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चीन कहां है...ईरान-अमेरिका-इजरायल टकराव के बीच उठता सवाल

ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष के बीच चीन की भूमिका पर उठ रहे सवालों का विश्लेषण। जानें 25 साल के समझौते, बेल्ट एंड रोड परियोजना, तेल व्यापार और खाड़ी देशों में निवेश के बीच बीजिंग की संतुलन साधने वाली रणनीति।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Wed, 04 Mar 2026 09:51:57

चीन कहां है...ईरान-अमेरिका-इजरायल टकराव के बीच उठता सवाल

पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष के बीच एक प्रश्न बार-बार सामने आ रहा है—इस पूरे परिदृश्य में चीन की वास्तविक भूमिका क्या है? लंबे समय से यह धारणा बनाई जाती रही कि बीजिंग, तेहरान का सबसे बड़ा रणनीतिक सहायक साबित होगा। लेकिन मौजूदा हालात इस अनुमान से अलग तस्वीर पेश करते हैं।

मई 2025 में चीन के यीवू शहर से रवाना हुई एक मालगाड़ी 15 दिनों की यात्रा के बाद ईरान के बंदरगाह तक पहुंची थी। यह ट्रेन इनचेह बरून सीमा पार कर ईरान में दाखिल हुई और इसे चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड पहल का प्रतीकात्मक कदम माना गया। इससे पहले मार्च 2021 में दोनों देशों के बीच 25 वर्षों के व्यापक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसमें लगभग 400 अरब डॉलर के संभावित निवेश का उल्लेख किया गया। इतना ही नहीं, मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध बहाली की घोषणा ने भी यह संदेश दिया था कि बीजिंग क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है।

युद्ध से पहले बढ़ी अटकलें

संघर्ष भड़कने से कुछ दिन पहले ऐसी खबरें आई थीं कि ईरान चीन निर्मित सीएम-302 एंटी-शिप मिसाइल खरीदने की तैयारी में है। करीब 290 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली इन मिसाइलों को कम ऊंचाई पर तेज गति से उड़ान भरकर रडार से बच निकलने में सक्षम बताया गया। इसके अलावा फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की उपग्रह तस्वीरें एक चीनी ओपन सोर्स इंटेलिजेंस समूह ने साझा की थीं। इन घटनाओं ने यह धारणा मजबूत की कि यदि हालात बिगड़े तो चीन खुलकर ईरान के साथ खड़ा हो सकता है।

समझौते की हकीकत और सीमाएं

हालांकि जब युद्ध की शुरुआत हुई और पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत की खबर सामने आई, तब चीन की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत संयमित रही। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि यह रुख अचानक नहीं था। लंदन स्थित थिंक टैंक चाथम हाउस के विशेषज्ञ अहमद अबौदौह का मत है कि चीन ने कभी भी ईरान को प्रत्यक्ष सैन्य सुरक्षा देने का वादा नहीं किया था।

नीदरलैंड की ग्रोनिंगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता विलियम फिगुएरोआ ने भी अपने अध्ययन में लिखा कि 25 वर्षीय सहयोग समझौते को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार यह दस्तावेज ठोस निवेश अनुबंधों से अधिक संभावनाओं का खाका था, जिसमें स्पष्ट वित्तीय लक्ष्य तय नहीं थे।

बीजिंग की सावधानीभरी प्रतिक्रिया

कार्नेगी एंडोमेंट के विश्लेषक इवान फेगेनबाम का कहना है कि वैश्विक समुदाय अक्सर चीन को अमेरिका की दृष्टि से आंकता है, जबकि चीन की साझेदारियां सैन्य दायित्वों या सुरक्षा गारंटी पर आधारित नहीं होतीं। उनका तर्क है कि बीजिंग खुद को क्षेत्रीय सैन्य संरक्षक के रूप में प्रस्तुत नहीं करता और न ही वह उस भूमिका में उतरना चाहता है।

आर्थिक आंकड़े भी इसी सोच को मजबूती देते हैं। वर्ष 2024 में चीन खाड़ी देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया। 2023 में ईरान में उसका प्रत्यक्ष निवेश मात्र 185 मिलियन डॉलर रहा, जबकि दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 25.3 अरब डॉलर तक पहुंचा—जो 2014 की तुलना में लगभग आधा है। दूसरी ओर, केवल सऊदी अरब में चीन का निवेश 25 अरब डॉलर से अधिक बताया जाता है, और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों के साथ उसका कुल व्यापार 500 अरब डॉलर के पार है। यही वे देश हैं जो ईरान से जुड़े सैन्य तनाव की सीधी जद में आते हैं।

तेल, व्यापार और संतुलन की नीति

विशेषज्ञों के मुताबिक 2025 में चीन ईरान के निर्यातित तेल का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रियायती दरों पर खरीद रहा है, जिससे तेहरान को आर्थिक राहत मिलती है। लेकिन व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति चीन के समुद्री व्यापार मार्गों और खाड़ी देशों में उसके विशाल निवेश के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।

वेनेजुएला का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, जहां चीन ने बड़े पैमाने पर तेल खरीदा और रक्षा उपकरणों की आपूर्ति की, लेकिन राजनीतिक संकट के समय सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। इसी तरह अफगानिस्तान में अमेरिकी वापसी के बाद चीन ने खनिज संसाधनों में रुचि दिखाई, परंतु सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने से दूरी बनाए रखी।

जोखिम से बचते हुए प्रभाव बढ़ाने की रणनीति

विश्लेषकों का मानना है कि चीन की दीर्घकालिक रणनीति स्पष्ट है—वह अपना प्रभाव क्षेत्र विस्तारित करना चाहता है, लेकिन सीधे टकराव से बचते हुए। वह ईरान को पूरी तरह अस्थिर होते नहीं देखना चाहता, क्योंकि इससे उसके ऊर्जा हित प्रभावित होंगे। साथ ही वह अपनी आर्थिक पकड़ बनाए रखते हुए जोखिम न्यूनतम रखने की नीति पर चलता दिखता है।

इस परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि ईरान युद्ध की कहानी में चीन पूरी तरह अनुपस्थित नहीं है। वह पर्दे के पीछे मौजूद है, पर एक सैन्य सहयोगी की तरह नहीं, बल्कि एक सावधान निवेशक और कर्जदाता के रूप में, जो लंबी भू-राजनीतिक शतरंज खेल रहा है।

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