
अमेरिका और ईरान के बीच हुई अहम शांति वार्ता आखिरकार किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी, जिसके बाद दोनों देशों के बीच तल्खी और बढ़ती नजर आ रही है। बातचीत के असफल रहने के बाद ईरान ने साफ तौर पर इसका जिम्मेदार अमेरिका को ठहराया है। ईरान की सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिकी पक्ष ने इतनी ज्यादा शर्तें और मांगें सामने रख दीं कि बातचीत आगे बढ़ ही नहीं पाई।
हालांकि, दूसरी तरफ अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने वार्ता को लेकर अलग ही तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा, “ईरानी प्रतिनिधियों के साथ हमारी कई महत्वपूर्ण चर्चाएं हुईं, जो सकारात्मक पहलू है। लेकिन दुर्भाग्य से हम किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच सके। मेरी नजर में यह स्थिति अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए नुकसानदेह है।”
किन मुद्दों पर अटक गई बातचीत?
ईरान का मानना है कि अमेरिका की ओर से रखी गई शर्तें इतनी कठोर और व्यापक थीं कि किसी साझा ढांचे (फ्रेमवर्क) पर सहमति बन ही नहीं सकी। बातचीत के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य, परमाणु अधिकार और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन यही विषय अंततः गतिरोध की वजह बन गए।
सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने वार्ता में एक 10-सूत्रीय प्रस्ताव रखा था, जिसमें उसने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने नियंत्रण को मान्यता देने और वहां से गुजरने वाले जहाजों पर ट्रांजिट शुल्क वसूलने के अधिकार की बात कही थी। इसके अलावा, ईरान ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन जारी रखने के अपने अधिकार पर भी जोर दिया।
‘जंग में जो नहीं मिला, वो टेबल पर मांगा’
ईरानी मीडिया के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, वार्ता से जुड़े एक करीबी सूत्र ने दावा किया कि अमेरिका बातचीत के जरिए वे सभी शर्तें मनवाना चाहता था, जो वह युद्ध के दौरान हासिल नहीं कर सका। सूत्र ने कहा, “ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट, शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर अमेरिका की प्रमुख मांगों को सिरे से खारिज कर दिया।”
अमेरिका का क्या है रुख?
वार्ता के विफल होने के बाद अमेरिका ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए परमाणु हथियारों के मुद्दे को सबसे अहम बताया। जेडी वेंस ने कहा, “हमारे लिए सबसे जरूरी यह है कि हमें इस बात की ठोस गारंटी मिले कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और न ही ऐसे संसाधन जुटाएगा, जिनसे वह तेजी से इस दिशा में आगे बढ़ सके।”













