
रक्षाबंधन केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते को मजबूती देने वाला एक पवित्र पर्व है। इस खास दिन पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर न सिर्फ उनकी रक्षा की कामना करती हैं, बल्कि उनके जीवन में सुख-समृद्धि की भी प्रार्थना करती हैं। अगर इस परंपरा में वास्तु शास्त्र के कुछ खास नियमों को शामिल किया जाए, तो इसका प्रभाव और भी सकारात्मक हो सकता है।
राखी बांधने का सही समय—शुभ मुहूर्त
वास्तु और ज्योतिष दोनों ही शुभ मुहूर्त को अत्यंत महत्व देते हैं। रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने से पहले पंचांग में बताए गए शुभ समय की जांच अवश्य करें। भद्रा काल के दौरान राखी बांधना वर्जित माना गया है, क्योंकि यह काल अशुभता और विघ्न का संकेत होता है। सुबह से दोपहर के बीच का समय, खासकर भद्रा समाप्ति के बाद, अत्यंत शुभ माना जाता है।
दिशा का चयन—ईशान कोण को दें प्राथमिकता
जब आप अपने भाई को राखी बांधने जा रही हों, तो दिशा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। वास्तु के अनुसार, उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण सबसे पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होता है। इस दिशा में बैठकर या भाई को इस ओर मुख करके राखी बांधने से ऊर्जा का प्रवाह बेहतर होता है। यदि घर का पूजा स्थल भी इसी दिशा में है, तो वहीं राखी बांधना और भी फलदायी माना जाता है।
सजावट का महत्व—राखी थाल कैसे तैयार करें
राखी थाल का स्वरूप भी ऊर्जा को प्रभावित करता है। एक साफ और सुंदर थाल लें, जिसमें राखी के साथ रोली, अक्षत, चंदन, दीपक, फूल और मिठाई शामिल हों। थाल के नीचे लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं क्योंकि ये रंग सौभाग्य और शुभता का प्रतीक होते हैं। जब दीपक जलाएं, तो उसे उत्तर या पूर्व दिशा में रखें, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
राखी बांधते समय गांठ का विशेष महत्व
वास्तु शास्त्र यह मानता है कि राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि भाई की सुरक्षा और बहन के प्रेम का प्रतीक है। राखी को भाई की दाहिनी कलाई पर बांधना चाहिए क्योंकि यह हाथ धर्म और कर्तव्य का प्रतीक है। राखी को बांधते समय इसमें कम से कम तीन गांठ लगानी चाहिए, जो रक्षा, विश्वास और आत्मिक जुड़ाव का प्रतिनिधित्व करती हैं। साथ ही, राखी बांधते समय इस मंत्र का उच्चारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है:
"येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् प्रतिबध्नामि, रक्षे मा चल मा चलः॥"
राखी के बाद करें आरती और मिठाई से करें शुरुआत
राखी बांधने के पश्चात भाई की आरती उतारें और उन्हें मिठाई खिलाकर इस शुभ कार्य का समापन करें। यह प्रक्रिया केवल रस्म नहीं, बल्कि स्नेह और सामंजस्य को बढ़ावा देने वाली परंपरा है। इसके बाद भाई द्वारा दिया गया उपहार बहन के प्रति उसके स्नेह और सम्मान का प्रतीक होता है।
वास्तु नियमों से बढ़ेगा रक्षाबंधन का पुण्यफल
जब रक्षाबंधन जैसे भावनात्मक त्योहार को वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के साथ जोड़ा जाता है, तो वह केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं रहता, बल्कि एक ऊर्जा से भरपूर प्रक्रिया बन जाता है। शुभ दिशा, शुभ मुहूर्त, पवित्र थाल सजावट और मजबूत गांठ के साथ मंत्रों का जाप न केवल भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करता है, बल्कि घर के माहौल में भी शांति, समृद्धि और सकारात्मकता लाता है।














