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जापान में भारतीय आमों पर लगा बैन, जानिए आखिर क्यों लिया गया बड़ा फैसला

जापान ने 20 साल बाद भारतीय आमों के आयात पर बैन लगा दिया है। निरीक्षण में पेस्ट कंट्रोल और डिसइंफेक्शन प्रक्रिया में खामियां मिलने के बाद अल्फोंसो समेत कई प्रीमियम आमों के निर्यात पर असर पड़ा है। जानिए इस फैसले की पूरी वजह और किसानों-निर्यातकों पर इसका प्रभाव।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 29 May 2026 9:10:26

जापान में भारतीय आमों पर लगा बैन, जानिए आखिर क्यों लिया गया बड़ा फैसला

भारतीय आमों की मिठास और खुशबू दुनियाभर में मशहूर है, लेकिन इस बार जापान ने भारतीय आमों के आयात पर अचानक रोक लगाकर निर्यातकों और किसानों की चिंता बढ़ा दी है। करीब दो दशक बाद जापान ने भारत से भेजे जाने वाले आमों पर प्रतिबंध लगाया है। इस फैसले ने खासतौर पर अल्फोंसो, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी प्रीमियम किस्मों के कारोबार पर बड़ा असर डाला है। जापान का कहना है कि भारतीय ट्रीटमेंट सुविधाओं में निरीक्षण के दौरान कुछ गंभीर तकनीकी कमियां सामने आई हैं, जिसके चलते यह कदम उठाया गया।

जानकारी के मुताबिक, साल 2026 की शुरुआत में जापानी क्वारंटाइन अधिकारियों ने भारत में आमों के निर्यात से पहले होने वाली पेस्ट कंट्रोल और डिसइंफेक्शन प्रक्रियाओं का निरीक्षण किया था। इसी जांच के दौरान अधिकारियों को कुछ ऐसी खामियां मिलीं, जिन्हें जापान के सख्त कृषि और पौध सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं माना गया। इसके बाद जापान ने भारतीय आमों की नई खेपों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

दरअसल, जापान उन देशों में शामिल है जो कृषि सुरक्षा को लेकर बेहद कठोर नियम अपनाते हैं। फल मक्खी जैसे कीटों को वहां की खेती के लिए बड़ा खतरा माना जाता है और इसी वजह से जापान ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर काम करता है। यदि किसी भी खेप में कीट संक्रमण की आशंका होती है तो उसे तुरंत रोक दिया जाता है। यही कारण है कि जापानी अधिकारियों ने भारतीय आमों की गुणवत्ता और उपचार प्रक्रिया पर दोबारा सवाल उठाए हैं।

पिछले 20 वर्षों में यह पहला मौका है जब जापान ने भारतीय आमों पर इस तरह का प्रतिबंध लगाया है। इससे पहले भी फल मक्खी के खतरे के कारण जापान ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगाई थी। हालांकि बाद में भारत ने अपने उपचार और निरीक्षण प्रोटोकॉल को मजबूत किया, जिसके बाद 2006 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया था। लेकिन अब फिर से सामने आई तकनीकी कमियों ने दोनों देशों के बीच कृषि निर्यात व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

हर निर्यात सीजन से पहले जापान अपने क्वारंटाइन अधिकारियों को भारत के वीएचटी यानी वाष्प ताप उपचार केंद्रों पर भेजता है। इन केंद्रों में आमों को विशेष प्रक्रिया के जरिए कीटमुक्त बनाया जाता है ताकि निर्यात के दौरान किसी तरह का संक्रमण न फैले। यह एक नॉन-केमिकल प्रक्रिया होती है, जिसमें नियंत्रित तापमान और नमी के जरिए आमों में मौजूद कीटों और उनके लार्वा को खत्म किया जाता है। भारत और जापान के बीच हुए निर्यात समझौते के तहत यह प्रक्रिया बेहद अहम मानी जाती है।

बताया जा रहा है कि मार्च 2026 में उत्तर प्रदेश के रहमानपुर स्थित वीएचटी केंद्र का निरीक्षण किया गया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, जापानी अधिकारियों ने वहां फ्यूमिगेशन और डिसइंफेक्शन सिस्टम से जुड़ी कई कमियां दर्ज कीं। हालांकि अब तक भारत सरकार और जापानी एजेंसियों की ओर से इन तकनीकी खामियों का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। निरीक्षण के बाद जापान के योकोहामा प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने साफ कर दिया कि 25 मार्च 2026 के बाद जारी किए गए प्रमाणपत्रों वाली भारतीय आमों की खेप स्वीकार नहीं की जाएगी।

जापान के इस फैसले से भारतीय आम निर्यातकों को बड़ा आर्थिक झटका लगा है। भले ही जापान भारत के लिए सबसे बड़ा आम बाजार न हो, लेकिन वहां भारतीय आमों की काफी ऊंची कीमत मिलती है। यही वजह है कि जापानी बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा आम उत्पादन करने वाला देश है और हर साल करोड़ों मीट्रिक टन आम पैदा करता है। इनमें से अधिकांश आम घरेलू बाजार में ही खप जाते हैं, लेकिन जापान जैसे प्रीमियम बाजारों में निर्यात से किसानों और व्यापारियों को अच्छा मुनाफा मिलता है।

निर्यातकों को अब इस बात की चिंता सता रही है कि जापान का यह प्रतिबंध दूसरे देशों को भी सतर्क कर सकता है। यदि भारत की गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर सवाल उठते हैं तो अन्य आयातक देश भी अतिरिक्त जांच या सख्त नियम लागू कर सकते हैं। इससे भारतीय कृषि निर्यात की साख प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे ज्यादा असर महाराष्ट्र के अल्फोंसो आम उत्पादक किसानों पर पड़ने की आशंका है। किसान पहले से ही मौसम की मार झेल रहे हैं। इस साल भीषण गर्मी, पानी की कमी और अल नीनो से जुड़े असामान्य मौसम ने फसलों को काफी नुकसान पहुंचाया है। कई सरकारी सर्वेक्षणों में कुछ इलाकों में 85 से 90 प्रतिशत तक नुकसान का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में जापान का यह प्रतिबंध किसानों और निर्यातकों के लिए दोहरी चुनौती बनकर सामने आया है। व्यापारियों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो उनकी आय और निर्यात कारोबार दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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