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H-1B वीजा पर ट्रंप को झटका, भारतीय प्रोफेशनल्स को राहत, अमेरिकी कोर्ट ने लिया बड़ा फैसला

अमेरिकी अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीजा पर लगाई गई 1 लाख डॉलर फीस को रद्द कर दिया है, जिससे भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और उच्च कौशल वाले वर्कर्स को बड़ी राहत मिली है। यह फैसला अमेरिकी संविधान के शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत के उल्लंघन के आधार पर दिया गया, जिसे ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Tue, 09 Jun 2026 7:24:17

H-1B वीजा पर ट्रंप को झटका, भारतीय प्रोफेशनल्स को राहत, अमेरिकी कोर्ट ने लिया बड़ा फैसला

अमेरिका में नौकरी और करियर बनाने का सपना देखने वाले भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और अन्य उच्च कौशल वाले वर्कर्स के लिए एक महत्वपूर्ण और राहत देने वाली खबर सामने आई है। ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीजा पर लगाई गई 1 लाख डॉलर यानी लगभग 96 लाख रुपये की भारी-भरकम फीस को एक अमेरिकी संघीय अदालत ने रद्द कर दिया है। इस फैसले को डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन के लिए एक बड़ा कानूनी झटका माना जा रहा है, क्योंकि यह नीति उनके इमिग्रेशन रिफॉर्म एजेंडे का अहम हिस्सा थी।

यह निर्णय सोमवार, 8 जून को अमेरिका के एक फेडरल जज द्वारा सुनाया गया। डिस्ट्रिक्ट जज रिचर्ड स्टर्न्स ने स्पष्ट रूप से कहा कि सितंबर 2025 में जारी राष्ट्रपति आदेश के आधार पर लागू की गई यह फीस व्यवस्था और उसे तेजी से लागू करने में अमेरिकी विदेश विभाग तथा गृह सुरक्षा विभाग की भूमिका अमेरिकी संविधान में वर्णित शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) के सिद्धांत का उल्लंघन करती है। अदालत के अनुसार, इस तरह की वित्तीय बाध्यता लगाने का अधिकार केवल विधायी प्रक्रिया और कांग्रेस के माध्यम से ही संभव है।

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि भी काफी दिलचस्प और कानूनी रूप से जटिल रही है। करीब छह महीने पहले वॉशिंगटन डी.सी. की एक संघीय अदालत ने इसी तरह के एक मामले में ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला सुनाया था। यह मामला अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा दायर किया गया था। उस समय अदालत ने यह माना था कि संसद ने राष्ट्रपति को इस प्रकार की फीस लगाने का अधिकार प्रदान किया है। लेकिन वह निर्णय बाद में बदलते कानूनी परिदृश्य और सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण टैरिफ संबंधी फैसले के बाद पुनः समीक्षा के दायरे में आ गया, जिसका असर वर्तमान फैसले पर भी स्पष्ट रूप से देखने को मिला।

H-1B वीजा कार्यक्रम क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है

H-1B वीजा कार्यक्रम अमेरिका की तकनीकी और पेशेवर कार्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इस योजना के तहत अमेरिकी कंपनियों को यह अनुमति दी जाती है कि वे उच्च कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को अस्थायी रूप से नौकरी पर रख सकें। यह विशेष रूप से उन पदों के लिए होता है जिनमें कम से कम बैचलर डिग्री या उससे अधिक योग्यता आवश्यक होती है। इसमें आईटी, इंजीनियरिंग, रिसर्च, हेल्थकेयर और फाइनेंस जैसे क्षेत्र प्रमुख रूप से शामिल हैं।

इस वीजा के लिए आवेदन करते समय नियोक्ता कंपनी को अमेरिकी श्रम विभाग के समक्ष यह प्रमाण देना होता है कि विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से अमेरिकी नागरिकों के वेतन या कार्य परिस्थितियों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि विदेशी और घरेलू श्रमिकों के बीच संतुलन बना रहे और किसी भी प्रकार का शोषण न हो।

अमेरिकी कांग्रेस हर वर्ष H-1B वीजा की कुल सीमा निर्धारित करती है। वर्तमान प्रणाली के अनुसार 65,000 सामान्य वीजा की सीमा तय है, जबकि अतिरिक्त 20,000 वीजा उन आवेदकों के लिए उपलब्ध हैं जिनके पास मास्टर डिग्री या उससे उच्च शैक्षणिक योग्यता होती है। यह कार्यक्रम समय-समय पर संशोधित किया जाता रहा है ताकि उद्योगों की जरूरतें भी पूरी हों और स्थानीय श्रमिकों के हितों की भी रक्षा की जा सके।

समय-समय पर संसद ने इस व्यवस्था में कई प्रकार के संशोधन किए हैं, जिनमें सख्त नियम, जुर्माने और शुल्क संरचना में बदलाव शामिल हैं। इन सभी सुधारों का उद्देश्य इस वीजा प्रणाली के दुरुपयोग को रोकना रहा है। साथ ही कुछ सरकारी एजेंसियों और गैर-लाभकारी संस्थाओं को इस सीमा और कुछ शुल्क नियमों से छूट भी प्रदान की गई है, ताकि आवश्यक क्षेत्रों में कामकाज बाधित न हो।

ट्रंप प्रशासन ने क्यों लागू की थी 1 लाख डॉलर फीस

ट्रंप प्रशासन और उनके समर्थकों का तर्क रहा है कि H-1B वीजा प्रणाली का कई जगहों पर गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका कहना है कि कुछ कंपनियां अमेरिकी नागरिकों को नौकरी से हटाकर कम लागत पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं, जिससे घरेलू रोजगार बाजार प्रभावित होता है।

इसी आधार पर ट्रंप ने अपने प्रशासनिक आदेश में यह दावा किया था कि H-1B कार्यक्रम का दुरुपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है। उनका तर्क था कि यदि अमेरिकी युवाओं को विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों से दूर किया जाएगा तो भविष्य में अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व क्षमता कमजोर हो सकती है।

सितंबर में जारी किए गए उस आदेश में यह प्रस्ताव रखा गया था कि नए H-1B वीजा आवेदन पर 1 लाख डॉलर की भारी फीस लागू की जाएगी। इस कदम का उद्देश्य कथित तौर पर आवेदन संख्या को नियंत्रित करना और केवल अत्यधिक आवश्यक मामलों में ही विदेशी भर्ती को अनुमति देना था।

हालांकि इस फैसले का व्यापक विरोध भी हुआ, क्योंकि विशेषज्ञों का मानना था कि इससे अमेरिका के स्वास्थ्य, शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में पहले से मौजूद प्रतिभा की कमी और अधिक गंभीर हो सकती थी। कई उद्योगों में पहले से ही कुशल कर्मचारियों की कमी बनी हुई है, और इस तरह की भारी फीस से स्थिति और खराब होने की आशंका जताई जा रही थी।

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