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आंखों में दिखें ये संकेत तो हो जाएं सतर्क, डिमेंशिया का हो सकता है शुरुआती अलर्ट

आंखों में दिखने वाले कुछ बदलाव डिमेंशिया का शुरुआती संकेत हो सकते हैं। रेटिना से जुड़ी ये चेतावनियां समय रहते पहचान ली जाएं तो गंभीर बीमारी से बचाव संभव है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 02 Jan 2026 12:43:51

आंखों में दिखें ये संकेत तो हो जाएं सतर्क, डिमेंशिया का हो सकता है शुरुआती अलर्ट

आमतौर पर हम आंखों को केवल देखने का माध्यम मानते हैं, लेकिन सच यह है कि आंखें हमारे दिमाग की सेहत का भी आईना होती हैं। हालिया वैज्ञानिक शोधों में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है—डिमेंशिया जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी के शुरुआती संकेत आंखों में दिख सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आंखों में होने वाले कुछ सूक्ष्म बदलाव भविष्य में दिमाग से जुड़ी गंभीर समस्याओं की ओर इशारा कर सकते हैं।

डिमेंशिया एक ऐसी स्थिति है जो धीरे-धीरे व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता, व्यवहार और रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित करती है। यह बीमारी केवल उम्रदराज़ लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि समय के साथ किसी भी व्यक्ति को अपनी गिरफ्त में ले सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि आंखों में होने वाले इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो डिमेंशिया के खतरे को पहले ही भांपा जा सकता है और उपचार की दिशा में शुरुआती कदम उठाए जा सकते हैं।

डिमेंशिया क्या है और क्यों है यह गंभीर बीमारी?

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनियाभर में करोड़ों लोग डिमेंशिया से प्रभावित हैं। अकेले अमेरिका में ही 60 लाख से अधिक लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं, जबकि हर साल लगभग 10 लाख लोगों की मौत डिमेंशिया से जुड़ी जटिलताओं के कारण होती है। डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि यह कई प्रकार के मस्तिष्क विकारों का समूह है। इनमें सबसे आम अल्जाइमर रोग शामिल है, जो धीरे-धीरे मस्तिष्क की कार्यक्षमता को नुकसान पहुंचाता है।

आंखों के ये बदलाव दे सकते हैं डिमेंशिया का संकेत

वैज्ञानिकों के अनुसार, आंखों के पीछे मौजूद रेटिना नामक हिस्सा डिमेंशिया के खतरे का शुरुआती संकेत दे सकता है। रेटिना आंख का वह महत्वपूर्ण भाग है, जो रोशनी को पकड़कर उसे दिमाग तक पहुंचाता है। यह आंख और मस्तिष्क के बीच एक सेतु की तरह काम करता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि ऑप्टिक नर्व सीधे सेंट्रल नर्वस सिस्टम से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि रेटिना पतला होने लगे या कमजोर दिखाई दे, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि मस्तिष्क में भी धीरे-धीरे बदलाव शुरू हो चुके हैं।

रिसर्च में क्या सामने आया?

‘फ्रंटियर्स इन एजिंग न्यूरोसाइंस’ जर्नल में प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन में करीब 30,000 वयस्कों को लगभग 10 वर्षों तक ट्रैक किया गया। इस दौरान प्रतिभागियों की आंखों की जांच रेटिनल ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी (OCT) तकनीक से की गई। शोध में पाया गया कि जिन लोगों की रेटिना की परत पतली थी, उनमें डिमेंशिया विकसित होने का खतरा अधिक था।

रिसर्च के मुताबिक, रेटिना की मोटाई में हर एक यूनिट की कमी के साथ डिमेंशिया का जोखिम लगभग 3 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। खासतौर पर जिन लोगों के रेटिना के मध्य भाग की परत पतली पाई गई, उनमें फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (FTD) का खतरा 41 प्रतिशत अधिक देखा गया। करीब 9 साल के फॉलो-अप के बाद 148 लोगों में अल्जाइमर और 8 लोगों में FTD का निदान हुआ, जिससे शोध के निष्कर्षों को मजबूती मिली।

डिमेंशिया के सामान्य लक्षण जिन्हें न करें नजरअंदाज


नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन एजिंग और NHS के अनुसार, डिमेंशिया के लक्षण धीरे-धीरे उभरते हैं। इनमें बार-बार चीजें भूल जाना, सोचने और समझने में समय लगना, बातचीत के दौरान सही शब्द न मिल पाना, निर्णय लेने में कठिनाई, मूड में अचानक बदलाव, चिड़चिड़ापन, बेचैनी और रोजमर्रा के कामों में परेशानी शामिल हैं। यदि ऐसे लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बेहद जरूरी है।

क्या डिमेंशिया से बचाव संभव है?

फिलहाल डिमेंशिया को पूरी तरह रोकने का कोई निश्चित इलाज मौजूद नहीं है, लेकिन कुछ स्वस्थ आदतें अपनाकर इसके जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसमें संतुलित और पौष्टिक आहार, नियमित व्यायाम, दिमाग को सक्रिय रखने वाली गतिविधियां, भरपूर नींद, धूम्रपान और शराब से दूरी, साथ ही समय-समय पर आंखों और सामान्य स्वास्थ्य की जांच शामिल है। समय रहते सावधानी बरतना ही इस गंभीर बीमारी से बचाव का सबसे मजबूत हथियार है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी सुझाव को अपनाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।

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