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FCRA संशोधन बिल पर सरकार ने लिया यू-टर्न? JPC को भेजा गया प्रस्ताव, विपक्ष ने उठाए सवाल

FCRA संशोधन बिल 2026 को सरकार ने विस्तृत समीक्षा के लिए 31 सदस्यीय JPC के पास भेज दिया है। विपक्ष और धार्मिक संस्थाओं ने कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Wed, 12 Aug 2026 3:04:33

FCRA संशोधन बिल पर सरकार ने लिया यू-टर्न? JPC को भेजा गया प्रस्ताव, विपक्ष ने उठाए सवाल

संसद के मॉनसून सत्र में FCRA संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए। व्यापक चर्चा और विरोध के बीच केंद्र सरकार ने विधेयक को विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का फैसला किया है। लोकसभा में इसे समिति के हवाले करने का प्रस्ताव केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने रखा, जिसके बाद सदन में तीखी बहस और नोकझोंक देखने को मिली।

विधेयक विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं और ट्रस्टों से जुड़े नियमों में बदलाव से संबंधित है। इसके कई प्रावधानों को लेकर विपक्ष और कुछ धार्मिक संस्थाओं ने आपत्ति जताई थी।

31 सदस्यीय समिति करेगी विधेयक की समीक्षा

प्रस्ताव के मुताबिक, FCRA विधेयक की जांच के लिए कुल 31 सदस्यीय JPC गठित होगी। इसमें लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे।

लोकसभा के 21 सदस्यों का चयन लोकसभा अध्यक्ष करेंगे, जबकि राज्यसभा के 10 सदस्यों के नाम राज्यसभा के सभापति द्वारा तय किए जाएंगे। समिति की औपचारिक बैठक के लिए कुल सदस्यों के करीब एक-तिहाई यानी निर्धारित न्यूनतम कोरम की आवश्यकता होगी।

लोकसभा ने राज्यसभा से भी समिति में अपने 10 सदस्यों को शामिल करने और उनके नामों की औपचारिक जानकारी देने की सिफारिश की है।

शीतकालीन सत्र में पेश करनी होगी रिपोर्ट

JPC को विधेयक के प्रावधानों की विस्तृत जांच और समीक्षा के बाद अपनी रिपोर्ट 2026 के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक लोकसभा में पेश करनी होगी।

समिति के कामकाज के लिए लोकसभा की संसदीय समितियों से संबंधित प्रक्रिया और कार्य संचालन नियम लागू होंगे। जरूरत पड़ने पर समिति के कामकाज से जुड़े नियमों में अध्यक्ष द्वारा संशोधन किया जा सकेगा।

FCRA कानून में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?

FCRA संशोधन विधेयक 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। इसका संबंध विदेशों से मिलने वाले धन का इस्तेमाल करने वाले NGO, धार्मिक-सामाजिक संस्थानों और ट्रस्टों के नियमन से है।

प्रस्तावित बदलावों में एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यदि किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, उसकी अवधि समाप्त हो जाती है या संगठन स्वयं पंजीकरण सरेंडर कर देता है, तो विदेशी धन से बनाई गई उसकी संपत्तियों को एक प्राधिकरण के अधीन किया जा सकेगा।

इसके अलावा, कानून के उल्लंघन के मामले में अधिकतम सजा की अवधि को 5 साल से घटाकर 1 साल करने का प्रस्ताव भी विधेयक में शामिल है।

विपक्ष और धार्मिक संस्थाओं ने जताई आपत्ति

विधेयक के इन प्रावधानों पर विपक्ष के अलावा कई धार्मिक संस्थाओं ने भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि प्रस्तावित बदलावों से कार्यपालिका को व्यापक अधिकार मिल सकते हैं और इनके गलत इस्तेमाल की आशंका है।

विपक्ष की ओर से विधेयक का विरोध किए जाने के बीच लोकसभा में इस मुद्दे पर तीखी बहस हुई। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी विधेयक को लेकर सरकार पर सवाल उठाए और कहा कि विपक्ष इसका विरोध कर रहा है।

वहीं, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि FCRA विधेयक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है।

विरोध के बीच JPC के पास पहुंचा बिल

विधेयक को लेकर अलग-अलग पक्षों की ओर से जताई गई चिंताओं और विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों की आपत्तियों के बाद इसे सीधे पारित करने के बजाय विस्तृत संसदीय समीक्षा के लिए JPC को भेजने का निर्णय लिया गया है।

अब 31 सदस्यीय समिति विधेयक के प्रावधानों की जांच करेगी और अपनी रिपोर्ट तय समयसीमा के भीतर लोकसभा के समक्ष रखेगी। इसके बाद विधेयक पर आगे की संसदीय प्रक्रिया तय होगी।

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