चार साल बाद दिए गए इस बयान में उन्होंने साफ कहा कि यदि सोनिया गांधी और पार्टी नेतृत्व उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाना चाहते, तो वह इस जिम्मेदारी को स्वीकार करने से पीछे नहीं हटते।
गहलोत ने यह भी संकेत दिया कि उस समय जो परिस्थितियां बनीं, वह केवल साधारण राजनीतिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक “साजिश” जैसी स्थिति पैदा कर दी गई थी।
‘मैं मना नहीं करता’, बोले गहलोत, फिर उठाया साजिश का मुद्दा
अशोक गहलोत ने कहा कि अगर कांग्रेस नेतृत्व और सोनिया गांधी उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाते, तो वह इस प्रस्ताव को ठुकराते नहीं। उनके अनुसार, यह पूरी तरह पार्टी का निर्णय होता और वह इसे स्वीकार करते।
उन्होंने आगे कहा कि उस समय जो घटनाक्रम हुआ, वह अचानक और अप्रत्याशित था। पर्यवेक्षकों की नियुक्ति से लेकर बैठक में बने माहौल तक कई चीजें तेजी से बदलती चली गईं।
गहलोत ने यह भी कहा कि “पूरे घटनाक्रम को जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा और बाद में लोगों के बीच यह धारणा बनी कि वह मुख्यमंत्री पद छोड़ने के पक्ष में नहीं थे।”
गहलोत के बयान पर भाजपा मंत्री का पलटवार
राजस्थान सरकार में मंत्री जोगाराम पटेल ने अशोक गहलोत के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि जब भी सचिन पायलट का नाम किसी बड़े पद के लिए आगे आता है या उनकी संभावनाएं बनती हैं, तब गहलोत पुराने घटनाक्रम को दोहराते हैं और “होटल पॉलिटिक्स” की कहानी सामने लाते हैं।
पटेल ने कहा कि अशोक गहलोत अब अपनी ही पार्टी में किनारे लगाए जा चुके हैं और इसी कारण वे बिना आधार के लगातार ऐसे बयान देते रहते हैं।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि उस समय किसी प्रकार की गड़बड़ी या साजिश हुई थी, तो अब तक इस पर कोई कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
#WATCH | Jaipur, Rajasthan: Congress leader Ashok Gehlot says, "...If Sonia Gandhi and the Congress were making me the Congress President, would I have refused? This was a conspiracy. The observers arrived suddenly..." pic.twitter.com/ofKjEzUXjz
— ANI (@ANI) June 7, 2026
2022 का वह राजनीतिक संकट जब कांग्रेस में मचा था घमासान
गौरतलब है कि वर्ष 2022 में जब अशोक गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा था, तब राजस्थान की राजनीति में बड़ा संकट खड़ा हो गया था।
पार्टी नेतृत्व चाहता था कि गहलोत राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव लड़ें, लेकिन इसके लिए उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ता। माना जा रहा था कि उनके हटने की स्थिति में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, जिससे राजनीतिक समीकरण बदल जाते।
लेकिन गहलोत समर्थक खेमे में इस संभावित बदलाव को लेकर असंतोष बढ़ गया और स्थिति धीरे-धीरे तनावपूर्ण हो गई।
विधायक दल की बैठक से लेकर इस्तीफे तक पहुंचा मामला
सितंबर 2022 में जब कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई, तो गहलोत समर्थक विधायकों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया। कांग्रेस के केंद्रीय पर्यवेक्षक मौजूद रहे, लेकिन अधिकांश विधायक बैठक में शामिल नहीं हुए।
इसके बाद लगभग 90 से अधिक विधायक एक साथ शांति धारीवाल के आवास पर एकत्र हुए और वहां से सामूहिक रूप से तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
इन विधायकों की मांग थी कि राजस्थान का नया मुख्यमंत्री केवल अशोक गहलोत के भरोसे का व्यक्ति ही होना चाहिए।
केंद्रीय नेतृत्व की नाराजगी और बाद में बदले हालात
इस पूरे घटनाक्रम से कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बेहद नाराज हो गया था। पार्टी में अनुशासन और निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।
बाद में अशोक गहलोत ने दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाकात कर स्थिति पर खेद व्यक्त किया और नैतिक जिम्मेदारी भी स्वीकार की।
इसके बाद वह कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर हो गए और अंततः मल्लिकार्जुन खरगे को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया।
राजनीतिक असर और जारी बहस
इस पूरे प्रकरण को आज भी राजस्थान कांग्रेस की राजनीति का एक अहम मोड़ माना जाता है, जिसने नेतृत्व, संगठन और सत्ता संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला।
गहलोत का यह ताजा बयान एक बार फिर उस पुराने विवाद को राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आया है, जहां एक तरफ उनके समर्थक इसे गलतफहमी बताते हैं, वहीं विरोधी इसे सत्ता संघर्ष का परिणाम मानते हैं।














