
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि मध्य पूर्व के हालात पर उनके बार-बार बदलते बयान वैश्विक स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं। मैक्रों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गंभीर मुद्दों पर निरंतर बदलते रुख से विश्वसनीयता कमजोर होती है। उन्होंने टिप्पणी की, “अगर आप वास्तव में गंभीर हैं, तो रोज-रोज अपना बयान बदलना बंद कीजिए। हर दिन बोलना जरूरी नहीं होता।”
अपने दक्षिण कोरिया दौरे के दौरान मैक्रों ने यह भी संकेत दिया कि ट्रंप के बयानों ने अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों को भी प्रभावित किया है। खासतौर पर नाटो (NATO) को लेकर ट्रंप की लगातार बदलती राय पर उन्होंने चिंता जताई। मैक्रों के मुताबिक, यदि कोई देश अपनी प्रतिबद्धताओं को लेकर बार-बार संदेह पैदा करता है, तो इससे गठबंधन की मजबूती कमजोर पड़ जाती है और भरोसा धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।
दरअसल, ट्रंप पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि वे अमेरिका की NATO सदस्यता पर पुनर्विचार कर सकते हैं। उनका मानना है कि जब ईरान के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात आई, तो सहयोगी देशों ने अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। ट्रंप ने NATO को “पेपर टाइगर” तक कह दिया और यह भी दोहराया कि अमेरिका ने इस गठबंधन में भारी निवेश किया है, लेकिन बदले में पर्याप्त सहयोग नहीं मिला। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर अब केवल विचार नहीं, बल्कि ठोस फैसला लेने का समय आ गया है।
इसी बीच, मैक्रों ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर भी अपनी स्पष्ट राय रखी। उन्होंने कहा कि इस अहम जलमार्ग को सैन्य बल के जरिए “मुक्त” कराना व्यवहारिक नहीं है। उनके अनुसार, ऐसा कोई भी प्रयास लंबा, जटिल और अत्यंत जोखिम भरा हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई के दौरान जहाजों को तटीय खतरों का सामना करना पड़ेगा, जहां ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के पास उन्नत हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल जैसी क्षमताएं मौजूद हैं।
मैक्रों ने इस मुद्दे का समाधान केवल कूटनीतिक रास्ते में देखा। उन्होंने कहा कि इस जलमार्ग की स्थिरता के लिए सबसे पहले संघर्षविराम जरूरी है, जिसके बाद बातचीत की प्रक्रिया को फिर से शुरू किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, ईरान के साथ सहयोग के बिना इस क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षित आवागमन संभव नहीं है।
हालांकि ट्रंप ने यह दावा किया है कि ईरान की नौसैनिक और सैन्य क्षमताओं को काफी हद तक नुकसान पहुंचाया जा चुका है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ईरान अब भी इस जलमार्ग पर प्रभावी नियंत्रण बनाए हुए है। गौरतलब है कि दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुजरती है, जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और भी बढ़ जाती है।
पिछले सप्ताह तेहरान की ओर से यह संकेत भी दिया गया था कि वे केवल उन देशों के जहाजों को गुजरने की अनुमति देंगे, जो उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की आक्रामक गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। इस बयान ने क्षेत्र में तनाव और अनिश्चितता दोनों को और बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक बाजार और कूटनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।













