
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से होने वाले सौर पैनल आयात (solar imports) पर 126 प्रतिशत प्रारंभिक शुल्क (initial duties) लगाने का ऐलान किया है। इस कदम से भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की दिशा पर असर पड़ सकता है।
अमेरिकी वाणिज्य विभाग का कहना है कि भारत ने घरेलू सोलर पैनल उत्पादन को अनुचित सब्सिडी देकर अमेरिकी निर्माताओं की तुलना में अपने उत्पादों को सस्ता बनाया है। इसी कारण अमेरिका ने भारत के अलावा इंडोनेशिया के लिए 86-143 प्रतिशत और लाओस के लिए 81 प्रतिशत प्रारंभिक शुल्क तय किया है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर असर
यह फैसला ऐसे समय आया है जब कुछ ही हफ्ते पहले नई दिल्ली और वॉशिंगटन ने भारत-यूएस व्यापार समझौते का ढांचा तय किया था। इस समझौते में भारतीय निर्यात पर पहले 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रावधान था। इससे पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने डोनाल्ड ट्रंप के पुराने टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद ट्रंप ने नए नियमों के तहत अधिकांश आयात पर 10 प्रतिशत बेसलाइन शुल्क लगाया और इसे 15 प्रतिशत तक बढ़ाने की चेतावनी दी।
इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिकी नीति में “अमेरिका फर्स्ट” सर्वोपरि है, भले ही इससे रणनीतिक व्यापार समझौते पीछे छूट जाएँ। यही वजह है कि भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों के बीच तय तीन दिवसीय बैठक को इस सप्ताह स्थगित कर दिया गया।
सोलर सप्लाई चेन पर असर
भारत, इंडोनेशिया और लाओस से होने वाले आयात में वृद्धि, जो 2025 के पहले छह महीनों में अमेरिका के कुल सोलर मॉड्यूल आयात का 57 प्रतिशत था, मुख्य रूप से चीन की कंपनियों से बचने के लिए की गई। चीन के निर्माता अमेरिका में कड़े नियमों का सामना कर रहे हैं, इसलिए वे दक्षिण-पूर्व एशिया में उत्पादन स्थानांतरित कर रहे हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी भारत रहा है। 2024 में भारत से सोलर पैनल आयात 792.6 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो 2022 के मुकाबले नौ गुना अधिक है।
अमेरिकी घरेलू उद्योग को राहत, कंपनियों के लिए चुनौती
अमेरिकी सोलर निर्माण और व्यापार गठबंधन के मुख्य वकील टिम ब्राइटबिल ने इसे घरेलू निवेश के लिए एक जीत बताया। उनका कहना है कि “यदि बाजार में अनुचित व्यापार का प्रभाव रहेगा, तो घरेलू निवेश सफल नहीं हो पाएगा।”
हालांकि, भारतीय सोलर पैनल पर यह 126% शुल्क अमेरिकी कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती पेश करता है। सप्लाई रुकने से परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है, जबकि उद्योग पहले ही उच्च ब्याज दर और नीति की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग 6 जुलाई 2026 तक सब्सिडी पर अंतिम निर्णय लेने वाला है, और उसी समय एंटी-डंपिंग जांच भी पूरी की जाएगी।














