
दुष्कर्म मामलों में आजीवन कारावास की सजा काट रहे स्वयंभू संत आसाराम बापू को एक बार फिर अदालत से राहत मिली है। राजस्थान हाईकोर्ट की डबल बेंच ने उनकी अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाकर अब 12 अगस्त 2025 तक कर दी है। अदालत ने यह फैसला आसाराम की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति और विशेष चिकित्सा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सुनाया है।
गुजरात और राजस्थान से मिली थी पिछली अंतरिम राहत
आसाराम को पहले गुजरात हाईकोर्ट ने 7 जुलाई तक की अंतरिम जमानत दी थी, जिसे राजस्थान हाईकोर्ट ने 9 जुलाई तक बढ़ाया था। अब राजस्थान हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए जमानत की अवधि 12 अगस्त तक बढ़ा दी है, ताकि वे अपना इलाज सुचारू रूप से करवा सकें। यह राहत दोनों राज्यों के मामलों में चिकित्सा आधार पर प्रदान की गई है।
जोधपुर एम्स की मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर बीमारियां
जोधपुर के एम्स अस्पताल से प्राप्त मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया है कि 86 वर्षीय आसाराम को ‘कोरोनरी आर्टरी डिजीज’ है, जो 'हाई रिस्क' श्रेणी की बीमारी मानी जाती है। इसके अलावा उन्हें नेफ्रोलॉजिकल और एंडोक्रिनोलॉजिकल समस्याएं भी हैं। रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने उन्हें निरंतर निगरानी, विशेष नर्सिंग देखभाल और वरिष्ठ डॉक्टरों की देखरेख में इलाज की सलाह दी है।
वकील ने दी कोर्ट में दलीलें
आसाराम के वकील ने अदालत में दलील दी कि उनकी हालत बेहद गंभीर है और उन्हें जेल में उचित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। वकील ने कहा कि उम्रदराज आसाराम को इलाज के लिए स्वतंत्र माहौल की आवश्यकता है, जहां उनकी सेहत का गहन निरीक्षण और विशेष उपचार संभव हो सके।
दुष्कर्म मामलों में उम्रकैद की सजा
आसाराम को 2013 में राजस्थान के जोधपुर और गुजरात के गांधीनगर में दो अलग-अलग नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म के मामलों में दोषी ठहराया गया था। इन मामलों में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। गिरफ्तारी के बाद से ही उनकी ओर से समय-समय पर स्वास्थ्य के आधार पर जमानत की मांग की जाती रही है।
जमानत स्थायी नहीं, बढ़ी केवल इलाज हेतु अवधि
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह राहत स्थायी जमानत नहीं है, बल्कि अंतरिम है, जो केवल इलाज के लिए दी गई है। अदालत ने अभी इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है कि उन्हें स्थायी जमानत मिल सकती है या नहीं। फिलहाल वे कड़ी सुरक्षा के बीच चिकित्सा सुविधा का लाभ ले सकते हैं।
आसाराम को एक बार फिर अदालत से राहत तो मिली है, लेकिन यह राहत स्थायी नहीं है और केवल इलाज तक सीमित है। उनके खिलाफ गंभीर अपराधों में सजा बरकरार है और न्यायिक प्रक्रिया पूरी निगरानी में चल रही है। अदालत ने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए संविधान के अनुरूप मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है, लेकिन कानून से समझौता किए बिना।














