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'सरेंडर की शर्तें नहीं मानेंगे', पाकिस्तान में अमेरिका संग वार्ता विफल होने पर ईरान का सख्त रुख

पाकिस्तान में अमेरिका-ईरान वार्ता विफल होने के बाद ईरान ने सख्त रुख अपनाया। ‘सरेंडर की शर्तें नहीं मानेंगे’ बयान से बढ़ा तनाव, जानें पूरी खबर।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Sun, 12 Apr 2026 09:00:52

'सरेंडर की शर्तें नहीं मानेंगे', पाकिस्तान में अमेरिका संग वार्ता विफल होने पर ईरान का सख्त रुख

अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित बातचीत के असफल रहने के बाद तनाव और बढ़ गया है। इस्लामाबाद में आयोजित इस अहम बैठक के बेनतीजा खत्म होने के बाद अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने देश लौट चुके हैं। वहीं, इस घटनाक्रम के बाद ईरान की ओर से पहली प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसमें उसने साफ शब्दों में कहा है कि वह किसी भी तरह के समर्पण की शर्तें स्वीकार नहीं करेगा।

ईरानी सेना के प्रवक्ता इब्राहिम जुल्फिकारी ने बातचीत विफल होने की पुष्टि करते हुए कहा कि ईरान अपने रुख पर अडिग है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, “हम अमेरिका के साथ बातचीत में किसी भी तरह की सरेंडर की शर्त नहीं मानेंगे और अपनी शर्तों से पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता।” इस बयान से साफ है कि दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी गहरे बने हुए हैं।

पाकिस्तान में आमने-सामने हुई थी अहम बैठक

दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच यह हाई-लेवल बातचीत 11 अप्रैल 2026 को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित की गई थी। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे थे, जबकि ईरान की ओर से संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबफ वार्ता में शामिल हुए। इस बातचीत का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक स्थायी समाधान तलाशना था।

यह बैठक इसलिए भी बेहद खास मानी जा रही थी क्योंकि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार दोनों देशों के बीच इस स्तर की प्रत्यक्ष बातचीत हो रही थी। पाकिस्तान ने इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाई और वार्ता से पहले दोनों पक्षों की अलग-अलग बैठकें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ भी हुईं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम, पूरी दुनिया की नजर

इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग को देखते हुए इस्लामाबाद में अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। शहर के संवेदनशील इलाकों में रेड अलर्ट जारी किया गया था और करीब 10,000 से अधिक पुलिस और सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया था। रेड ज़ोन को सेना और रेंजर्स की निगरानी में रखा गया था, जहां केवल अधिकृत व्यक्तियों को ही प्रवेश की अनुमति दी गई थी।

इस वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई थीं, क्योंकि इससे मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदें जुड़ी थीं। हालांकि, बातचीत के विफल रहने के बाद अब क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

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