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‘डील को लेकर डेस्परेट थे ट्रंप, मैं नहीं चाहता था…’ ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई का शांति समझौते पर चौंकाने वाला बयान

अमेरिका-ईरान समझौते पर ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई का बड़ा बयान सामने आया है। जानें कैसे उन्होंने अमेरिका की “मजबूरी” और दबाव की बात कही, MoU हस्ताक्षर, G7 बैठक के बाद बनी सहमति और 60 दिन की अंतिम डील की समयसीमा से जुड़ी पूरी जानकारी।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 19 Jun 2026 8:20:09

‘डील को लेकर डेस्परेट थे ट्रंप, मैं नहीं चाहता था…’ ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई का शांति समझौते पर चौंकाने वाला बयान

अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए अहम समझौते को लेकर ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई ने बड़ा और तीखा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि इस समझौते की पहल ईरान की ओर से नहीं, बल्कि अमेरिका की ओर से आई थी और इसके पीछे अमेरिकी पक्ष की बेचैनी और दबाव साफ तौर पर नजर आता है। खामेनेई के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस डील को संभव बनाने के लिए हर संभव राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव का इस्तेमाल किया।

अमेरिका-ईरान के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर

मुज्तबा खामेनेई ने सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में यह भी स्पष्ट किया कि ईरान और अमेरिका के राष्ट्रपतियों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि ईरानी नेतृत्व और अधिकारियों ने इस प्रक्रिया में पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ भाग लिया, लेकिन समझौते को अंतिम रूप देने में सबसे अधिक सक्रियता और प्रयास अमेरिकी पक्ष की तरफ से दिखाई दिए।

उन्होंने अपने बयान में लिखा, “अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी निराशा और मजबूरी के कारण इस समझौते को आगे बढ़ाने के लिए हर तरह के साधनों का उपयोग करने को तैयार थे।”

समझौते पर मेरी राय अलग थी: खामेनेई

ईरान के सर्वोच्च नेता ने यह भी स्वीकार किया कि इस पूरे समझौते को लेकर उनकी व्यक्तिगत सोच और दृष्टिकोण अलग था। उन्होंने कहा, “सैद्धांतिक रूप से मेरी राय इस समझौते के पक्ष में नहीं थी, लेकिन मैंने इस शर्त पर अनुमति दी कि ईरान के राष्ट्रपति देश के हितों और प्रतिरोध मोर्चे के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा करेंगे।” साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि भविष्य में अमेरिका अपनी तय सीमाओं से आगे बढ़कर अतिरिक्त मांगें रखता है, तो ईरान किसी भी हालत में दबाव में नहीं आएगा।

‘अतिरिक्त शर्तें स्वीकार नहीं की जाएंगी’

अपने संदेश में खामेनेई ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि अमेरिकी पक्ष इस समझौते की तय रूपरेखा से बाहर जाकर नई या अतिरिक्त शर्तें थोपने की कोशिश करता है, तो ईरान उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने ईरान की जनता से अपील की कि वे धैर्य बनाए रखें और तय समझौते के क्रियान्वयन की प्रक्रिया का इंतजार करें।

जी-7 शिखर सम्मेलन के बाद बनी सहमति

यह समझौता ज्ञापन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा आयोजित एक विशेष डिनर के दौरान हस्ताक्षरित किया गया बताया जा रहा है। यह कार्यक्रम जी-7 शिखर सम्मेलन के समापन के बाद वर्साय पैलेस में आयोजित हुआ था। राष्ट्रपति मैक्रों ने इस समझौते की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा करते हुए कहा कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है और इससे होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने में भी मदद मिलेगी।

जिनेवा बैठक को लेकर स्थिति स्पष्ट

पहले इस समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में होने वाले थे, लेकिन उससे पहले ही समझौता ज्ञापन पर सहमति बन गई। इसके बावजूद तेहरान की ओर से यह पुष्टि की गई है कि जिनेवा में प्रस्तावित बैठक पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही आयोजित की जाएगी और उसमें आगे की रूपरेखा पर चर्चा होगी।

समझौते में शामिल प्रमुख प्रावधान

इस समझौते में कई महत्वपूर्ण और व्यापक प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनके अनुसार लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने की बात कही गई है। इसके अलावा अमेरिका ने 30 दिनों के भीतर ईरान पर लगाए गए अपने नौसैनिक प्रतिबंध (Naval Blockade) को हटाने पर सहमति जताई है।

इसी अवधि में समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही को युद्ध-पूर्व स्थिति में वापस लाने की योजना भी शामिल है। समझौते के अनुसार अंतिम और व्यापक समझौता होने के 30 दिनों के भीतर अमेरिका को ईरान के आसपास से अपनी सैन्य मौजूदगी भी चरणबद्ध तरीके से हटानी होगी। वहीं ईरान ने भी अगले 60 दिनों तक व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षित और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कदम उठाने का वादा किया है।

अंतिम समझौते के लिए 60 दिन की समयसीमा

समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद अब दोनों देशों के पास 60 दिनों की समयसीमा तय की गई है, जिसके भीतर उन्हें एक व्यापक और अंतिम समझौते पर पहुंचना होगा। इस अवधि में दोनों पक्षों के बीच लगातार वार्ता और बातचीत जारी रहेगी। यदि यह बातचीत सफल रहती है, तो इसे पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कदम माना जाएगा।

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