
टीवी इंडस्ट्री की जानी-मानी अदाकारा पवित्रा पुनिया और एक्टर पारस छाबड़ा के बीच तकरार लगातार गहराती जा रही है। मामला तब शुरू हुआ जब पवित्रा ने एक इंटरव्यू में मंदिरों में देवियों की मूर्तियों के वस्त्र पुरुष पुजारियों द्वारा बदले जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने साफ कहा था कि “एक आदमी क्यों देवी के कपड़े बदलेगा? यह अधिकार उसे किसने दिया?”
इस पर पारस छाबड़ा ने वीडियो जारी कर पवित्रा के विचारों पर तंज कसते हुए कहा था कि “बुद्धि में भरा गंद बाहर निकालना चाहिए, तभी ऐसे बयान देने चाहिए। आखिर मूर्ति भी आदमी ही बनाता है।” अब पवित्रा ने भी करारा पलटवार किया है और पारस को नसीहत दी है कि उन्हें दूसरों की जिंदगी में बेवजह दखल देने से बचना चाहिए।
“इंसान और भगवान में फर्क समझो”
‘टेली मसाला’ से बातचीत में पवित्रा ने कहा, “सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इंसान और भगवान एक जैसे नहीं होते। इंसान का बर्ताव अलग होता है, जबकि भगवान तो आत्मा और एहसास हैं, जो सही-गलत का भान कराते हैं। आपने भगवान को देखा तक नहीं, वो रूह के स्तर पर मौजूद हैं। अगर इंसान अपनी मां की सेवा करता है, तो भी उसके स्नान का अधिकार सिर्फ स्त्रियों को ही होता है, चाहे कोई भी धर्म क्यों न हो। भगवान तो बीमार नहीं होते, इसलिए यह तुलना ही गलत है।”
“मूर्ति और आत्मा की तुलना मत करो”
पवित्रा ने पारस के वीडियो का जिक्र करते हुए कहा, “उन्होंने कहा कि मूर्ति आदमी बनाता है। तो तुम कितने नासमझ हो। जब तक मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा न हो, वह सिर्फ पत्थर का टुकड़ा है। आत्मा के प्रवेश के बाद ही वह जीवंत रूप लेती है। मंदिरों में स्थापित मूर्तियां मां का स्वरूप होती हैं, और उनमें प्राण बसते हैं। जब मूर्तिकार आकार दे रहा होता है, तब वह निर्जीव पत्थर ही है। ऐसे में यह तुलना करना कि आदमी ने मूर्ति बनाई तो वह वस्त्र भी बदल सकता है, बेहद बेतुका है।”
पवित्रा का पलटवार: “तवज्जो देने से सच चुभा”
पवित्रा ने आगे कहा, “जहां आपकी कोई भूमिका ही नहीं है, वहां दखल देना मूर्खता है। अगर मुझे किसी से कोई मतलब नहीं होता तो मैं उस पर कभी ध्यान ही नहीं देती। लेकिन पारस ने मेरे बयान पर प्रतिक्रिया दी, इसका मतलब है मेरी बात उन्हें चुभी। और सच हमेशा चुभता ही है। शुक्रिया कि उन्होंने तवज्जो दी, वरना ये मुद्दा इतना बड़ा न बनता।”
पवित्रा ने पारस की असलियत बताने की दी चेतावनी
पवित्रा पुनिया ने पारस छाबड़ा को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि मैं आज तक खामोश रही हूं, लेकिन अगर मैंने बोलना शुरू किया तो कई सच्चाइयां सामने आ जाएंगी। बेहतर यही है कि हर कोई अपनी दुनिया में रहे और ईमानदारी से काम करे। क्यों ऐसी बातों में पड़ना, जिससे खुद की इमेज खराब हो जाए और असलियत लोगों के सामने खुल जाए? दूसरों की निजी जिंदगी में टांग अड़ाना और उनकी कुंडली खोलकर यह बताना कि कौन कब जाएगा और कौन कब आएगा—यह बिल्कुल गलत है। दूसरों के नाम पर लाइमलाइट बटोरना किसी भी सूरत में सही आदत नहीं है।
पवित्रा पुनिया के तीखे सवाल: “देवी के वस्त्र बदलने का अधिकार पुजारियों को किसने दिया?”
दरअसल, यह पूरा विवाद पवित्रा के उस बयान से शुरू हुआ था, जो उन्होंने ‘बीब्लंट पॉडकास्ट’ में दिया था। पवित्रा ने कहा था,
“मैं हमेशा से इस पर सवाल उठाती रही हूं कि मंदिरों में माता की मूर्तियों के वस्त्र पुरुष पुजारियों द्वारा क्यों बदले जाते हैं? उन्हें किसने यह अधिकार दिया है? पूजा करना, आरती करना, भक्ति करना—यह सब उनका काम है, लेकिन वस्त्र बदलना कैसे उनका अधिकार हो गया?
भगवान भी औरत के रूप में होते हैं। आप शायद भूल गए कि जब माता पार्वती स्नान कर रही थीं, तब भगवान गणेश को बाहर पहरे पर बिठाया गया था। यहां तक कि भगवान शिव को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं थी। तो फिर एक साधारण आदमी कैसे यह दावा कर सकता है कि उसे देवी के वस्त्र बदलने का हक है? चाहे कोई कितना ही बड़ा सिद्ध पुरुष क्यों न हो, देवी तो देवी हैं। मैं तो कभी यह अनुमति नहीं दूंगी कि कोई आदमी मेरी मां के कपड़े बदले।”
पारस छाबड़ा का जवाब: “मूर्ति का श्रृंगार क्यों नहीं कर सकते मर्द?”
पवित्रा के इन सवालों पर पारस छाबड़ा चुप नहीं रहे। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट करते हुए कहा कि हाल ही में मैंने एक रील देखी थी, जिसमें ये बात उठी कि मंदिरों में देवियों की मूर्तियों का श्रृंगार या वस्त्र बदलने का काम पुरुष पुजारियों को नहीं करना चाहिए। लेकिन मेरा मानना है कि इसमें गलत क्या है? आप राधा रानी के श्रीविगृह को ही देख लीजिए। वहां भी मूर्तियों का श्रृंगार पुरुष पुजारियों द्वारा किया जाता है। मूर्तियां पहले से वस्त्र धारण किए होती हैं, लेकिन उनका श्रृंगार और अधिक सुंदर बनाने के लिए किया जाता है। अगर कोई भक्त भाव से यह कर रहा है तो इसमें सवाल उठाने जैसी बात कहां से आ गई?














