अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर जारी अटकलों के बीच एक बड़ा दावा सामने आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों देशों के बीच एक व्यापक समझौते की रूपरेखा तैयार की गई है, जिसमें युद्धविराम से लेकर आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। हालांकि इस समझौते की कई शर्तों को लेकर अभी आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है, लेकिन सामने आई जानकारी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल जरूर बढ़ा दी है।
बताया जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 15 जून को इस शांति पहल की घोषणा की। प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर के लिए अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, जबकि ईरान की तरफ से विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ के शामिल होने की चर्चा है। इस संभावित समझौते को क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
तीन चरणों में लागू हो सकती है डील
सामने आई जानकारी के अनुसार यह समझौता तीन अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ सकता है।
पहला चरण – प्रारंभिक घोषणा (14 जून)
इस चरण में सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को तत्काल रोकने की बात कही गई है। साथ ही ईरान पर लागू समुद्री नाकाबंदी हटाने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का प्रस्ताव शामिल बताया गया है।
दूसरा चरण – हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर
इस अवधि में होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से खोलने और ईरान की फ्रीज की गई 24 अरब डॉलर की संपत्तियों में से लगभग 12 अरब डॉलर जारी करने का प्रावधान बताया गया है।
तीसरा चरण – 60 दिनों के भीतर
इस दौरान दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम और उससे जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हो सकती है। साथ ही शेष 12 अरब डॉलर की राशि भी ईरान को उपलब्ध कराए जाने का प्रस्ताव सामने आया है।
14 बिंदुओं वाला प्रस्तावित समझौता
ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित समझौते में कुल 14 प्रमुख बिंदु शामिल हैं।
लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों का स्थायी अंत।
60 दिनों की वार्ता अवधि के दौरान ईरान की 24 अरब डॉलर की फ्रीज संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से जारी करना।
ईरान की संप्रभुता और आंतरिक मामलों का सम्मान किया जाना।
अमेरिका द्वारा 30 दिनों के भीतर ईरान के आसपास से सैन्य उपस्थिति कम करना।
होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरानी व्यवस्था के तहत फिर से खोलना और नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त करना।
ईरान का परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता बनाए रखना।
ईरान के पुनर्निर्माण के लिए लगभग 300 अरब डॉलर की आर्थिक योजनाओं का प्रस्ताव।
तेल, पेट्रोकेमिकल और संबंधित निर्यातों पर लगे प्रतिबंधों में राहत।
बातचीत को यूरेनियम संवर्धन, प्रतिबंधों में ढील और आर्थिक पुनर्निर्माण तक सीमित रखना।
ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों के मुद्दे को वार्ता से बाहर रखना।
बातचीत के दौरान अमेरिका द्वारा अतिरिक्त सैन्य तैनाती या नए प्रतिबंध नहीं लगाए जाना।
समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक विशेष मॉनिटरिंग तंत्र बनाना।
अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी दिलाने का प्रयास।
ईरान को अपने वित्तीय संसाधनों के उपयोग की अधिक स्वतंत्रता प्रदान करना।
आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी
हालांकि इन शर्तों को लेकर अभी तक न तो अमेरिकी प्रशासन और न ही ईरान सरकार ने औपचारिक रूप से पूरी पुष्टि की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे औपचारिक वार्ता आगे बढ़ेगी, समझौते के कई बिंदुओं में बदलाव भी संभव है। इसलिए अंतिम दस्तावेज सामने आने तक इन शर्तों को प्रस्तावित मसौदे के रूप में ही देखा जा रहा है।
ट्रंप ने बताया शांति की दिशा में बड़ा कदम
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस पहल को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अहम बताया। उन्होंने कहा कि यह समझौता पश्चिम एशिया में शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देगा। साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति भी सामान्य होने की उम्मीद है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों को राहत मिल सकती है।
ट्रंप के अनुसार, समझौते के बाद तेल और ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख समुद्री मार्गों पर गतिविधियां फिर से सुचारु हो जाएंगी, जिसका लाभ केवल क्षेत्रीय देशों को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को मिलेगा।
ईरान ने क्या कहा?
ईरान की ओर से जारी बयान में इस समझौते को एक समझौता ज्ञापन (MoU) के रूप में वर्णित किया गया है। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने कहा कि लंबे समय तक चली जटिल वार्ताओं और देशवासियों के समर्थन के बाद दोनों पक्ष एक प्रारंभिक सहमति तक पहुंचे हैं।
बयान में यह भी कहा गया कि कई महीनों की बातचीत के बाद 14 जून की शाम दोनों देशों के बीच समझौते का मसौदा अंतिम रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। ईरानी अधिकारियों ने इसे क्षेत्र में तनाव कम करने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया।
जेनेवा में हो सकते हैं हस्ताक्षर
रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रस्तावित समझौते पर 19 जून को जेनेवा में हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। इस कार्यक्रम में दोनों देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। यदि यह समझौता तय शर्तों के अनुसार आगे बढ़ता है, तो लेबनान समेत विभिन्न मोर्चों पर जारी सैन्य गतिविधियों को समाप्त करने, नौसैनिक नाकाबंदी हटाने और आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने जैसे बड़े कदम देखने को मिल सकते हैं।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इस संभावित समझौते पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और पश्चिम एशिया की स्थिरता पर भी पड़ सकता है।














