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'मां-पापा माफ कर देना, अब दोबारा NEET देने की ताकत नहीं बची...' 18 वर्षीय आकांक्षा की मौत ने झकझोर दिया परिवार को

मध्य प्रदेश की 18 वर्षीय आकांक्षा चतुर्वेदी की दर्दनाक मौत ने NEET परीक्षा, छात्रों के मानसिक दबाव और प्रतियोगी परीक्षाओं की चुनौतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानिए पूरा मामला।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Thu, 04 Jun 2026 10:34:12

'मां-पापा माफ कर देना, अब दोबारा NEET देने की ताकत नहीं बची...' 18 वर्षीय आकांक्षा की मौत ने झकझोर दिया परिवार को

मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली 18 वर्षीय आकांक्षा चतुर्वेदी ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। परिवार का दावा है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET से जुड़ी अनियमितताओं और पेपर लीक की खबरों ने उसे गहरे मानसिक तनाव में डाल दिया था।

आकांक्षा की मौत के बाद मिले एक भावुक पत्र ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया। पत्र में उसने अपने माता-पिता से क्षमा मांगते हुए लिखा था कि उसमें अब दोबारा परीक्षा देने का साहस नहीं बचा है। इस घटना ने न केवल उसके परिजनों बल्कि पूरे क्षेत्र को शोक और स्तब्धता में डाल दिया है।

नागपुर में रहकर कर रही थी मेडिकल की तैयारी

जानकारी के अनुसार आकांक्षा पिछले कुछ समय से नागपुर में रहकर मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थी। परिवार को उससे बड़ी उम्मीदें थीं और वह स्वयं भी डॉक्टर बनने के लक्ष्य को लेकर बेहद गंभीर थी। परीक्षा देने के बाद वह अपने प्रदर्शन को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रही थी और उसे अच्छे परिणाम की उम्मीद थी।

बताया जाता है कि 20 मई को वह अपने कमरे में मृत अवस्था में मिली। शुरुआती जांच के दौरान घटना को लेकर कई सवाल उठे, लेकिन बाद में परिवार को उसके द्वारा लिखा गया एक पत्र मिला, जिसने उसकी मानसिक स्थिति के बारे में कुछ संकेत दिए।

सुसाइड नोट में छलका दर्द

परिजनों के अनुसार आकांक्षा ने अपने अंतिम पत्र में बेहद भावुक बातें लिखी थीं। उसने लिखा कि उसके माता-पिता ने हमेशा उस पर भरोसा किया और उम्मीद की कि वह पढ़-लिखकर डॉक्टर बनेगी, लेकिन अब वह उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाएगी।

पत्र में उसने यह भी जिक्र किया कि पहले प्रयास में उसे अच्छे अंक मिलने की उम्मीद थी, लेकिन परिस्थितियों ने उसका आत्मविश्वास तोड़ दिया। उसने खुद को असफल मानते हुए माता-पिता से माफी मांगी और लिखा कि उसमें दोबारा परीक्षा की तैयारी शुरू करने की हिम्मत नहीं रह गई है।

किसान पिता ने बेटी के सपनों के लिए किया संघर्ष

आकांक्षा मऊगंज जिले के मगनिया गांव की निवासी थी। उसके पिता कृष्ण कुमार चौबे खेती-किसानी से परिवार का पालन-पोषण करते हैं। परिवार के लोगों का कहना है कि बेटी को डॉक्टर बनाने का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी आर्थिक सीमाओं से कहीं अधिक प्रयास किए।

खेती से होने वाली सीमित आय के बावजूद उन्होंने अतिरिक्त काम करके बेटी की पढ़ाई जारी रखी। बताया जाता है कि वह समय-समय पर दूसरे शहरों में जाकर खाना बनाने का काम भी करते थे ताकि कोचिंग, हॉस्टल और अन्य शैक्षणिक खर्चों का प्रबंध किया जा सके।

पढ़ाई के लिए लिया था लाखों रुपये का कर्ज

परिवार के मुताबिक आकांक्षा की शिक्षा पर बड़ा खर्च हो रहा था। उसकी तैयारी और रहने की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से लगभग तीन लाख रुपये का ऋण लिया गया था। इसके अलावा रिश्तेदारों और परिचितों से भी आर्थिक सहायता ली गई थी।

परिवार को विश्वास था कि आकांक्षा की मेहनत रंग लाएगी और वह मेडिकल कॉलेज में प्रवेश हासिल कर लेगी। उसके चाचा जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी ने बताया कि परीक्षा के बाद आकांक्षा काफी उत्साहित थी। उसने परिवार से कहा था कि उसके 650 से अधिक अंक आने की संभावना है, जिससे चयन की उम्मीद मजबूत हो गई थी।

पेपर लीक की खबरों के बाद बदला व्यवहार

परिजनों का आरोप है कि परीक्षा समाप्त होने के कुछ समय बाद जब पेपर लीक और कथित अनियमितताओं की खबरें सामने आने लगीं, तब से आकांक्षा का व्यवहार बदलने लगा था। वह पहले की तुलना में अधिक चुप रहने लगी थी और मानसिक रूप से परेशान दिखाई देती थी।

परिवार का कहना है कि उसने धीरे-धीरे खाना कम कर दिया था और सामाजिक बातचीत से भी दूरी बनाने लगी थी। घरवालों ने उसकी चिंता जरूर महसूस की, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि वह भीतर ही भीतर इतनी गहरी निराशा से जूझ रही है।

मानसिक स्वास्थ्य पर फिर उठे सवाल

आकांक्षा की मौत ने एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव, छात्रों की अपेक्षाओं और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को केंद्र में ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा परिणाम और करियर से जुड़ी चिंताओं के बीच छात्रों को भावनात्मक सहयोग और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।

यह घटना उन हजारों युवाओं की चुनौतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर-परिवार से दूर रहकर कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करते हैं। आकांक्षा की असमय मौत ने एक ऐसे परिवार के सपनों को अधूरा छोड़ दिया है, जिसने अपनी बेटी के भविष्य के लिए हर संभव संघर्ष किया था।

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