
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में हाल ही में श्रमिकों के उग्र विरोध प्रदर्शनों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए राज्य के न्यूनतम मजदूरी ढांचे में संशोधन को मंजूरी दे दी है। राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के बाद नई मजदूरी दरें आधिकारिक रूप से लागू कर दी गई हैं। सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के साथ ही यह संशोधित वेतन व्यवस्था अब कानूनी रूप से प्रभावी हो गई है, जिससे लाखों श्रमिकों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
दरअसल, वेतन वृद्धि और श्रमिक हितों को लेकर नियोक्ताओं व कर्मचारियों के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव और हालिया प्रदर्शन को देखते हुए सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति का उद्देश्य मौजूदा वेतन संरचना की समीक्षा कर व्यावहारिक समाधान सुझाना था, ताकि औद्योगिक माहौल स्थिर रह सके और विवादों को रोका जा सके।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में राज्य को तीन अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर न्यूनतम मजदूरी तय करने की सिफारिश की थी, जिसे सरकार ने अंतरिम राहत के रूप में स्वीकार कर तुरंत लागू कर दिया। सरकारी बयान के अनुसार, प्रदेश को भौगोलिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर तीन वर्गों में विभाजित किया गया है, जिससे मजदूरी व्यवस्था अधिक संतुलित और व्यावहारिक बन सके।
पहली श्रेणी में गौतमबुद्धनगर और गाजियाबाद जैसे जिले शामिल किए गए हैं, जहां जीवन-यापन की लागत अधिक मानी जाती है। यहां अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 13,690 रुपये, अर्द्धकुशल श्रमिकों के लिए 15,059 रुपये और कुशल श्रमिकों के लिए 16,868 रुपये मासिक निर्धारित किया गया है। यह दरें इन जिलों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए तय की गई हैं।
दूसरी श्रेणी में राज्य के अन्य नगर निगम वाले जिलों को रखा गया है। यहां अकुशल श्रमिकों को 13,006 रुपये, अर्द्धकुशल श्रमिकों को 14,306 रुपये और कुशल श्रमिकों को 16,025 रुपये मासिक न्यूनतम वेतन मिलेगा। सरकार का मानना है कि यह संरचना क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने में मदद करेगी।
वहीं तीसरी श्रेणी में शेष सभी जिले शामिल किए गए हैं, जहां अपेक्षाकृत जीवन-यापन की लागत कम है। यहां अकुशल श्रमिकों के लिए 12,356 रुपये, अर्द्धकुशल के लिए 13,590 रुपये और कुशल श्रमिकों के लिए 15,224 रुपये मासिक न्यूनतम मजदूरी तय की गई है। इन सभी दरों में मूल वेतन के साथ-साथ परिवर्तनीय महंगाई भत्ता (VDA) भी शामिल है।
सरकार के अनुसार, वर्ष 2019 और 2024 में प्रस्तावित वेतन संशोधन लागू नहीं हो पाने के कारण मजदूरी संरचना में असंतुलन बढ़ गया था। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर लंबित पुनरीक्षण को ध्यान में रखते हुए अब यह कदम उठाया गया है। प्रशासन का कहना है कि यह फैसला न केवल श्रमिकों को आर्थिक राहत देगा, बल्कि औद्योगिक शांति बनाए रखने और उत्पादन व्यवस्था को स्थिर रखने में भी अहम भूमिका निभाएगा। हालिया विवादों और प्रदर्शन की स्थिति को देखते हुए इसे समय पर लिया गया आवश्यक और संतुलित निर्णय माना जा रहा है।













