
भारतीय संस्कृति में ऋतु परिवर्तन, खगोलीय घटनाओं और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम मकर संक्रांति पर्व इस वर्ष 15 जनवरी, गुरुवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व सूर्य के धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करने की परंपरा के अनुसार आयोजित होता है। काशी से प्रकाशित हृषिकेश पंचांग के अनुसार, सूर्य देव का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी की रात 9:38 बजे होगा।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि संक्रांति रात्रि में हो, तो उसका पुण्यकाल अगले दिन सूर्योदय से माना जाता है। इसी नियम के आधार पर इस वर्ष मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी।
शुभ कार्यों की शुरुआत
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन सूर्य के उत्तरायण होते ही विवाह, यज्ञ, गृह प्रवेश, मुंडन, भूमि पूजन जैसी सभी शुभ क्रियाओं की शुरुआत की जा सकती है। सूर्य का दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश देवताओं के दिन और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
महाभारत काल की कथा में भीष्म पितामह ने उत्तरायण की प्रतीक्षा कर प्राण त्यागे, जो इस दिन के महत्व को दर्शाती है। मकर संक्रांति के साथ दिन लंबे होने लगते हैं और शिशिर ऋतु के समापन के साथ प्रकृति में नवजीवन का संचार होता है।
लोक परंपरा और दान-पुण्य
लोक परंपरा में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों जैसे गंगा, गंडक और सरयू के तट पर स्नान करने का विशेष महत्व है। श्रद्धालु इन नदियों में स्नान करके दान-पुण्य करते हैं।
दान में उड़द दाल, तिल, चावल, कंबल, धार्मिक पुस्तकें, वस्त्र और नए पंचांग अत्यंत पुण्यदायी माने जाते हैं। इस वर्ष 15 जनवरी को सूर्योदय के साथ ही दान-पुण्य की शुरुआत होगी। चूंकि संक्रांति गुरुवार को पड़ रही है, इसका महत्व और भी बढ़ गया है।
ज्योतिषीय मान्यताएं और सामाजिक संदेश
ज्योतिष के अनुसार गुरु और सूर्य दोनों ही सात्विक ऊर्जा, ज्ञान और समृद्धि के स्रोत हैं, जिससे इस वर्ष का संक्रांति पर्व विशेष फलदायी माना जा रहा है।
मकर संक्रांति केवल धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह समाज में परोपकार, सकारात्मक सोच और परिश्रम का संदेश भी देता है। यह पर्व सूर्य की भांति तेजस्वी, अनुशासित और निरंतर गतिशील बने रहने की प्रेरणा देता है। साथ ही दान के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक खुशियां पहुंचाने का अवसर भी प्रदान करता है।













