक व्यक्ति को आगे चलकर स्ट्रोक होने का खतरा रहता है। इनमें से लगभग आधे मामलों में स्ट्रोक एक वर्ष के भीतर देखने को मिलता है।
नींद की कमी कैसे बढ़ाती है जोखिम?
विशेषज्ञों का कहना है कि पर्याप्त नींद न लेना शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों को प्रभावित करता है। डॉ. चंदना आर. गौड़ा ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में बताया कि लगातार कम नींद लेने से शरीर में तनाव से जुड़े हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। इसके साथ ही रक्तचाप असंतुलित होने लगता है, शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ती है और मेटाबॉलिज्म भी प्रभावित होता है। जब ये सभी समस्याएं लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं पर दबाव बढ़ता है, जिससे पहले मिनी स्ट्रोक और बाद में गंभीर स्ट्रोक की आशंका बढ़ सकती है।
पर्याप्त नींद शरीर के लिए क्यों है जरूरी?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी और पर्याप्त नींद केवल थकान दूर करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शरीर की मरम्मत प्रक्रिया का भी अहम हिस्सा है। सोने के दौरान रक्त वाहिकाएं बेहतर तरीके से कार्य करती हैं, ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और शरीर में मौजूद सूजन कम होने लगती है। यदि लगातार कई दिनों या महीनों तक नींद पूरी न हो, तो ये प्राकृतिक प्रक्रियाएं प्रभावित होने लगती हैं। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट (NHLBI) की रिपोर्ट भी बताती है कि लंबे समय तक नींद की कमी हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा बढ़ा देती है। यही सभी समस्याएं आगे चलकर स्ट्रोक के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल होती हैं।
क्या है 'रिवेंज बेडटाइम प्रॉक्रैस्टिनेशन'?
हाल के वर्षों में विशेषज्ञों ने एक नई लाइफस्टाइल समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया है, जिसे रिवेंज बेडटाइम प्रॉक्रैस्टिनेशन (Revenge Bedtime Procrastination) कहा जाता है। इसका अर्थ है कि दिनभर काम में व्यस्त रहने के बाद लोग अपने लिए थोड़ा समय निकालने की कोशिश में जानबूझकर देर रात तक जागते रहते हैं, जबकि उनके शरीर को आराम की आवश्यकता होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, देर रात तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल, लगातार स्क्रीन के सामने समय बिताना और केवल चार-पांच घंटे की नींद लेना अब बड़ी संख्या में युवाओं की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। यदि यह आदत लंबे समय तक जारी रहती है, तो भविष्य में गंभीर न्यूरोलॉजिकल और कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
किन संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
मिनी स्ट्रोक की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण अक्सर थोड़े समय के लिए दिखाई देते हैं और फिर सामान्य हो जाते हैं, जिसके कारण लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते। यदि अचानक शरीर के किसी एक हिस्से में कमजोरी या सुन्नपन महसूस हो, बोलने में कठिनाई आए, चक्कर महसूस हों, आंखों के सामने धुंधलापन छा जाए, चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा दिखाई देने लगे या कुछ मिनटों तक भ्रम की स्थिति बनी रहे, तो इसे सामान्य थकान समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे किसी भी संकेत के दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना बेहद जरूरी है, क्योंकि समय पर इलाज मिलने से भविष्य में होने वाले बड़े स्ट्रोक के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।













