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Amarnath Yatra 2022: अमरनाथ गुफा तक पहुंचने से पहले पार करने होते हे ये 6 पड़ाव, जानें इनसे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें

भगवान शिव ने यहां माता पार्वती को अपने अमर होने का रहस्य बताया था। कहते हैं कि अमरनाथ में जाकर हिमलिंग के दर्शन मात्र करने से ही इंसान के सभी पाप धूल जाते हैं। इस साल अमरनाथ यात्रा 30 जून 2022 से शुरू होकर 11 अगस्त 2022 यानी रक्षाबंधन तक चलने वाली है।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Thu, 30 June 2022 11:44:50

Amarnath Yatra 2022: अमरनाथ गुफा तक पहुंचने से पहले पार करने होते हे ये 6 पड़ाव, जानें इनसे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें

बाबा भोलेनाथ की अमरनाथ यात्रा 30 जून से शुरू होने वाली है। जैसा की आप जानते हैं कि बाबा बर्फानी के नाम से मशहूर अमरनाथ धाम का इतिहास काफी सदियों पुराना है। माना जाता है कि भगवान शिव ने यहां माता पार्वती को अपने अमर होने का रहस्य बताया था। कहते हैं कि अमरनाथ में जाकर हिमलिंग के दर्शन मात्र करने से ही इंसान के सभी पाप धूल जाते हैं। इस साल अमरनाथ यात्रा 30 जून 2022 से शुरू होकर 11 अगस्त 2022 यानी रक्षाबंधन तक चलने वाली है। बाबा अमरनाथ की गुफा समुद्र तल से करीब 3,800 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। गुफा में मौजूद शिवलिंग की खासियत है कि ये खुद-ब-खुद बनता है। ऐसा कहा जाता है कि कहा जाता है कि चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इसके शिवलिंग के आकार में बदलाव आता है। अमरनाथ का शिवलिंग ठोस बर्फ से निर्मित होता है।

अमरनाथ की यात्रा काफी कठिन है, जिसमें आपको पहले 6 पड़ाव पूरे करने पड़ते हैं। आपको बता दें, इन पड़ावों का अपना अलग ही महत्व हैं। चलिए आपको अमरनाथ यात्रा को लेकर कुछ दिलचस्प बातें बताते हैं।

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पहलगाम

सड़क के रास्ते अमरनाथ पहुंचने के लिए पहले जम्मू तक जाना होगा फिर जम्मू से श्रीनगर तक का सफर करना होगा। श्रीनगर से आप पहलगाम या बालटाल पहुंच सकते हैं। श्रीनगर से पहलगाम करीब 92 किलोमीटर और बालटाल करीब 93 किलोमीटर दूर है। लिद्दर और अरु नदियां और ऊंचे पहाड़ घाटी देखने में बेहद ही खूबसूरत लगते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शिव माता पार्वती को अपने अमर होने की कथा सुनाने वाले थे, तो उन्होंने पहले किसी गुप्त जगह की तलाश की, इस दौरान उन्होंने नंदी को पहले छोड़ दिया था। नंदी को उन्होंने जिस जगह पर छोड़ा था, उसे पहलगाम के नाम से जाना जाने लगा। यहीं से अमरनाथ यात्रा की शुरुआत होती है। ठहरने के लिए यहां कई अच्छे होटल भी उपलब्ध भी हैं, जहां आप कुछ देर के लिए आराम भी कर सकते हैं।

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चंदनबाड़ी

पहलगाम से चंदनवाड़ी की दूरी 16 km है। पहलगाम से चंदनवाड़ी पहुंचने के लिए मिनी बसें चलती हैं। ये ट्रेल एक शानदार प्राकृतिक नजारों के साथ लिद्दर नदी से घिरा हुआ है। आपको बता दें, माता पार्वती को अमर कथा के बारे में बताने के लिए भगवान शिव पहलगाम के बाद आगे बढ़े और कुछ ही दूरी पर जाकर उन्होंने अपनी जटाओं से चन्द्रमा को अलग कर दिया। माना जाता है कि जिस जगह पर उन्होंने चन्द्रमा को अपनी जटा से अलग किया था वो चंदनबाड़ी ही है। इस जगह पर भगवान शिव ने चंद्रमा के साथ-साथ अपने माथे पर लगी चंदन और भभूत को भी उतार दिया। दिलचस्प बात तो ये है कि यहां आने वाले यात्री अपने माथे पर मिट्टी लगाकर आगे बढ़ते हैं।

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​पिस्सू घाटी

जैसे ही आप चंदनवाड़ी के आगे बढ़ेंगे कुछ ऊंचाई पर आपको मिलेगी पिस्सू घाटी । ऐसा कहा जाता है कि यात्रा करते यात्रियों की चाल पिस्सू जैसी हो जाती है, इस वजह से इसे पिस्सू घाटी कहते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि एक बार देवता और राक्षस भगवान शिव के दर्शन करने के लिए इस जगह पर आए थे। लेकिन पहले आगे बढ़ने की जलन ने देवता और राक्षसों के बीच युद्ध छेड़ दिया। देवताओं ने राक्षसों को पिस्सू की तरह मारा था, इस वजह से भी इस जगह का नाम पिस्सू घाटी रखा गया है।

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शेषनाग झील

पिस्सू घाटी से कुछ आगे आती है शेषनाग झील। ऐसा माना जाता है कि इस झील में शेषनाग का वास है। अमरनाथ की यात्रा करते समय शिवजी ने अपने गले से सांप उतार दिया था। ऐसा माना जाता है कि 24 घंटे में से एक बार शेषनाग इस जगह पर दर्शन देने के लिए आते हैं। इस झील का आकार भी आपको नाग के जैसा ही दिखाई देगा, जिसे देखकर लगेगा मानों शेष नाग फन फैलाकर बैठे हो।

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​महागुणस पर्वत (गणेश टॉप)

शेषनाग पड़ाव के बाद अब आता है महागुणस पर्वत। ये इतना बड़ा पर्वत हरे और भूरे रंग का दिखाई देता है, साथ ही इसका आकार भी काफी देखने लायक है। ऐसा कहा जाता है कि भोलेनाथ ने यहां अपने पुत्र गणेश को बैठा दिया था, इसलिए इस जगह को महागुणस पर्वत के साथ-साथ गणेश टॉप भी कहते हैं।

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पंचतरणी

शेषनाग से 4.6 किलोमीटर के लिए अब आपको एक खड़ी ऊंचाई पर चढ़ना पड़ता है और फिर 3657 मीटर (12000 फीट) की ऊंचाई पर पंजतरणी की घास की भूमि पर उतरना पड़ता है। ये रास्ता नालों और झरनों से भरा है। पंजतरणी में, भैरव पर्वत के चरणों में, 5 नदियां बहती हैं जो स्पष्ट रूप से भगवान शिव के बालों (जटाओं) से उत्पन्न हुई हैं।

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बाबा बर्फानी की गुफा

इन पड़ावों के बाद अब आखिर में आती है बाबा बर्फानी की गुफा। यहां पैदल चलने का रास्ता भी बर्फ के पुल से होकर जाता है। पुल के नीचे अमरावती नदी बहती है और ऊपर बर्फ जमी रहती है। बर्फानी शिवलिंग पर्वत के बीच बनी 20 फ़ीट लंबी 30 फ़ीट चौड़ी और लगभग 15 फ़ीट ऊंची गुफा के अंदर भगवान शिव का प्राकृतिक शिवलिंग है। यह शिवलिंग पक्की बर्फ से किस तरह बनता है, ये आज भी एक रहस्य बना हुआ है। अमरनाथ गुफा करीबन 160 फुट लंबी और 100 फुट चौड़ी है।

माना जाता है कि अमरनाथ गुफा की खोज बूटा मलिक नाम के एक मुस्लिम शख्स ने की थी। ये शख्स अपनी भेड़, बकरी को इस जगह चरा रहा था। उसी समय बूटा की मुलाकात एक साधु से हुई। साधु ने बूटा को कोयले से भरा एक बैग भेंट में दिया था। बूटा ने घर पहुंचकर जब बैग खोलकर देखा तो कोयले को सोने के सिक्कों में बदला हुआ पाया। इसे देखकर बूटा हैरान हो गया और साधु का धन्यवाद करने के लिए वो उस जगह दोबारा पहुंचा। वहां पहुंचने पर उसने साधु की जगह गुफा को पाया। उसी समय से ये गुफा एक तीर्थ स्थान में बदल गया। अमरनाथ गुफा में शिवलिंग के पास पानी बहता है। लेकिन अब तक इस बात पता नहीं लग पाया है कि पानी कहां से आता है।

मान्यता है कि अमरनाथ गुफा 5000 साल पुरानी है। इस गुफा में मौजूद शिवलिंग को 'स्वयंभू' कहा जाता है क्योंकि इस शिवलिंग का निर्माण खुद से होता है। अमरनाथ यात्रा का सारा प्रबंध अमरनाथ श्राइन बोर्ड द्वारा किया जाता है। श्राइन बोर्ड यहां दर्शन के लिए आने वाले सभी श्रद्धालुओं की सुविधा का खास ख्याल रखता है।

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