
राहुल गांधी पर दिए गए अपने विवादित बयान को लेकर भाजपा सांसद कंगना रनौत ने अब अपनी प्रतिक्रिया स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि उनके बयान का मकसद किसी का अपमान करना नहीं था, बल्कि संसद में दिए गए भाषण के स्तर पर सवाल उठाना था। कंगना ने यह भी जोड़ा कि वह हर व्यक्ति का सम्मान करती हैं, लेकिन बिना कारण किसी की छवि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उन्हें उचित नहीं लगता।
समाचार एजेंसी से बातचीत के दौरान कंगना ने कहा, “मैं सभी का आदर करती हूं, लेकिन जो उसके योग्य नहीं है, उसके सिर पर मैं बेवजह ताज नहीं सजा सकती। आखिर क्यों मैं किसी का महिमामंडन करूं? क्या हम राजनीति में इसी स्तर को बढ़ावा देना चाहते हैं?” उन्होंने ‘टपोरी’ शब्द पर सफाई देते हुए कहा कि मुंबई की भाषा में इसका इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो शिष्टाचार और मर्यादा का पालन नहीं करता।
कंगना रनौत ने संसद में आचरण के मुद्दे को उठाते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों को अपने व्यवहार में गंभीरता और गरिमा बनाए रखनी चाहिए। उनके अनुसार, संसद जैसी संस्था में हर शब्द और हर इशारा महत्वपूर्ण होता है, इसलिए नेताओं को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए बोलना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस तरह का व्यवहार किसी भी मंच पर स्वीकार्य हो सकता है, खासकर संसद जैसे प्रतिष्ठित सदन में।
इसके अलावा, कंगना ने राहुल गांधी के भाषण के दौरान दिए गए जिउ-जित्सु वाले उदाहरण पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जिस तरह से यह उदाहरण पेश किया गया, उससे कई महिला सांसद असहज महसूस कर रही थीं। कंगना के मुताबिक, भले ही उसमें कोई गलत मंशा न रही हो, लेकिन प्रस्तुत करने का तरीका ऐसा था, जिसने माहौल को असुविधाजनक बना दिया। उन्होंने कहा कि संसद में इस तरह की अभिव्यक्ति की जरूरत नहीं होती और यह विषय से भटकाने वाला लगता है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी कंगना रनौत मार्च महीने में राहुल गांधी के व्यवहार को लेकर टिप्पणी कर चुकी हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी अन्य सांसदों के साथ बातचीत के दौरान असहज स्थिति पैदा करते हैं और इंटरव्यू देने वालों के साथ उनका रवैया भी ठीक नहीं रहता। कंगना ने यह भी कहा था कि महिला सांसद उनके व्यवहार से सहज महसूस नहीं करतीं और उन्हें अपने आचरण में बदलाव लाना चाहिए।
इसी बातचीत में कंगना रनौत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली की सराहना भी की। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी का नेतृत्व समावेशी सोच पर आधारित है और महिला आरक्षण बिल जैसे कदम इसी दिशा में उठाए गए हैं। उनके मुताबिक, इस तरह के फैसलों से संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और लोकतंत्र और अधिक सशक्त होगा।













