सीबीएसई की डिजिटल मूल्यांकन व्यवस्था को लेकर उठे विवाद ने अब प्रशासनिक स्तर पर गंभीर रूप ले लिया है। ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली और उससे जुड़े ठेका आवंटन को लेकर शिक्षा मंत्रालय ने जांच की प्रक्रिया तेज कर दी है। खास तौर पर हैदराबाद स्थित कंपनी Coempt Edu Teck को दिए गए अनुबंध को लेकर मंत्रालय ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। सूत्रों के मुताबिक, टेंडर प्रक्रिया, तकनीकी मानकों और अनुबंध से जुड़े निर्णयों की गहन समीक्षा की जा रही है तथा जांच पूरी होने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जा सकती है।
मंत्रालय का मानना है कि यदि किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी या प्रक्रियागत त्रुटियां सामने आती हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की जा सकती है। वहीं दूसरी ओर, अनुबंध की शर्तों के अनुसार कंपनी पर वित्तीय दंड लगाने और जरूरत पड़ने पर अनुबंध समाप्त करने जैसे विकल्प भी मौजूद हैं। हालांकि मौजूदा अनुबंध व्यवस्था के तहत कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का प्रावधान शामिल नहीं है।
आगे की कार्रवाई को लेकर क्या हैं प्रावधान?
अनुबंध में सेवा संबंधी कमियों और तकनीकी खामियों के लिए कई सख्त शर्तें रखी गई हैं। यदि सीबीएसई द्वारा चिन्हित किसी गंभीर समस्या के समाधान में देरी होती है तो कंपनी पर भारी आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
अनुबंध के अनुसार, बोर्ड द्वारा चिह्नित गंभीर मुद्दों को निर्धारित समय में ठीक न करने पर प्रत्येक 15 मिनट की देरी के लिए एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके अलावा यदि कंपनी किसी समस्या के मूल कारणों की रिपोर्ट और सुधारात्मक कार्ययोजना समय पर प्रस्तुत नहीं करती है, तो हर 60 मिनट की देरी पर अतिरिक्त एक लाख रुपये का दंड लगाया जा सकता है।
समझौते में सीबीएसई को यह अधिकार भी दिया गया है कि गंभीर उल्लंघन की स्थिति में वह सुरक्षा जमा राशि (Security Deposit) जब्त कर सकता है और अनुबंध समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। इसलिए जांच के निष्कर्ष आने के बाद कंपनी के खिलाफ आर्थिक और संविदात्मक कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
सीबीएसई ने 2026 की बोर्ड परीक्षाओं के लिए उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग और डिजिटल मूल्यांकन की जिम्मेदारी Coempt Edu Teck को सौंपी थी। इस परियोजना के तहत लाखों उत्तर पुस्तिकाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर परीक्षकों द्वारा ऑनलाइन जांचा जाना था।
हालांकि OSM प्रणाली लागू होने के बाद कई तरह की शिकायतें सामने आईं। छात्रों और शिक्षकों की ओर से स्कैनिंग गुणवत्ता, डेटा सुरक्षा, तकनीकी गड़बड़ियों और मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए गए। इसके बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया और शिक्षा मंत्रालय ने पूरी व्यवस्था की समीक्षा शुरू कर दी।
टेंडर प्रक्रिया भी जांच के दायरे में
विवाद केवल तकनीकी समस्याओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल खड़े हुए। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, 28 अगस्त 2025 को जारी प्रारंभिक टेंडर में कंपनी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के स्पष्ट प्रावधान शामिल थे।
उस समय यदि कोई कंपनी गंभीर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन करती पाई जाती, तो सीबीएसई की समिति उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती थी। साथ ही परफॉर्मेंस बैंक गारंटी (PBG) जब्त करने, अनुबंध समाप्त करने और कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने जैसी कार्रवाई भी संभव थी।
इसके अतिरिक्त, बार-बार नियमों का उल्लंघन करने की स्थिति में सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त करने और भविष्य की निविदाओं से बाहर करने का अधिकार भी बोर्ड के पास मौजूद था।
सितंबर 2025 के संशोधन ने बढ़ाई बहस
टेंडर प्रक्रिया में सबसे अधिक चर्चा सितंबर 2025 में जारी किए गए एक संशोधन (Corrigendum) को लेकर हो रही है। जानकारी के अनुसार, 20 सितंबर 2025 को जारी इस संशोधन में ब्लैकलिस्टिंग से संबंधित प्रावधान को हटा दिया गया था।
यानी संशोधन के बाद भी सीबीएसई के पास वित्तीय दंड लगाने, सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त करने और अनुबंध समाप्त करने का अधिकार बना रहा, लेकिन किसी कंपनी को औपचारिक रूप से ब्लैकलिस्ट करने का विकल्प समाप्त हो गया।
यही बदलाव अब जांच एजेंसियों और मंत्रालय के लिए विशेष रुचि का विषय बना हुआ है। यह देखा जा रहा है कि आखिर इस संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी और इसके पीछे क्या प्रशासनिक या तकनीकी कारण थे।
दिसंबर में मिला था अंतिम ठेका
सभी प्रक्रियाओं के बाद 5 दिसंबर 2025 को Coempt Edu Teck को आधिकारिक रूप से यह अनुबंध प्रदान किया गया। इसके बाद कंपनी ने सीबीएसई की डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली और उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग का कार्य संभाला।
अब जब OSM प्रणाली को लेकर विवाद गहराता जा रहा है, तब टेंडर प्रक्रिया से लेकर अनुबंध संशोधन और तकनीकी क्रियान्वयन तक पूरे घटनाक्रम की जांच की जा रही है। शिक्षा मंत्रालय यह सुनिश्चित करना चाहता है कि देश की सबसे बड़ी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।
मंत्रालय की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
फिलहाल सभी की नजर शिक्षा मंत्रालय द्वारा मांगी गई रिपोर्ट और संभावित जांच निष्कर्षों पर है। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही, नियमों की अनदेखी या निर्णय प्रक्रिया में गड़बड़ी सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है।
वहीं कंपनी के खिलाफ अनुबंध की शर्तों के तहत आर्थिक दंड, सिक्योरिटी डिपॉजिट की जब्ती या अनुबंध समाप्त करने जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं। हालांकि मौजूदा संविदात्मक व्यवस्था के कारण कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना संभव नहीं होगा। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मामला सीबीएसई की डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली और उसकी पारदर्शिता को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।













