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अमेरिका-नाटो की आपत्तियों के बीच भारत आएंगे पुतिन, मोदी से रणनीतिक मुद्दों पर अहम बातचीत तय

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते उत्पन्न हुए भू-राजनीतिक तनावों और अमेरिका तथा नाटो देशों की कड़ी आपत्तियों के बावजूद, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस वर्ष के अंत में भारत आने वाले हैं। उनका यह दौरा भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के तहत होगा, जो वर्ष 2021 के बाद पहली बार नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Sun, 20 Jul 2025 1:08:54

अमेरिका-नाटो की आपत्तियों के बीच भारत आएंगे पुतिन, मोदी से रणनीतिक मुद्दों पर अहम बातचीत तय

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते उत्पन्न हुए भू-राजनीतिक तनावों और अमेरिका तथा नाटो देशों की कड़ी आपत्तियों के बावजूद, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस वर्ष के अंत में भारत आने वाले हैं। उनका यह दौरा भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के तहत होगा, जो वर्ष 2021 के बाद पहली बार नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है।

यह यात्रा उस समय हो रही है जब पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका और NATO, रूस के खिलाफ आर्थिक और सामरिक प्रतिबंधों की रणनीति को सख्ती से आगे बढ़ा रहे हैं और भारत से रूस के साथ अपने सैन्य और ऊर्जा संबंधों पर पुनर्विचार का दबाव बना रहे हैं।

क्या रहेगा इस शिखर बैठक का एजेंडा

सामरिक साझेदारी को नई मजबूती देने के उद्देश्य से भारत और रूस के बीच प्रस्तावित इस शिखर सम्मेलन में अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श की संभावना है। सूत्रों के अनुसार, बैठक में रक्षा उत्पादन और तकनीकी सहयोग को अगले स्तर तक ले जाने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाएगा। दोनों देश मिलकर रक्षा उपकरणों की साझा उत्पादन इकाइयाँ स्थापित करने और तकनीकी ट्रांसफर को सरल बनाने की दिशा में रणनीति बना सकते हैं।

ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक साझेदारी भी इस सम्मेलन का एक अहम बिंदु होगा। तेल, गैस और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश और आपूर्ति शृंखला को स्थिर रखने के उपायों पर बातचीत हो सकती है। विशेष रूप से भारत में एक नए परमाणु संयंत्र के लिए स्थान तय करने को लेकर भी उच्च स्तर की चर्चा की उम्मीद है, जिससे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को बल मिल सके।

इसके साथ ही, आर्कटिक क्षेत्र में भारत की संभावित भूमिका और उपस्थिति पर भी विचार किया जा सकता है। रूस, जो इस क्षेत्र का प्रमुख खिलाड़ी है, भारत को यहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान और ऊर्जा परियोजनाओं में साझेदार के रूप में देखना चाहता है।

बैठक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), हाई-टेक प्रौद्योगिकियों और साइबर सुरक्षा जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में सहयोग की रूपरेखा तैयार करने का प्रस्ताव भी शामिल है। बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में इन क्षेत्रों में साझा प्रयास दोनों देशों की तकनीकी शक्ति को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।

राष्ट्रपति पुतिन ने हाल ही में बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के विशेष अनुरोध पर रूस ने भारत को उर्वरक आपूर्ति कई गुना बढ़ा दी, जिससे खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिली है। यह आर्थिक सहयोग, रणनीतिक संबंधों की मजबूती का एक और प्रमाण है।

विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने पुष्टि की कि भारत-रूस शिखर सम्मेलन जल्द होगा। उन्होंने कहा: “यह वार्षिक सम्मेलन हमारे रणनीतिक संबंधों का अहम हिस्सा है। पिछली बार यह मॉस्को में हुआ था, अब बारी भारत की है। तारीखें आपसी सहमति से तय की जाएंगी।”

इस वक्तव्य से स्पष्ट है कि भारत इस बैठक को पारंपरिक कूटनीतिक प्रक्रिया मानकर आगे बढ़ा रहा है, भले ही वैश्विक परिस्थितियाँ कितनी भी असहज हों।

अमेरिका और NATO को क्यों है आपत्ति


अमेरिका और नाटो देश भारत के रूस के साथ तेल खरीद, रक्षा सौदों और रणनीतिक साझेदारी को लेकर असहज हैं। उनका तर्क है कि इस तरह के सहयोग से पश्चिमी प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कम होती है और G7 व NATO की संयुक्त रणनीति कमजोर होती है।

हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया है कि: “हमारी विदेश नीति स्वतंत्र और बहुध्रुवीय है। रूस न केवल एक पुराना मित्र है, बल्कि वह संकट की घड़ी में हमेशा हमारे साथ खड़ा रहा है।”

‘ऑपरेशन सिंदूर’ से पहले रूस का भारत को समर्थन

भारत द्वारा आतंकवाद के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई 'ऑपरेशन सिंदूर' से ठीक पहले प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच संवाद हुआ था। रूस ने भारत की कार्रवाई का समर्थन किया और अपनी रक्षा प्रणालियाँ मुहैया कराईं।

विशेषत: S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और भारत-रूस का संयुक्त ब्रह्मोस प्रोजेक्ट, इस कार्रवाई में निर्णायक भूमिका में रहे। इन हथियार प्रणालियों ने पाकिस्तान की चीन निर्मित प्रणाली को निष्क्रिय कर देने में बड़ी सफलता दिलाई।

इस वर्ष शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का शिखर सम्मेलन चीन में प्रस्तावित है। अगर प्रधानमंत्री मोदी इसमें भाग लेते हैं, तो वहाँ पुतिन से अलग द्विपक्षीय मुलाकात भी संभव है। सूत्रों का मानना है कि वहां भी कई रणनीतिक मुद्दों पर अनौपचारिक चर्चा हो सकती है।

संबंधों की पुनर्पुष्टि का समय

पश्चिमी दबावों के बावजूद भारत और रूस के संबंधों में सक्रियता और सामरिक स्थायित्व दिख रहा है। पुतिन का यह दौरा न केवल दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग को नई दिशा देगा, बल्कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की एक बार फिर स्पष्ट घोषणा भी साबित होगा।

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