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महिलाओं को ज्यादा होता है कैंसर या पुरुषों को? यह स्टडी डराने वाली

भारत में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। स्टडी बताती है कि महिलाओं में केस ज्यादा हैं लेकिन मौतें कम, जबकि पुरुषों में देर से पकड़ में आने वाले कैंसर के कारण मृत्यु दर अधिक है। जानें कैंसर रजिस्ट्री, कारण, लक्षण और बचाव के उपाय।

Posts by : Kratika Maheshwari | Updated on: Wed, 03 Sep 2025 8:02:23

महिलाओं को ज्यादा होता है कैंसर या पुरुषों को? यह स्टडी डराने वाली

कैंसर का खतरा हर किसी के लिए अलग हो सकता है। यह सिर्फ पुरुष और महिला शरीर की संरचना पर निर्भर नहीं करता, बल्कि जीवनशैली, हार्मोनल बदलाव, जेनेटिक कारणों और सामाजिक परिस्थितियों से भी जुड़ा हुआ है। हाल के वर्षों में भारत में कैंसर के मामलों में तेजी आई है, और ताज़ा अध्ययन इसके डराने वाले आंकड़े पेश करते हैं।

2015 से 2019 के बीच देशभर की 43 कैंसर रजिस्ट्रियों से जुटाए गए डाटा के अनुसार इस दौरान लगभग 7.08 लाख नए मरीज सामने आए और 2.06 लाख लोगों की मौत हुई। विशेषज्ञों का अनुमान है कि साल 2024 में कैंसर के नए मरीजों की संख्या 15.6 लाख तक पहुंच चुकी है, जबकि 8.74 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई है।

कैंसर रजिस्ट्री क्या होती है?

कैंसर रजिस्ट्री एक ऐसा सुव्यवस्थित नेटवर्क है, जो देश के विभिन्न हिस्सों से नए मरीजों, मौतों और कैंसर से जुड़ी ट्रेंड रिपोर्ट्स का डेटा इकट्ठा करता है। इस प्रणाली का उद्देश्य यह समझना होता है कि किन इलाकों में कैंसर के मामले ज्यादा हैं, किस उम्र या लिंग में जोखिम अधिक है और कौन-सी जीवनशैली या पर्यावरणीय वजहें इन मामलों को बढ़ा रही हैं।

फिलहाल भारत में यह सिस्टम 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सक्रिय है। हाल ही में प्रयागराज, कश्मीर और त्रिवेंद्रम जैसे नए शहरों को इसमें शामिल किया गया है, जिससे देशभर में कैंसर के रुझानों पर और सटीक तथा व्यापक जानकारी मिल सके।

कैंसर रजिस्ट्री दो प्रमुख प्रकार की होती है:

पॉप्युलेशन-बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री (PBCR): इसमें किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र की पूरी आबादी से संबंधित कैंसर के मामलों को दर्ज किया जाता है। इससे यह पता चलता है कि किसी इलाके में कैंसर का कितना प्रसार है और किस प्रकार का कैंसर ज्यादा हो रहा है।

हॉस्पिटल-बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री (HBCR): इसमें अस्पतालों में इलाज के लिए आने वाले कैंसर मरीजों का रिकॉर्ड रखा जाता है। इसके जरिए यह जानकारी मिलती है कि मरीजों को किस स्टेज पर कैंसर का पता चलता है और इलाज का कितना असर हो रहा है।

इन आंकड़ों का उपयोग न केवल रिसर्च और पॉलिसी बनाने में किया जाता है, बल्कि डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को भी बेहतर इलाज और प्रिवेंशन स्ट्रैटेजी बनाने में मदद मिलती है। WHO और ICMR (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) जैसी संस्थाएं समय-समय पर इन डेटा का विश्लेषण कर कैंसर कंट्रोल प्रोग्राम तैयार करती हैं।

महिलाओं में ज्यादा केस, लेकिन मौतें कम

भारत में दर्ज किए गए कुल कैंसर मामलों में महिलाओं की हिस्सेदारी 51% है, लेकिन मौत का आंकड़ा केवल 45% है। इसका मुख्य कारण यह है कि महिलाओं में ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर जैसे मामले जल्दी पकड़ में आ जाते हैं और उपचार समय रहते शुरू हो जाता है। लगभग 40% महिला कैंसर के केस इन्हीं दो बीमारियों से संबंधित पाए जाते हैं।

पुरुषों में मुंह का कैंसर सबसे आम


पुरुषों में कैंसर के मामलों में सबसे आगे है मुंह का कैंसर (Oral Cancer)। पहले फेफड़ों का कैंसर शीर्ष पर था, लेकिन अब तंबाकू और शराब की आदतों के चलते मुंह का कैंसर तेजी से बढ़ा है। हालांकि तंबाकू का सेवन कुछ कम हुआ है, लेकिन शराब की खपत बढ़ने से जोखिम भी बढ़ा है। वहीं, फेफड़े और पेट का कैंसर अक्सर देर से पहचान में आता है, जिसकी वजह से मृत्यु दर अधिक रहती है।

नॉर्थईस्ट भारत में ज्यादा खतरा

पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर मिजोरम में कैंसर का खतरा देश के अन्य हिस्सों की तुलना में लगभग दोगुना है।

पुरुषों में 21% मामले

महिलाओं में 18.9% मामले

इसके पीछे तंबाकू का अधिक सेवन, पारंपरिक खानपान की आदतें और कुछ विशेष प्रकार के संक्रमण प्रमुख कारण माने जाते हैं।

क्या कैंसर से बचाव संभव है?

WHO की रिपोर्ट बताती है कि लगभग आधे कैंसर समय पर जांच, वैक्सीन और स्वस्थ जीवनशैली से रोके जा सकते हैं। यानी, जागरूकता और सावधानी अपनाने से कैंसर के खतरे को काफी हद तक टाला जा सकता है।

हार्मोन और जेनेटिक फैक्टर्स


कैंसर का संबंध हार्मोनल प्रभाव और आनुवांशिक कारणों से भी है।

महिलाओं में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन ब्रेस्ट व गर्भाशय के कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं।

पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का असर प्रोस्टेट कैंसर के खतरे से जुड़ा होता है।

वहीं, BRCA जीन म्यूटेशन महिलाओं में ब्रेस्ट और ओवरी कैंसर के मामलों को बढ़ा देता है।

डॉक्टरों की राय

विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुष और महिलाएं दोनों ही कैंसर के प्रति संवेदनशील हैं, लेकिन दोनों के लिए जोखिम के कारण अलग-अलग होते हैं। महिलाओं में ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर जैसे कई मामले जल्दी पकड़ में आ जाते हैं, जिससे समय पर इलाज संभव हो पाता है और रिकवरी की संभावना भी अधिक रहती है। वहीं, पुरुषों में मुंह, फेफड़े और पेट का कैंसर अक्सर देर से डायग्नोज़ होता है, जिसकी वजह से मृत्यु दर अधिक देखी जाती है।

डॉक्टरों का कहना है कि कैंसर से बचाव का सबसे अहम कदम है रेगुलर हेल्थ चेकअप और स्क्रीनिंग। 40 साल के बाद हर व्यक्ति को सालाना स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए, जबकि जिनके परिवार में पहले से कैंसर के मामले रहे हैं, उन्हें और भी सतर्क रहना चाहिए।

इसके अलावा विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि:

संतुलित खानपान – हरी सब्ज़ियां, फल, साबुत अनाज और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर डाइट कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम कर सकती है।

तंबाकू और शराब से परहेज – इनका सेवन पुरुषों और महिलाओं दोनों में कैंसर के मामलों को कई गुना बढ़ा देता है।

फिजिकल एक्टिविटी – रोज़ाना कम से कम 30 मिनट का व्यायाम शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और कैंसर के साथ-साथ कई गंभीर बीमारियों से भी बचाता है।

तनाव प्रबंधन – लंबे समय तक मानसिक तनाव इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है और बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा देता है।

डॉक्टर मानते हैं कि कैंसर किसी एक जेंडर तक सीमित नहीं है। यह एक साइलेंट डिज़ीज़ है, जो चुपचाप शरीर में पनपती है और सही समय पर पहचान व इलाज न मिलने पर गंभीर रूप ले लेती है। इसलिए जागरूकता, सही देखभाल और हेल्दी लाइफस्टाइल ही इससे बचने का सबसे कारगर तरीका है।

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