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संजय राउत ने कहा - पिता से नहीं थे सुशांत सिंह के अच्छे संबंध, बिहार पुलिस द्वारा मुंबई आकर जांच करने को लेकर भी कही ये बात

सुशांत का परिवार मतलब पिता पटना में रहते हैं। उनके पिता से उसके संबंध अच्छे नहीं थे।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Sun, 09 Aug 2020 3:18:07

संजय राउत ने कहा - पिता से नहीं थे सुशांत सिंह के अच्छे संबंध, बिहार पुलिस द्वारा मुंबई आकर जांच करने को लेकर भी कही ये बात

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की आत्महत्या के केस को लेकर रविवार को शिवसेना (Shiv Sena) नेता संजय राउत (Sanjay Raut) ने पार्टी मुखपत्र सामना में अपने बात रखी। उन्होंने कहा सुशांत केस में बिहार पुलिस मुंबई में जांच के लिए आई थी। इसका कारण था सुशांत के पिता के के सिंह का बिहार पुलिस में रिया चक्रवर्ती के खिलाफ FIR दर्ज करवाना। हालांकि महाराष्ट्र सरकार बिहार के मुंबई आकर जांच करने से नाराज हुई और इसपर भी संजय राउत ने अपनी बात को रखा है। वे अपने लेख में कहते हैं, सुशांत सिंह राजपूत मामले में बिहार सरकार को हस्तक्षेप करने की वैसे कोई जरूरत नहीं थी। कुछ वर्षों में सुशांत पूरी तरह मुंबईकर बन गया था। उसका बिहार से संबंध भी नहीं था। उसे पूरा वैभव मुंबई ने ही दिया था। संघर्ष के दौर में बिहार उसके पीछे नहीं था। सुशांत का परिवार मतलब पिता पटना में रहते हैं। उनके पिता से उसके संबंध अच्छे नहीं थे। पिता द्वारा किया गया दूसरा विवाह सुशांत को स्वीकार नहीं था। इसलिए पिता से उसका भावनात्मक संबंध शेष नहीं बचा था। उसी पिता को बरगलाकर बिहार में एक एफआईआर दर्ज कराई गई व मुंबई में घटे गुनाह की जांच करने के लिए बिहार की पुलिस मुंबई आई। इसका समर्थन किया ही नहीं जा सकता है।

बिहार पुलिस मतलब इंटरपोल नहीं है। एक अपराध की जांच मुंबई पुलिस कर रही है। उसी समय दूसरे राज्य का कोई संबंध न होने के बावजूद वे समानांतर जांच शुरू करें। यह मुंबई पुलिस की कार्यक्षमता पर अविश्वास है। बिहार पुलिस के पास इस बारे में कोई दूसरे कोण होंगे तो उन्हें मुंबई पुलिस से इस पर चर्चा करने में कोई हर्ज नहीं है। सत्य जानना सभी का अधिकार है लेकिन यह जो सत्य सिर्फ बिहार की पुलिस अथवा सीबीआई ढूंढ सकेगी, ये सोच गलत है।

बिहार पुलिस के दो दस्ते मुंबई में सुशांत सिंह की मौत की जांच करने के लिए आए। उनमें से एक दस्ते को मुंबई महानगरपालिका ने कोरोना कानून के तहत क्वारनटीन किया। बिहार पुलिस को क्वारनटीन मनपा ने किया। इस पर राजनीति क्यों होनी चाहिए?

बिहार पुलिस के बारे में बात करते हुए संजय राउत ने डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे पर भी निशाना साधा। उन्होंने लिखा- बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे समाचार चैनलों पर खाकी वर्दी में जाकर मुंबई पुलिस की कार्य पद्धति पर ताव-ताव में बोलते हैं। समाचार चैनल पर चर्चा में शामिल होते हैं। यह सीधे-सीधे पुलिसिया अनुशासन का उल्लंघन है। उस पर इस गुप्तेश्वर पांडे से अनुशासन के पालन की उम्मीद ही क्यों की जाए?

ये गुप्तेश्वर पांडे कौन हैं?

वर्ष 2009 में वे डीआईजी रहते हुए पुलिस सेवा से वीआरएस लेकर सीधे राजनीति में कूद गए। विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर ‘बक्सर’ निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए खड़े हो गए लेकिन भाजपा के सांसद लालमुनि चौबे द्वारा बगावत करने की धमकी दिए जाने के साथ ही चौबे की उम्मीदवारी फिर बरकरार कर दी गई। इससे गुप्तेश्वर पांडे बीच में ही लटक गए। उनकी अवस्था ‘न घर के न घाट के’ जैसी हो गई। इस तरह से राजनीति में घुसने का उनका मिशन फेल हो गया। उसके बाद उन्होंने सेवा में लौटने के लिए फिर आवेदन-निवेदन किए।

ऐसा कहा जाता है कि गुप्तेश्वर पांडे की पत्नी ने भी अपने पति की ओर से सरकार से निवेदन किया था और कहा था कि नौकरी छोड़ते समय उनके पति गुप्तेश्वर पांडे की मानसिक स्थिति अच्छी नहीं थी। मानसिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसी आधार पर उन्हें एक बार फिर सेवा में लिया गया होगा तो यह बिहार सरकार का मसला है।

पांडे उस समय भाजपा के खेमे में थे और आज नीतीश कुमार के खास हैं। भाजपा से उम्मीदवारी स्वीकार करनेवाले पांडे द्वारा मुंबई पुलिस की कार्य क्षमता पर सवाल खड़े करना हास्यास्पद है। उस पर अब ऐसी खबरें बिहार के अखबारों में छपी हैं कि यही पांडे बिहार में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में हाथ आजमाने की तैयारी कर रहे हैं। वहां के अखबारों में छपी खबरों के अनुसार पांडे शाहपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। इस क्षेत्र में जाति समीकरण का पांडे को लाभ मिल सकता है, ऐसा गणित लगाया जा रहा है। यद्यपि उनके सेवाकाल में 6 महीने शेष हैं लेकिन वह इस्तीफा दे सकते हैं और जेडीयू के टिकट पर बक्सर सदर अथवा शाहपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसा भी खबरों में कहा गया है। ऐसी पुलिस से समाज को क्या अपेक्षा रखनी चाहिए?

दिशा सालियन की बदनामी पर संजय राउत

सुशांत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियन की मौत एक्टर से एक हफ्ता पहले हुई थी। दिशा की मौत को सुशांत के केस से जोड़कर देखने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में बहुत सी बातें दिशा सालियन के बारे में कही जा रही हैं। इसपर गौर करते हुए संजय राउत ने लिखा- सुशांत सिंह राजपूत की मौत से पहले मैनेजर दिशा सालियन ने आत्महत्या की थी। दोनों मामले पूरी तरह से अलग हैं लेकिन राजनीतिक नेता दो खुदकुशी के धागों को जोड़ रहे हैं। दिशा सालियन के साथ बलात्कार करके उसे इमारत से नीचे फेंका गया था, ऐसा आरोप भाजपा के एक नेता लगा रहे हैं। उन्होंने ऐसा करते समय उसके परिवार का थोड़ा भी विचार किया होगा, ऐसा लगता नहीं है।

दिशा सालियन के पिता ने एक पत्र लिखकर इस पर दुख व्यक्त किया है। मृत्यु के बाद मेरी बेटी और हमारे परिवार को बदनाम क्यों कर रहे हो? यह उसके माता-पिता का सीधा सवाल है। दिशा सालियन का पूरा परिवार ही इस बदनामी के कारण मानसिक रूप से प्रताड़ित हुआ है। उसके पिता डिप्रेशन में चले गए हैं, ऐसा अब सामने आया है।

राजनीति व डिजिटल पत्रकारिता इतनी असंवेदनशील और अमानवीय होगी इस पर हैरानी होती है। दिशा सालियन, रिया चक्रवर्ती, अंकिता लोखंडे ऐसी तीन महिलाओं के नाम इस प्रकरण से जुड़े हैं और हर पात्र का कथानक अलग है। सुशांत सिंह राजपूत व दिशा सालियन से दुष्कर आपराधिक मामलों की जांच मुंबई पुलिस इससे पहले कई बार कर चुकी है लेकिन सुशांत प्रकरण में निश्चित तौर में क्या गलतियां हुईं यह देखें-

इस संबंध में जीरो एफआईआर दर्ज करके पुलिस को जांच जारी रखनी चाहिए थी। (लेकिन सुशांत के रिश्तेदारों को तब किसी के भी खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करानी थी और वह परिवार सुशांत की आत्महत्या के बाद सीधे पटना पहुंच गया।)

भारतीय जनता पार्टी ने इस प्रकरण को राजनीतिक निवेश के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्णय लिया व मंत्रिमंडल के युवा मंत्रियों का नाम इस प्रकरण से जोड़कर सनसनी निर्माण की। दूसरी तरफ दो अंग्रेजी समाचार चैनल मुख्यमंत्री ठाकरे को सुशांत प्रकरण में ऐसे चुनौती देते रहे मानों सुपारी ली हो। इसलिए पुलिस हड़बड़ा गई।

यह प्रकरण ‘हाईप्रोफाइल’ हो रहा है ऐसा प्रतीत होते ही मुंबई पुलिस की ओर से एक दिन बाद जांच से संबंधित जानकारी पत्रकारों से साझा करने में कोई हर्ज नहीं था। इसमें कोई मंत्री अथवा राजनैतिक व्यक्ति होगा तो पुलिस उसका भी स्टेटमेंट लेगी, ऐसा प्रारंभ में ही कहने में कोई हर्ज नहीं था।

मुंबई पुलिस की जांच को लेकर संजय राउत का कहना है- मुंबई पुलिस ने इस मामले की जांच को अनावश्यक रूप से अधिक लंबा खींच लिया। सिनेमा जगत के सेलिब्रिटीज को रोज पूछताछ के लिए बुलाते थे वह ‘गॉसिप’ को बढ़ावा देते थे। इस प्रकरण का इस्तेमाल सिनेमा जगत में दहशत निर्माण करने के लिए किया गया है क्या, यह देखना चाहिए।

सुशांत की मृत्यु से पहले अभिनेता डिनो मोरिया के घर पार्टी हुई। इस पार्टी को लेकर रहस्य निर्माण करके उसका संबंध सुशांत की मौत से जोड़ा गया। डिनो मोरिया व अन्य फिल्म कलाकार राज्यमंत्री आदित्य ठाकरे के मित्र परिवार से हैं इसलिए आरोपों की झड़ी मुख्यमंत्री ठाकरे व आदित्य ठाकरे पर बरसाई जा रही होगी तो ये गलत साबित होगा। सबूतों के बगैर बोलना, आरोप लगाना नैतिकता के अनुरूप नहीं है। सबूत है क्या? यह पहला सवाल। खुद आदित्य ठाकरे ने इस संबंध में खुलासा किया है। फिर भी शंका होगी तो कुछ समाचार चैनलों के माध्यम से बदनामी मुहिम चलाना यह मार्ग है क्या?

इस प्रकरण में बॉलीवुड के जिन कलाकारों का नाम आ रहा है उनमें से ज्यादातर ‘डी’ ग्रेड के लोग हैं। कई वर्षों से ये पर्दे पर नहीं दिखते हैं और अन्य व्यवसाय करके वे जी रहे हैं। इनमें से कुछ लोग आदित्य ठाकरे के संपर्क में आए थे इस वजह से यदि कोई जमीन पर डंडा पीटता होगा तो वह गलत है।

इस प्रकरण में सरकार विरोधी पार्टी द्वारा महाराष्ट्र से ज्यादा बिहार पुलिस का पक्ष लेना यह तरीका झकझोरने वाला है। बिहार की तरह कुछ गुप्तेश्वर पांडे महाराष्ट्र पुलिस में भी हैं और उनके कारण समस्या बढ़ी है, ऐसा मेरा अनुमान है।

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