
—राजेश कुमार भगताणी
‘कांतारा चैप्टर 1’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय लोकविश्वास, परंपरा और आध्यात्मिक प्रतीकों का एक जीवित संसार है। ऋषभ शेट्टी ने जिस गहराई और आत्मिक जुड़ाव के साथ ‘कांतारा’ के पहले भाग को रचा था, यह अध्याय उसी विरासत को आगे बढ़ाता है, बल्कि कई मायनों में और भी विस्तृत रूप में प्रस्तुत करता है। फिल्म की जड़ें दक्षिण भारत की भूमि, उसके देव-पूजन, लोकगीतों, पवित्र अनुष्ठानों और जनविश्वास में गहराई तक पैठी हुई हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका सांस्कृतिक आत्मविश्वास है। ‘कांतारा चैप्टर 1’ आधुनिक सिनेमा की उस धारा के विपरीत खड़ी होती है जहाँ मिथक और लोककथा को केवल दृश्य सौंदर्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ हर दृश्य, हर ध्वनि, हर प्रतीक का धार्मिक और सामाजिक अर्थ है। ऋषभ शेट्टी के निर्देशन में देव-मानव संबंध केवल अध्यात्म नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार का प्रतीक बन जाते हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी लोकविश्वास की रहस्यमयता को कैद करती है — आग, धूल, संगीत और अनुष्ठान सब एक प्रार्थना की तरह दिखाई देते हैं।
लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, यही भव्यता कभी-कभी अपने भार तले दब जाती है। पूर्वार्ध में जहाँ कहानी अपनी जड़ों के प्रति गहरी संवेदनशीलता दिखाती है, वहीं कुछ दृश्य कथानक की लय को तोड़ते हैं। नायक और नायिका के बीच के प्रेम प्रसंग, यद्यपि खूबसूरती से फिल्माए गए हैं, पर कहानी के सामाजिक और दार्शनिक ढाँचे में स्वाभाविक रूप से नहीं घुलते। इन्हें देखकर लगता है कि निर्देशक ने भावनात्मक राहत देने के लिए उन्हें जोड़ा, लेकिन परिणामस्वरूप कथा की गति धीमी हो जाती है।
इसी तरह हास्य कलाकार के साथ फिल्माए गए लंबे हास्य दृश्य लोकसंस्कृति की सहजता तो लाते हैं, पर कथा के गंभीर स्वर को हल्का कर देते हैं। विशेष रूप से रथ पर फिल्माया गया दृश्य, तकनीकी रूप से प्रभावशाली होते हुए भी इतना विस्तृत है कि दर्शक उस क्षण की आध्यात्मिक गहराई से कुछ दूरी महसूस करने लगता है। ये हिस्से निर्देशक के ‘सिनेमाई विस्तार’ की लालसा को उजागर करते हैं, परंतु कहानी के ‘संयमित अनुभव’ को कम कर देते हैं।
फिल्म का उत्तरार्ध अपने आप में एक महाकाव्यिक संघर्ष का चित्रण है। यहाँ युद्ध के दृश्य, संवाद और प्रकाश संयोजन मिलकर एक रहस्यमय संसार रचते हैं। परंतु यहीं फिल्म अपनी सबसे बड़ी परीक्षा में कमजोर पड़ती है। युद्ध दृश्य तकनीकी रूप से शानदार हैं, लेकिन अत्यधिक लंबे हैं। क्लाइमैक्स में जब ऋषभ शेट्टी का पात्र ‘दैवलोक’ में परिवर्तित होता है, वह क्षण आध्यात्मिक विस्मय जगाता है, पर प्रतीकात्मकता इतनी गाढ़ी हो जाती है कि भावनात्मक जुड़ाव कम हो जाता है।
फिल्म के सामाजिक पक्ष की बात करें तो राजा द्वारा आदिवासी बस्तियों पर किए गए अत्याचारों का चित्रण कहानी की आत्मा होना चाहिए था, लेकिन यह भाग अपेक्षा से छोटा और सतही रह गया है। ‘कांतारा’ का मूल स्वर — सत्ता बनाम समुदाय, दमन बनाम प्रतिरोध — यहाँ संकेतों में तो है, पर विस्तार में नहीं। दर्शक चाहता है कि वह अन्याय को गहराई से महसूस करे, लेकिन फिल्म उस पीड़ा को पूरी तरह उजागर नहीं करती।
यही वह बिंदु है जहाँ ‘कांतारा चैप्टर 1’ अपनी आध्यात्मिकता और सामाजिक यथार्थ के बीच संतुलन साधने में थोड़ी चूक करती है। यह फिल्म भव्यता में इतनी डूबी है कि कभी-कभी उस सादगी से दूर चली जाती है जो पहले भाग की ताकत थी।
फिर भी, ऋषभ शेट्टी का यह प्रयास भारतीय सिनेमा में असाधारण है। उन्होंने जिस तरह लोककथा, आस्था और प्रकृति को आधुनिक सिनेमाई भाषा में पिरोया है, वह दक्षिण भारतीय सिनेमा को एक नए बौद्धिक आयाम पर ले जाता है। ‘कांतारा चैप्टर 1’ की कमजोरी उसकी महत्वाकांक्षा ही है — और यही इसकी खूबसूरती भी। यह फिल्म हमें बताती है कि जब कला अपने विश्वासों को दृश्य रूप में उतारने लगती है, तो पूर्णता से अधिक ईमानदारी मायने रखती है।
‘कांतारा चैप्टर 1’ का अनुभव इसलिए भी याद रहेगा क्योंकि यह केवल देखने की फिल्म नहीं, महसूस करने की यात्रा है — बस कहीं-कहीं यह यात्रा इतनी लंबी हो जाती है कि दर्शक साँस लेने को ठहरना चाहता है।
निष्कर्ष :
‘कांतारा चैप्टर 1’ भारतीय सिनेमा के उस दौर की प्रतिनिधि फिल्म है जहाँ लोककथा, अध्यात्म और सामाजिक चेतना का संगम हो रहा है। यह फिल्म केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक अनुभव नहीं, बल्कि उस प्रश्न की पुनः स्थापना है कि आधुनिक विकास और पारंपरिक आस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। ऋषभ शेट्टी ने इसे तकनीकी उत्कृष्टता और सांस्कृतिक निष्ठा से सजाया है — यही कारण है कि इसके दृश्य, संगीत और पात्र दर्शक के मन में गहराई तक उतरते हैं।
फिर भी, फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती वही है जो उसकी ताकत भी है — अति-भव्यता। कथानक की आत्मा कभी-कभी दृश्य सौंदर्य के बीच दब जाती है। निर्देशक का दृष्टिकोण अत्यंत ईमानदार है, परंतु फिल्म उस ‘संयम’ से थोड़ी दूर चली जाती है जो पहले भाग की आत्मा थी। इसके बावजूद, यह कृति भारतीय सिनेमा में लोकआस्था को मुख्यधारा में लाने का एक दुर्लभ उदाहरण है।
‘कांतारा चैप्टर 1’ यह संदेश देती है कि परंपरा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना है। यदि आगामी अध्यायों में ऋषभ शेट्टी इस भव्यता और भावनात्मक गहराई के बीच संतुलन साध लेते हैं, तो ‘कांतारा’ श्रृंखला भारतीय सिनेमा के इतिहास में आस्था और यथार्थ के संगम का स्वर्ण अध्याय बन सकती है।














