
पैर हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक हैं और ये हमारी सेहत का एक आईना भी होते हैं। पैरों में किसी भी तरह की असामान्यता या बदलाव को हल्के में लेना नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि ये कई गंभीर बीमारियों की शुरुआती चेतावनी हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स की सलाह है कि अगर आपके पैरों में कोई अनियमितता नजर आए, तो उसे नजरअंदाज न करें और जल्द से जल्द डॉक्टर से परामर्श लें।
# पैरों और टखनों में सूजन
पैरों और टखनों में सूजन (एडिमा) कई बार शरीर में तरल पदार्थ के असामान्य संचय के कारण होती है, जिसे फ्लूइड रिटेंशन कहा जाता है। यह सूजन सिर्फ दर्द और असुविधा ही नहीं बल्कि कई गंभीर बीमारियों का संकेत भी हो सकती है। दिल की कमजोरी (हार्ट फेलियर) में दिल ठीक से रक्त पंप नहीं कर पाता, जिससे शरीर के निचले हिस्सों में पानी जमा हो जाता है और सूजन हो जाती है। इसी तरह किडनी की समस्या में जब किडनी ठीक से कार्य नहीं करती, तो शरीर से अतिरिक्त तरल पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते और पैरों में सूजन आ जाती है। लिवर की बीमारी, जैसे सिरोसिस, में भी प्रोटीन का स्तर कम हो जाता है, जिससे रक्त में तरल पदार्थ का संतुलन बिगड़ता है और पैरों में सूजन हो सकती है।
इसके अलावा, विटामिन बी12 और फोलेट की कमी से भी सूजन हो सकती है क्योंकि ये पोषक तत्व रक्त और नसों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी होते हैं। साथ ही, गर्भावस्था, लंबी यात्रा, अत्यधिक बैठना या खड़े रहने जैसी स्थितियां भी पैरों और टखनों में सूजन का कारण बन सकती हैं। ओबेसिटी (अधिक वजन) और कुछ दवाइयां भी इस समस्या को बढ़ा सकती हैं।
सूजन को कम करने के लिए अपने पैरों को दिल की स्तर से ऊपर उठाकर आराम करना लाभकारी होता है। दिनभर बैठने या खड़े रहने के बाद नियमित रूप से पैरों को ऊपर उठाना और हल्की मालिश करना फायदेमंद होता है। नमक की अधिकता से बचें क्योंकि यह शरीर में पानी जमा होने का मुख्य कारण है। इसके अलावा, डॉक्टर की सलाह से व्यायाम, संतुलित आहार और जरूरी दवाइयां लेना भी सूजन कम करने में मदद करता है। अगर सूजन लगातार बनी रहे या दर्द, लालिमा, जलन के साथ हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें क्योंकि यह गहरी नसों में खून जमने (डीप वेन थ्रॉम्बोसिस) जैसी खतरनाक स्थिति का संकेत हो सकता है।
# पैर या टखनों में लगातार दर्द
पैर या टखनों में लगातार दर्द कई कारणों से हो सकता है, जिनमें चोट लगना, गठिया (आर्थराइटिस), नसों में समस्या या रक्त संचार में बाधा प्रमुख हैं। चोट लगने पर मांसपेशियों, टेंडन या हड्डियों में सूजन और दर्द हो सकता है, जो ठीक से इलाज न होने पर बढ़ सकता है। गठिया की स्थिति में जोड़ों में सूजन और दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है, जिससे चलने-फिरने में कठिनाई होती है।
अगर चलने पर दर्द तेज हो जाता है और आराम करने पर कम हो जाता है, तो यह स्ट्रेस फ्रैक्चर (हड्डी में छोटे-छोटे दरारें) या ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का कमजोर होना) का संकेत हो सकता है, खासकर बुजुर्गों या हड्डियों की कमजोरी वाले लोगों में। मैग्नीशियम की कमी से भी मांसपेशियों में ऐंठन और जोड़ों में अकड़न या दर्द हो सकता है, क्योंकि मैग्नीशियम मांसपेशियों की सिकुड़न और आराम को नियंत्रित करता है।
इसके अलावा, नसों की समस्याएं जैसे नर्व कंप्रेशन (स्नायु दबना) या पैर की नसों में रक्त प्रवाह कम होना भी दर्द का कारण हो सकता है। खराब रक्त परिसंचरण से पैरों में ठंडापन, सुन्नपन और दर्द महसूस हो सकता है। यदि दर्द लंबे समय तक बना रहे या बढ़ता जाए तो डॉक्टर से परामर्श अवश्य करें ताकि सही निदान और उपचार शुरू किया जा सके।
# पैरों का सुन्न होना या झुनझुनी महसूस होना
पैरों का सुन्न होना या झुनझुनी महसूस होना (टिंगलिंग) अक्सर नसों को पहुंचने वाले नुकसान का संकेत होता है, जिसे मेडिकल भाषा में पेरीफेरल न्यूरोपैथी कहा जाता है। इस स्थिति में पैरों की नर्व्स प्रभावित हो जाती हैं, जिससे संवेदनशीलता कम हो जाती है या असामान्य महसूस होता है। यह समस्या खासतौर पर डायबिटीज के मरीजों में बहुत आम है, क्योंकि लंबे समय तक उच्च रक्त शर्करा नसों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके अलावा, शराब का अत्यधिक सेवन भी नसों को कमजोर कर सकता है और कीमोथेरेपी जैसी दवाइयों के साइड इफेक्ट्स के कारण भी ये लक्षण विकसित हो सकते हैं।
विटामिन बी-12 और विटामिन ई की कमी भी नसों की सेहत को प्रभावित करती है, जिससे पैरों में सुन्नपन या झुनझुनी की समस्या हो सकती है। इसके अलावा, पोषण की कमी, तंत्रिका रोग, हॉर्मोनल असंतुलन, या हड्डियों की चोट भी इस समस्या को बढ़ावा दे सकती है।
अगर पैरों में लगातार सुन्नपन या झुनझुनी महसूस हो रही है, तो इसे अनदेखा न करें। जल्द से जल्द डॉक्टर से सलाह लेकर इसकी जांच कराना जरूरी है, ताकि कारण का पता लगाकर उचित इलाज शुरू किया जा सके और लक्षणों को बढ़ने से रोका जा सके।
# पैरों में ऐंठन या लेग क्रैम्प्स
बार-बार पैरों में ऐंठन आना शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) या मैग्नीशियम, कैल्शियम, और पोटैशियम जैसे जरूरी मिनरल्स की कमी का संकेत हो सकता है। ये मिनरल्स मांसपेशियों और नसों के सुचारू कामकाज के लिए बेहद आवश्यक होते हैं। इसके अलावा, लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठना या खड़े रहना, खराब रक्त संचार, अत्यधिक शारीरिक श्रम, या गलत जूतों का पहनना भी ऐंठन का कारण बन सकता है। ऐंठन से बचाव के लिए रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बहुत जरूरी है ताकि शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बना रहे। इसके साथ ही, विटामिन डी और बी कॉम्प्लेक्स जैसे पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार लें। सोने से पहले पैरों की हल्की मालिश और स्ट्रेचिंग करने से मांसपेशियां आराम महसूस करती हैं और ऐंठन की संभावना कम होती है।
अगर पैरों में लगातार और तीव्र ऐंठन हो रही हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है क्योंकि यह किसी और गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है। समय पर उपचार से आप अपने पैरों की सेहत को बेहतर रख सकते हैं और जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला सकते हैं।
# एड़ी में दर्द
एड़ी में दर्द, जिसे प्लांटर फेशिआइटिस के नाम से भी जाना जाता है, पैरों की तली में स्थित एक मोटी ऊतक पट्टी (प्लांटर फेशिया) में सूजन या चोट के कारण होता है। यह दर्द सुबह उठते समय या लंबे समय तक चलने के बाद सबसे अधिक महसूस होता है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे विटामिन डी की कमी, असुविधाजनक या गलत आकार के जूते पहनना, शरीर का अधिक वजन, अत्यधिक शारीरिक श्रम या दौड़ना, और पैरों की आर्च में असामान्यताएं। इसके अलावा, लंबे समय तक खड़े रहना या कठोर सतह पर चलना भी इस समस्या को बढ़ावा दे सकता है। यदि एड़ी में दर्द लगातार बना रहे या तेज हो जाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उचित चिकित्सकीय सलाह और उपचार के साथ-साथ आराम, स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज, और सही फुटवियर का इस्तेमाल इस दर्द को कम करने में मदद करता है।
विटामिन डी की कमी के कारण हड्डियों और मांसपेशियों में कमजोरी आ सकती है, जिससे प्लांटर फेशिआइटिस जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए, अपने आहार में विटामिन डी युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें और यदि जरूरत हो तो डॉक्टर से सप्लीमेंट्स लेने की सलाह लें।
# ठंडे पैर
पैरों का लगातार ठंडा रहना एक सामान्य समस्या नहीं है और यह अक्सर शरीर में रक्त संचार की खराबी का संकेत हो सकता है। जब पैरों तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुंच पाता, तो वे ठंडे और सुन्न महसूस होने लगते हैं। इसके अलावा, पोषण की कमी, खासकर आयरन की कमी (जिससे एनीमिया हो सकता है), थायरॉयड हार्मोन की अनियमितता, या खराब जीवनशैली जैसे कम शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान और तनाव भी इस समस्या को बढ़ावा दे सकते हैं।
ठंडे पैरों की समस्या से निपटने के लिए, अपने आहार में आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे पालक, अनार, सेब और बीन्स शामिल करें। थायरॉयड के लिए आयोडीनयुक्त आहार भी जरूरी है, जैसे समुद्री भोजन, दालें और अंडे। साथ ही, पैरों को गर्म रखने के लिए मोटे मोजे पहनें और इंसुलेटेड जूतों का उपयोग करें। नियमित रूप से हल्की फुल्की एक्सरसाइज करें, ताकि रक्त संचार बेहतर हो और पैरों में गर्माहट बनी रहे। अगर समस्या बनी रहे तो डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।
# फटी हुई एड़ियां
एड़ियों पर दरारें या फटना केवल सूखी त्वचा की वजह से ही नहीं होता, बल्कि इसके पीछे विटामिन ए, जिंक और ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। ये पोषक तत्व त्वचा की नमी और लचीलापन बनाए रखने में मदद करते हैं। इसके अलावा, डायबिटीज़ के मरीजों में ब्लड सर्कुलेशन कमजोर होने की वजह से भी एड़ियों में फटना ज्यादा देखा जाता है। एक्जिमा और त्वचा की अन्य सूजन संबंधी समस्याएं भी इस समस्या को बढ़ा सकती हैं।
फटी हुई एड़ियों से बचाव के लिए नियमित रूप से मॉइस्चराइजिंग करना बेहद जरूरी है। साथ ही, सही और आरामदायक जूते पहनें ताकि एड़ियों पर अनावश्यक दबाव और खरोंच न पड़े। नंगे पैर चलने से बचें और साप्ताहिक तौर पर पैर की मालिश करने से त्वचा की सूखापन कम होता है। अगर फटने की समस्या गंभीर हो तो त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श लें।
# स्पाइडर वेन्स (मकड़ी जाली जैसी नसें)
स्पाइडर वेन्स तब उत्पन्न होती हैं जब नसों के अंदर रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है और नसों के वाल्व कमजोर हो जाते हैं, जिससे रक्त ठीक से ऊपर की ओर नहीं जा पाता। इसके परिणामस्वरूप नसें सूज जाती हैं और मकड़ी के जाले जैसी दिखने लगती हैं। यह समस्या अधिकतर पैरों में देखने को मिलती है और खासकर उन लोगों में आम है जो लंबे समय तक खड़े रहते हैं या जिनका वजन ज्यादा होता है।
इसके अलावा, विटामिन सी और बायोफ्लेवोनॉइड्स की कमी भी नसों की दीवारों को कमजोर कर स्पाइडर वेन्स का कारण बन सकती है। इन पोषक तत्वों का सेवन नसों की मजबूती और लचीलापन बढ़ाने में मदद करता है। स्पाइडर वेन्स से बचाव के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार के साथ-साथ नियमित व्यायाम और चिकित्सकीय परामर्श लेना आवश्यक है। गंभीर मामलों में डॉक्टर से उपचार कराना जरूरी हो सकता है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी सुझाव को अपनाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।














