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TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह, बागी विधायकों ने अभिषेक बनर्जी से बनाई दूरी; नए गुट ने दिखाए अलग तेवर

तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। बागी विधायकों ने अभिषेक बनर्जी से दूरी बनाते हुए नए गुट का समर्थन किया है। करीब 60 विधायकों के समर्थन के दावे के बीच टीएमसी में नेतृत्व और संगठन को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Thu, 04 Jun 2026 8:17:04

TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह, बागी विधायकों ने अभिषेक बनर्जी से बनाई दूरी; नए गुट ने दिखाए अलग तेवर

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरता असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी के एक बागी गुट ने सांसद और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को लेकर खुली नाराजगी जताते हुए उनसे दूरी बनाने का फैसला किया है। इस नए समूह का नेतृत्व नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं, जिन्होंने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि उनके गुट की गतिविधियों और निर्णयों में अभिषेक बनर्जी की कोई भूमिका नहीं होगी। बताया जा रहा है कि इस कदम को पार्टी के लगभग 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जिससे टीएमसी के भीतर बढ़ती खींचतान और अधिक स्पष्ट हो गई है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब तृणमूल कांग्रेस हालिया चुनावी झटके के बाद संगठनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष केवल नेतृत्व को लेकर नहीं है, बल्कि विधायकों और शीर्ष नेतृत्व के बीच संवादहीनता तथा रणनीतिक मतभेदों का भी परिणाम है। मौजूदा हालात इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि पार्टी के विभिन्न धड़ों के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है।

बागी गुट के नेताओं ने हालांकि पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं उठाया है। उनका कहना है कि वे अब भी ममता बनर्जी को अपना सर्वोच्च नेता मानते हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर उनकी असहमति बनी हुई है। एक बागी नेता ने कहा कि उनका समूह ममता बनर्जी के नेतृत्व में विश्वास रखता है, मगर विधायक दल के मामलों में अभिषेक की दखलंदाजी को अब स्वीकार नहीं करेगा।

इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में भी बागी विधायकों ने ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में मान्यता दी है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि विधायक दल के संचालन और निर्णय प्रक्रिया में अभिषेक बनर्जी के अधिकार को वे आगे स्वीकार करने के इच्छुक नहीं हैं। इससे यह संकेत मिला है कि विवाद सीधे तौर पर ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर अभिषेक की बढ़ती भूमिका को लेकर है।

उधर, तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक खेमे ने बागी गुट के इस कदम की वैधता पर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का कहना है कि विधानसभा अध्यक्ष को जो दस्तावेज सौंपे गए, वे पार्टी के अधिकृत लेटरहेड पर नहीं थे, बल्कि सामान्य कागज पर प्रस्तुत किए गए थे। टीएमसी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी से जुड़े ऐसे किसी भी आधिकारिक निर्णय या सूचना को विधानसभा तक पहुंचाने का अधिकार केवल पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के पास है।

दरअसल, इस पूरे विवाद की शुरुआत कथित हस्ताक्षर घोटाले से हुई थी। विधानसभा अध्यक्ष को वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को मान्यता देने के लिए भेजे गए एक प्रस्ताव में कई विधायकों के हस्ताक्षर संदिग्ध पाए जाने का आरोप लगाया गया। मामला सामने आने के बाद इसकी शिकायत दर्ज कराई गई और जांच एजेंसियों ने इसकी पड़ताल शुरू कर दी। बाद में इस मामले की जांच राज्य सीआईडी को सौंप दी गई।

ऋतब्रत बनर्जी और निष्कासित विधायक संदीपन साहा के नेतृत्व वाले समूह ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को 58 विधायकों के समर्थन पत्र सौंपे हैं। यह संख्या दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी अलग गुट को मान्यता मिलने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से अधिक बताई जा रही है। इसी आधार पर बागी खेमे ने दावा किया है कि उनके पास पर्याप्त संख्याबल मौजूद है और वे विधानसभा के भीतर वास्तविक तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं।

राजनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को टीएमसी के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह टकराव और गहराता है, तो इसका असर पार्टी की संगठनात्मक एकजुटता और भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम हैं, जबकि पार्टी के भीतर की यह खींचतान राज्य की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बनी हुई है।

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