
बॉलीवुड में अक्सर ओपनिंग-डे की कमाई ही फ़ैसला सुना देती है, और इसी कसौटी पर वॉर 2 ने सबको चौंका दिया। YRF स्पाई यूनिवर्स का दम, ऋतिक रोशन का सबसे बैंकएबल एक्शन अवतार और RRR के बाद जूनियर एनटीआर की पैन-इंडिया अपील—इन सभी के बावजूद फ़िल्म वह धमाका नहीं कर पाई जिसकी उम्मीद थी। सवाल यह उठता है कि तमाम सितारा-शक्ति, ब्रैंड इक्विटी और बड़े पैमाने के बावजूद यह फ्रैंचाइज़ी सीक्वल पहले ही कदम पर लड़खड़ा कैसे गया? क्या मार्केटिंग कमजोर रही, फ्रैंचाइज़ी थकान हावी हो गई या फिर चमकदार स्पेक्टेकल के भीतर दमदार कंटेंट की कमी रह गई?
ऊँची उम्मीदें, फीकी शुरुआत
2019 में आई पहली वॉर ने गांधी जयंती पर ₹53.35 करोड़ की रिकॉर्ड शुरुआती कमाई कर एक्शन फ्रैंचाइज़ी के लिए नई रेखा खींच दी थी। इस बार कैनवास बड़ा था, दो बड़े स्टार साथ थे, और ब्रैंड YRF का भरोसा भी। ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श याद दिलाते हैं कि रिलीज़ से पहले यह “मार्केट की सबसे हॉट फ़िल्मों में” थी, और स्वाभाविक था कि पार्ट-2 इतिहास फिर से लिखे। मगर शुरुआती संकेत ही चिंता बढ़ाने वाले थे—एडवांस बुकिंग उम्मीद के मुताबिक नहीं चली, स्पॉट बुकिंग भी रफ्तार नहीं पकड़ सकीं। स्वतंत्रता दिवस और जन्माष्टमी जैसे छुट्टियों का लाभ मिलने के बावजूद नंबर उड़ान नहीं भर पाए।
टीज़र-ट्रेलर और म्यूज़िक का असर क्यों नहीं हुआ?
फ़िल्म ट्रेड एक्सपर्ट अतुल मोहन के मुताबिक असली दिक्कत “कमज़ोर बज़” रही। टीज़र से लेकर ट्रेलर और गानों तक, कुछ भी ऐसा नहीं था जो दर्शकों को बांध सके। पहली वॉर में घुंघरू और जय जय शिव शंकर रिलीज़ से पहले ही चार्टबस्टर बन गए थे और थिएट्रिकल पुलर का काम किया था; इस बार वह हुक ही गायब रहा। प्रमोज़ में भारी-भरकम वीएफएक्स दिखे, पर दर्शक आश्वस्त नहीं हुए। एग्ज़िबिटर अक्षय राठी भी मानते हैं कि ट्रेलर का इम्पैक्ट अपेक्षित स्तर का नहीं था—फ्रैंचाइज़ी सीक्वल से जहाँ पहले भाग से “ज्यादा बड़ी शुरुआत” की उम्मीद होती है, वहाँ वॉर 2 की ओपनिंग उसके आधे के आसपास सिमट गई।
“लुक बढ़िया, दिल नहीं”—कंटेंट पर सबसे बड़ी उंगली
मार्केटिंग के परे, बात जब कंटेंट पर आई तो कई विशेषज्ञों ने कमियों की ओर इशारा किया। तरण आदर्श ने इसे YRF स्पाई यूनिवर्स की “सबसे कमज़ोर फ़िल्म” करार दिया—“स्टंट्स कमाल के हैं, पैसा भी खुलकर खर्च हुआ, लेकिन कहानी में रूह नहीं। जैसे अच्छे कपड़े पहनाने से मानकिन ज़िंदा नहीं हो जाता—वैसे ही यह फ़िल्म दिखने में शानदार है, पर दिल नहीं धड़कता।” पैकेजिंग भले चमकीली थी, पर कहानी और भावनात्मक ग्राफ़ उतना असर नहीं छोड़ पाए।
रिलीज़ रणनीति—गुरुवार ने खेल बिगाड़ा?
रिलीज़ प्लान पर भी सवाल खड़े हुए। अतुल मोहन और प्रोड्यूसर-फ़िल्म बिज़नेस एक्सपर्ट गिरीश जौहर, दोनों मानते हैं कि गुरुवार (14 अगस्त) को रिलीज़ करने का निर्णय उल्टा पड़ा। यह न तो भारत में, न ही विदेश में छुट्टी थी। शुरुआती समीक्षाएँ तुरंत आ गईं और स्वतंत्रता दिवस की बड़ी भीड़ से पहले ही निगेटिव वर्ड-ऑफ़-माउथ फैल गया। जौहर के अनुसार अगर फ़िल्म सीधे 15 अगस्त को उतरती तो शुरुआती संख्याएँ कहीं ज़्यादा मज़बूत हो सकती थीं; गुरुवार की रिलीज़ ने छुट्टी के प्रभाव को “सुस्त” कर दिया।
संगीत—YRF की पुरानी ताकत, इस बार मिस
YRF ब्रैंड के लिए म्यूज़िक अक्सर थिएट्रिकल पुलर की भूमिका निभाता रहा है—खासकर टियर-2/3 शहरों में। जौहर का मानना है कि जनता के बीच पैठ बनाने के लिए कम-से-कम एक-दो बड़े हिट गाने ज़रूरी होते हैं; इस बार वह कार्ड मज़बूती से नहीं खेला गया। नतीजा: पारिवारिक दर्शकवर्ग तक पहुँच उतनी तीखी नहीं बन पाई।
‘स्पेक्टेकल थकान’ और OTT का असर
एग्ज़िबिटर विशेक चौहान बड़ी तस्वीर रखते हैं—2008 के बाद से ही “बड़े पैमाने की दुनिया-बचाओ” किस्म की फ़िल्में वैश्विक बाज़ार पर छाई हुई हैं। मार्वल, डीसी से लेकर फ़ास्ट एंड फ्यूरियस तक—दर्शक सब देख चुके हैं। OTT ने ऐसे स्पेक्टेकल कंटेंट को और आसानी से सुलभ कर दिया है, इसलिए थिएटर में वही फिल्में अब चलती हैं जो तकनीकी चमक के साथ मजबूत कहानी और भावनात्मक निवेश भी दें। सिर्फ़ भव्यता अब टिकट खिड़की पर गारंटी नहीं रही।
एडिटिंग और पेसिंग—“आधा घंटा कम होता तो…”
SSR Cinemas Pvt. Ltd. के सीईओ सत्यदीप साहा के मुताबिक पैकेजिंग अच्छी होने के बावजूद फ़िल्म “खींची हुई” महसूस होती है—खासकर एक्शन ब्लॉक्स में। उनके शब्दों में, अगर लगभग आधे घंटे की कटौती होती तो नैरेटिव ज़्यादा टाइट और एंगेजिंग हो सकता था।
स्केल और स्टारपावर से आगे बढ़कर
वॉर 2 की कटु सीख साफ़ है—स्केल, स्टारपावर और फ्रैंचाइज़ी ब्रैंड अपने-आप में पर्याप्त नहीं हैं। कमज़ोर बज़, नहीं चल पाए गाने, प्रभावहीन ट्रेलर, गुरुवार की रिलीज़, OTT युग में स्पेक्टेकल थकान, ढीली पेसिंग और सबसे बढ़कर—भावनात्मक कोर की कमी—इन सबने मिलकर ओपनिंग मोमेंटम को दबा दिया। फ्रैंचाइज़ी को अगले कदम के लिए यह समझना होगा कि आज का दर्शक सिर्फ़ दृश्य-विलास नहीं, बल्कि दिल और दिमाग़ दोनों को छूने वाली कहानी चाहता है। तभी बड़े पर्दे पर “थंडरक्लैप” दोबारा सुनाई देगा।














