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अमेरिका-ईरान टकराव में पाकिस्तान की एंट्री क्यों? 3 बड़ी वजहें

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान ने मध्यस्थता की पेशकश क्यों की? जानें 3 बड़ी वजहें, संभावित फायदे और इस कूटनीतिक कदम के पीछे की पूरी रणनीति।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Wed, 25 Mar 2026 2:08:11

अमेरिका-ईरान टकराव में पाकिस्तान की एंट्री क्यों? 3 बड़ी वजहें

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने की कोशिशों के बीच पाकिस्तान ने अचानक सक्रिय भूमिका निभाते हुए खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश किया है। लगभग 26 दिनों से जारी इस संघर्ष को रोकने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनका देश “सार्थक और निर्णायक बातचीत” की मेजबानी करने के लिए तैयार है। इस पहल को और बल तब मिला जब Donald Trump ने भी इस प्रस्ताव को अप्रत्यक्ष समर्थन देते हुए संकेत दिए। ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि आखिर पाकिस्तान इस कूटनीतिक पहल में क्यों कूद पड़ा और इससे उसे क्या फायदे नजर आ रहे हैं।

आखिर पाकिस्तान ही क्यों आगे आया?

दरअसल, पाकिस्तान की स्थिति इस पूरे घटनाक्रम में कुछ अलग और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। एक तरफ उसके संबंध अमेरिका के साथ धीरे-धीरे मजबूत हो रहे हैं, तो दूसरी ओर पड़ोसी देश Iran के साथ भी उसके पुराने और स्थिर रिश्ते हैं। यही संतुलन उसे एक संभावित तटस्थ मध्यस्थ के रूप में स्थापित करता है। खाड़ी देशों जैसे Qatar की तुलना में पाकिस्तान की स्थिति इसलिए भी अलग है क्योंकि वहां अमेरिकी सैन्य अड्डे नहीं हैं। साथ ही, पाकिस्तान खुद एक सैन्य क्षमता वाला देश है, जिससे ईरान को भी उस पर भरोसा करने की गुंजाइश मिलती है।

पाकिस्तान को क्या हासिल हो सकता है?

अगर यह पहल सफल होती है, तो पाकिस्तान को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है। सबसे पहले, उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि में बड़ा सुधार हो सकता है। लंबे समय से आतंकवाद से जुड़े आरोपों के कारण उसकी छवि प्रभावित रही है, लेकिन इस तरह की पहल उसे एक “शांतिदूत” के रूप में स्थापित कर सकती है। इतिहास में भी पाकिस्तान ने 1970 के दशक में अमेरिका और चीन के बीच संवाद स्थापित कराने में अहम भूमिका निभाई थी, जिससे उसकी कूटनीतिक पहचान मजबूत हुई थी।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आंतरिक और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। पाकिस्तान में दुनिया की बड़ी शिया आबादी रहती है, और ईरान से जुड़े घटनाक्रम का असर वहां सीधा देखने को मिलता है। हाल के घटनाक्रमों के बाद देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे। विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका प्रभाव पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता पर पड़ सकता है। इसलिए इस्लामाबाद के लिए इस तनाव को जल्द खत्म करना एक प्राथमिकता बन गया है।

तीसरा कारण आर्थिक और ऊर्जा संकट से जुड़ा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के चलते तेल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिसका असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है। पहले से आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे देश के लिए यह स्थिति और मुश्किलें बढ़ा सकती है। ऐसे में अगर संघर्ष थमता है, तो तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है, जिससे पाकिस्तान को आर्थिक फायदा होगा। इस नजरिए से देखें तो यह कदम उसके लिए “एक तीर से दो निशाने” जैसा है।

विशेषज्ञों की नजर में पाकिस्तान की भूमिका

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पाकिस्तान की स्थिति इस मामले में अनोखी है। Adam Weinstein के अनुसार, पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में है जो वॉशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ काम करने की क्षमता रखते हैं। यही संतुलन उसे एक विश्वसनीय मध्यस्थ बनाता है। वहीं Kamran Bokhari का कहना है कि लंबे समय तक संकटों से जूझने के बाद पाकिस्तान अब पश्चिम एशिया में फिर से एक अहम अमेरिकी सहयोगी के रूप में उभरता दिख रहा है।

उनके अनुसार, पाकिस्तान के Saudi Arabia के साथ मजबूत संबंध हैं, जबकि वह ईरान के लिए भी अपेक्षाकृत कम विरोधी पड़ोसी है। यही वजह है कि ईरान उसे अन्य देशों की तुलना में ज्यादा संतुलित और भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में देख सकता है।

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