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50 विधायकों के बगावत की आहट से ममता खेमे में हलचल, क्या खतरे में है TMC का नाम और चुनाव चिह्न?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में TMC के भीतर बढ़ती अंदरूनी खींचतान और 50 विधायकों के अलग रुख की अटकलों से हलचल तेज हो गई है। ममता बनर्जी के नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं और पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न पर संभावित संकट की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। जानें पूरा राजनीतिक घटनाक्रम और इसके संभावित असर।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Tue, 02 Jun 2026 12:38:37

50 विधायकों के बगावत की आहट से ममता खेमे में हलचल, क्या खतरे में है TMC का नाम और चुनाव चिह्न?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर उठते राजनीतिक तूफान ने माहौल गर्म कर दिया है। विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद पार्टी के अंदर जो असंतोष धीरे-धीरे पनप रहा था, वह अब खुलकर सामने आने लगा है। संगठन के भीतर खींचतान, नेतृत्व को लेकर सवाल और गुटबाजी की खबरों ने पार्टी की एकजुटता पर गंभीर प्रभाव डाला है। इसी बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या टीएमसी एक बड़े राजनीतिक विभाजन की ओर बढ़ रही है।

नेता प्रतिपक्ष विवाद से बढ़ी अंदरूनी खींचतान

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर पार्टी के भीतर नया विवाद खड़ा हो गया है। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी के एक बड़े हिस्से के विधायक ऋतब्रत बनर्जी को इस पद के लिए समर्थन देने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं। इस संभावित समर्थन ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है और अंदरूनी संतुलन को अस्थिर कर दिया है।

हालांकि पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने हाल ही में कड़ा कदम उठाते हुए ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को संगठन विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया है। इसके बावजूद अंदरखाने यह चर्चा जारी है कि ऋतब्रत के पक्ष में एक बड़ा विधायक समूह सक्रिय हो सकता है।

50 विधायकों के अलग रुख की अटकलों से बढ़ी चिंता


सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि ऋतब्रत बनर्जी के समर्थक खेमे से जुड़े लगभग 50 विधायक पार्टी नेतृत्व से दूरी बना सकते हैं। यदि यह स्थिति वास्तविक रूप लेती है तो टीएमसी के लिए यह सबसे बड़ा राजनीतिक झटका साबित हो सकता है।

कोलकाता में पिछले कुछ दिनों से लगातार बैठकों का दौर चल रहा है, जहां नाराज विधायकों को मनाने और उन्हें पार्टी के साथ बनाए रखने की कोशिशें की जा रही हैं। हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि असंतोष केवल नेतृत्व के एक हिस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठनात्मक ढांचे और कार्यशैली को लेकर भी असहमति गहराई तक फैली हुई है।

क्या बंगाल में बनेंगे दो अलग राजनीतिक धड़े?

मौजूदा घटनाक्रमों ने टीएमसी में दो स्पष्ट खेमों के बनने की अटकलों को और मजबूत कर दिया है। एक तरफ वह समूह है जो मौजूदा नेतृत्व के साथ खड़ा है, जबकि दूसरी ओर असंतुष्ट विधायक एक अलग राजनीतिक दिशा की ओर संकेत कर रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि अंदरूनी बातचीत अब केवल असंतोष तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की राजनीतिक रणनीति और वैकल्पिक मंच की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। इससे राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव की आशंका जताई जा रही है।

‘असली टीएमसी’ की चर्चा और संभावित विभाजन

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो एक अलग राजनीतिक ढांचा ‘असली टीएमसी’ के नाम से सामने आ सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार हो रही बैठकों और संपर्कों ने इस संभावना को मजबूत कर दिया है।

सूत्रों के अनुसार, केवल विधायक ही नहीं बल्कि कुछ सांसद भी अलग रुख अपनाने की तैयारी में हैं। इसके अलावा पहले ही बड़ी संख्या में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के इस्तीफे की खबरों ने भी पार्टी संगठन को झटका दिया है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी स्थिति में पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

निष्कासन के बाद शुरू हुआ घटनाक्रम

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब पार्टी ने उलुबेरिया पूर्व के विधायक ऋतब्रत बनर्जी और एंटाली के विधायक संदीपन साहा को संगठन विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किया। दोनों नेताओं पर आरोप था कि उन्होंने पार्टी की आंतरिक प्रक्रियाओं और निर्णयों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए।

निष्कासन के बाद दोनों नेताओं की पार्टी बैठकों से दूरी और बढ़ गई, जिससे तनाव और गहरा गया और अंदरूनी दरार स्पष्ट दिखाई देने लगी।

ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर

46 वर्षीय ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वे पहले वामपंथी राजनीति से जुड़े रहे हैं और राज्यसभा सांसद के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। 2014 में उन्हें सीपीआई(एम) द्वारा राज्यसभा भेजा गया था, लेकिन 2017 में अनुशासनात्मक कारणों से उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक निर्दलीय सांसद के रूप में काम किया और बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। पार्टी में आने के बाद उन्हें फिर से सक्रिय भूमिका मिली और उन्हें विधानसभा चुनाव में भी उम्मीदवार बनाया गया।

संदीपन साहा की पृष्ठभूमि

संदीपन साहा, टीएमसी की पूर्व विधायक स्वर्णकला साहा के पुत्र हैं। वे पहले कोलकाता नगर निगम में पार्षद भी रह चुके हैं और संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।

हाल के समय में वे भी पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाने के आरोपों में चर्चा में रहे हैं। निष्कासन के बाद अब उनके राजनीतिक कदमों को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं और सूत्रों के अनुसार वे कई असंतुष्ट विधायकों के संपर्क में हैं।

गुप्त बैठकों और बढ़ते तनाव ने बढ़ाई हलचल

सूत्रों का कहना है कि कोलकाता के कुछ स्थानों और होटलों में असंतुष्ट विधायकों की कई अहम बैठकें हुई हैं, जिनमें भविष्य की रणनीति पर चर्चा की गई। इनमें नेतृत्व परिवर्तन और वैकल्पिक संगठनात्मक ढांचे जैसे मुद्दों पर विचार होने की बात सामने आई है।

इसके अलावा कालीघाट स्थित मुख्यमंत्री आवास पर बुलाई गई एक अहम बैठक में अपेक्षा से कम विधायकों की उपस्थिति ने भी पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।

नेता प्रतिपक्ष चयन पर भी अनिश्चितता

टीएमसी ने नेता प्रतिपक्ष पद के लिए सोभोंदेब चट्टोपाध्याय को आगे बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन पार्टी के भीतर विरोध और वैकल्पिक दावेदारी के चलते यह फैसला भी चुनौतीपूर्ण स्थिति में पहुंच गया है।

आगे की राह क्या होगी?

फिलहाल टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को टूटने से बचाना है। एक ओर नेतृत्व विधायकों को मनाने में जुटा है, तो दूसरी ओर असंतोष और गहराता जा रहा है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या पार्टी इस संकट को संभालने में सफल होती है या फिर बंगाल की राजनीति में एक बड़ा विभाजन देखने को मिलेगा, जो राज्य के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।

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