
रंगों का त्योहार आते ही जिन धुनों के बिना जश्न अधूरा लगता है, उनमें सबसे ऊपर एक ही गीत का नाम आता है— “रंग बरसे भीगे चुनर वाली”। होली की सुबह जैसे ही ढोल, मंजीरे और स्पीकर्स की आवाज़ गूंजती है, यह गाना अपने आप माहौल पर छा जाता है। गलियां गुलाल से रंग जाती हैं, बच्चे पानी की पिचकारियों के साथ मस्ती में डूब जाते हैं और बड़े भी पुराने गिले-शिकवे भुलाकर रंगों में सराबोर हो जाते हैं। ऐसे में यह कल्पना करना मुश्किल है कि होली का उत्सव इस गीत के बिना भी मनाया जा सकता है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि यह सदाबहार गाना 1981 में रिलीज हुई फिल्म Silsila का हिस्सा है। इस फिल्म में सदी के महानायक Amitabh Bachchan, उनकी पत्नी Jaya Bachchan और अभिनेत्री Rekha मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म का निर्देशन मशहूर फिल्मकार Yash Chopra ने किया था, जो अपने रोमांटिक और भावनात्मक सिनेमा के लिए जाने जाते हैं।
प्रेम, जिम्मेदारी और अधूरे रिश्तों की कहानी
फिल्म की कथा केवल एक प्रेम त्रिकोण नहीं, बल्कि भावनाओं के टकराव और सामाजिक बंधनों की कहानी है। अमित (अमिताभ बच्चन) और चांदनी (रेखा) एक-दूसरे से गहरा प्रेम करते हैं, लेकिन परिस्थितियां ऐसा मोड़ लेती हैं कि अमित को शोभा (जया बच्चन) से विवाह करना पड़ता है। शोभा दरअसल अमित के भाई की मंगेतर होती हैं, जिनकी असमय मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी अमित के कंधों पर आ जाती है।
दूसरी ओर, चांदनी भी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश करती है और शादी कर लेती है, लेकिन दोनों के दिलों में पुराने रिश्ते की चिंगारी बुझ नहीं पाती। यही अधूरापन फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है। परदे पर दिखी इस कहानी ने वास्तविक जीवन की चर्चाओं को भी हवा दी, और तीनों सितारों के नाम लंबे समय तक एक साथ जोड़े जाते रहे। आज भी टीवी शोज और मंचों पर इनका जिक्र हल्के-फुल्के अंदाज में होता रहता है।
बॉक्स ऑफिस से ज्यादा यादगार बने गीत
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म ने टिकट खिड़की पर औसत प्रदर्शन किया। लगभग दो करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने करीब ढाई से तीन करोड़ रुपये तक की कमाई की थी। व्यावसायिक दृष्टि से यह बड़ी सफलता नहीं थी, लेकिन समय के साथ इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। आज भी इसे एक कल्ट क्लासिक के रूप में देखा जाता है और दर्शक इसकी संवेदनशील कहानी की सराहना करते हैं।
हालांकि फिल्म की असली ताकत इसके गीत थे, जिन्होंने इसे अमर बना दिया। खासकर “रंग बरसे” ने तो होली का पर्याय बनकर अलग ही पहचान बना ली। बीते चार दशकों से अधिक समय में यह गीत हर होली पार्टी की जान बन चुका है।
‘रंग बरसे’ के पीछे की रोचक दास्तान
इस गीत के जन्म की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। कहा जाता है कि एक होली समारोह के दौरान आरके स्टूडियो में फिल्मी सितारों का जमावड़ा लगा था। उस दौर में अमिताभ बच्चन की कुछ फिल्में लगातार असफल हो रही थीं। माहौल हल्का करने के लिए उनसे कुछ सुनाने का आग्रह किया गया।
बताया जाता है कि उन्होंने एक पारंपरिक लोकधुन गुनगुनाई, जिसके बोल उनके पिता, प्रसिद्ध कवि Harivansh Rai Bachchan की रचना से प्रेरित थे। इस प्रस्तुति ने वहां मौजूद लोगों को बेहद प्रभावित किया। बाद में इसी धुन को फिल्म सिलसिला में शामिल किया गया और यह सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया।
गीत की खासियत यह है कि इसमें बनारसी ठाठ, ठेठ देसी अंदाज और मस्ती का अनोखा संगम है। अमिताभ बच्चन की आवाज़, लोकधुन की सादगी और रंगों का उल्लास—इन सबने मिलकर इसे अमर बना दिया।
आज भी होली का पर्याय
समय बदल गया, संगीत की शैली बदली, लेकिन “रंग बरसे” की लोकप्रियता कम नहीं हुई। नई पीढ़ी भी इस गीत पर उतनी ही शिद्दत से झूमती है जितनी पहले लोग झूमा करते थे। होली की प्लेलिस्ट इस गीत के बिना अधूरी मानी जाती है।
इस बार जब आप रंगों में भीगें और दोस्तों के साथ ठहाके लगाएं, तो इस कालजयी गीत को जरूर बजाइए। आखिर कुछ गाने केवल सुने नहीं जाते, बल्कि त्योहार की रूह बन जाते हैं—और “रंग बरसे” उन्हीं में से एक है।













